Wednesday, December 8, 2010

राजनेताओं और नौकरशाहों की थुक्का-फजीहत

                           घोटालों के लिए समर्पित रहा वर्ष - २०१०


       लगता है वर्ष २०१० जाते-जाते कई राजनेताओं, नौकरशाहों सहित मीडिया का भी बैंड बाजे के साथ बारात निकालकर ही जायेगा | केन्द्रीय पूर्व दूरसंचार मंत्री ए.राजा, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, भारतीय प्रशासनिक सेवा के रवि इन्दर सिंह और उत्तर-प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव तो पैदल हो ही गए | महाराष्ट्र में प्रशासनिक सेवा के रामानंद तिवारी,सुभाष लाला, एमएमआरडीए के आयुक्त रत्नाकर गायकवाड़, एनडीटीवी की बरखा दत्त, हिंदुस्तान के वीर संघवी  सहित दर्जनों पत्रकारों आदि-इत्यादी की जमकर चंहुओर थुक्का-फजीहत हो रही है | इसी दौरान आजम खान की सपा में इंट्री के साथ ही मुलायम सिंह यादव का अनाज घोटाला भी फिर उत्तर-प्रदेश में कुलांचे मारने लगा है | जानकारों का मानना है कि किसान प्रदेश के किसान नेता मुलायम के राज का अनाज घोटाला टू -जी घोटाले का "बड़का अब्बा" साबित हो रहा है | खैर राजा अगर निकट भविष्य में जेल जाते हैं तो तमिलनाडू के लिए यह कोई नई बात नहीं होगी | क्योंकि शुरू-शुरू में ए. राजा के मामले में धृतराष्ट बने चश्माधारी एम. करूणानिधि और चिरकुवांरी अम्मा जे. जयललिता जेल लाभ अर्जित कर चुके हैं | यहाँ तक कि मुलायम के नवोदित बिहारी सखा लालू प्रसाद यादव भी जेल के लिट्टी-चोखा का स्वाद ले चुके हैं | अमर सिंह की यह धमकी कि, मैं मुंह खोल दूंगा तो मुलायम जेल चले जायेंगे ये गलत साबित हो सकता है ? क्योंकि उनके मुंह में अभी ढक्कन लगे रहने  के बावजूद उत्तर-प्रदेश में अनाज की बोरी का मुंह खुल गया है | इसका श्री गणेश मुलायम के अथक प्रयास व पैंतरेबाजी से कभी उत्तर-प्रदेश की मुख्यसचिव बनी नीरा यादव की जेल यात्रा से हो चुका है | भूमि आवंटन घोटाले में जेल गईं नीरा यादव देश की एकमात्र  ऐसी महिला मुख्यसचिव हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोप के चलते उच्चतम न्यायालय के आदेश पर मुख्यसचिव के पद से हटाया गया था | राजनीति में अव्वल रहने वाले उत्तर-प्रदेश का अनाज घोटाला भी देश के अन्य घोटालों का बाप साबित होगा | क्योंकि यह लगभग ३५ हजार करोड़ का अनाज घोटाला है | गरीबों के लिए मुफ्त अनाज योजना (बीपीएल), अन्त्योदय योजना, काम के बदले अनाज वाली जवाहर रोजगार योजना एवं मिड डे मिल योजना के तहत हुए अनाज के महाघोटाले के खिलाफ उत्तर-प्रदेश में लगभग ५००० एफ.आई.आर. भी दर्ज हुए हैं | जिसमें लगभग ३० हजार सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की भी गर्दन नपने की आशंका है | इस बाबत इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंड पीठ ने पिछले तीन दिसंबर को अनाज घोटाला मामले को सीबीआई के सुपुर्द करते हुए ६ माह के भीतर जाँच पूरा करने का आदेश दिया है | इस फैसले को लेकर बहन मायावती भले ही बम-बम हैं, लेकिन वह भी कुछ नहीं कम हैं |
                                                                                               मुनीर अहमद मोमिन            

Tuesday, December 7, 2010

अशोक को शोकग्रस्त करने की सुपारी

      लोगों का चीरहरण करके कचूमर निकालने  वाली मीडिया पर भी अब पलट वार होने शुरू हो गए है | और मीडिया की स्वतन्त्रता के नाम पर की जा रही उदंडता पर खुद मीडिया के  प्रबुद्ध जनों द्वारा इस तरह की नकेल की आवश्यकता कभी से  महसूस की जाती रही है | 
       अपने गृहनगर नांदेड में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने मुख्यमंत्री से पैदल होने का नारियल मीडिया के सर पर फोड़ते हुए कहा है कि उन्हें पदच्यूत कराने के लिए महाराष्ट्र कांग्रेस के एक बड़े नेता ( केन्द्रीय मंत्री ) ने मीडिया को सुपारी दिया था, और इस तरह मीडिया ने उक्त नेता से सुपारी लेकर मेरा गेम बजा दिया | अशोक चव्हाण का खुला आरोप है कि - 
                     मुझे तो लूट लिया , मिलके मीडिया वालों ने |
                        हाई  कमान वालों ने , सत्ता  के दलालों  ने ||   
 इस ब्लॉग पर मै पहले भी  लिख चुका हूँ कि दस जनपथ में गहरी पैठ रखने वाले एक नेता के मुंबई स्थित एक हमराज- हमकाज बिल्डर  से और अशोक चव्हाण के नाक के  बाल बने  एक बिल्डर से एक प्रोजेक्ट को लेकर तनातनी हो गयी | इसकी भनक महाराष्ट्र के एक केन्द्रीय मंत्री को लगते ही उसने दस जनपथ के गुरु घंटाल से अशोक चव्हाण की पटेलगिरी  करवा दी | दिल्ली के नेता के इशारे पर महाराष्ट्र वाले नेता ने मीडिया को सुपारी देकर 'आदर्श" गेम प्लांट  करवा दिया | आदर्श के चक्कर में अशोक चव्हाण सामान्य हो गए | लकडाबाज की लकड़ीबाजी  से चव्हाण की मुख्यमंत्री पद की वैशाखी  खिसक गयी | अब लगता है कि अशोक चव्हाण दो-दो हाथ करने के मूड में उतर आयें हैं | इसलिए उन्होंने खुलकर एलान- ए-अशोक कर दिया है कि मुझे शोक में डालने की सुपारी मीडिया ने ली थी | पहले अन्डरवर्ल्ड  में ही सुपारी लेने-देने  का चलन था | लेकिन अब मीडिया के पहलवान भी सुपारी लेने लगे हैं | हत्याएं दोनों ही जगह होती है | अंडरवर्ल्ड वाले जान  की हत्या करके  सीधे  'खुदागंज ' का टिकट कटा देते हैं | और मीडिया वाले चारित्रिक हत्या करके पद-प्रतिष्ठा का स्वयं पोस्ट -मार्टम कर देते हैं | 
                                                                                   मुनीर अहमद मोमिन      

Monday, December 6, 2010

दो मुंह फटों के बीच फिर फटा-फट चालू

            अथ अमर-आजम पुराण चालू .........
      उत्तर-प्रदेश के पहलवान पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कभी दाएं-बाएं रहे स्वभाव से वाक्पटू लेकिन मुंहफट सपा के दो मुंहफटों अमर और आज़म के बीच फिर मुंहजोरई चालू हो गयी है | सपा में आज़म के दुबारा प्रवेश करने से तिलमिलाए अमर ने मुलायम पर धावा बोलते हुए कहा है कि, यदि वह मुंह खोल देंगे तो मुलायम सलाखों के पीछे होंगे | इससे पहले आज़म उन्हें "दलाल और सप्लायर" करार दे चुके हैं | अब अमर सिंह  यह पूछना चाहते हैं कि, उन्होंने १४ सालों में मुलायम को क्या सप्लाई किया है | अमर-आज़म की 'डब्ल्यू-डब्ल्यू मुंहफटी कुश्ती' लोकसभा चुनाव के दौरान  खूब चली | यहाँ तक कि आज़म ने अमर की महिला सखी जयाप्रदा  को खूब निशाने पर रखा | जयाप्रदा, आज़म को अपनी सार्वजनिक सभाओं में भईया बताती रहीं | लेकिन उन्ही भईया पर अपनी अश्लील तस्वीरों/पोस्टरों के बंटवाने  का आरोप भी लगाया | नतीजतन चुनाव के बाद अपनी चिर भौजाई जया बच्चन को मिलाकर अमर सिंह ने कसकर जोर लगाकर हईया.... कहा और उन आज़म की अज़मत को सपा से बे-आबरू कर डाला | जो सपा के गठन काल से ही मुलायम की पार्टी के फ्रेम में कथित तौर पर मुस्लिम चेहरा के नाम से विराजमान थे |  इस प्रकरण/ फैसले से मुलायम एंड फेमिली खुश नहीं  थी | लेकिन अमर, मुलायम पर इतना हावी थे कि, मुलायम परिवार को इसे खामोशी से पचाना ही पड़ा |  लेकिन जब परिवार को लगा कि अमर, मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के पुत्र प्रतीक सिंह यादव को अंदरखाने  प्रमोट करके अखिलेश यादव से आगे निकालने की गोट बिछा रहे हैं | फिर क्या था इस बार सारे परिवार ने मिलकर नेता जी को इतना चांपा कि उन्हें अमर सिंह  को मनोज तिवारी की तरह  बिग बॉस से बाहर  निकालना ही पड़ा | तब से अमर गाहे -बगाहे  अक्सर मुलायम के प्रति कठोर होते रहे  हैं | अभी पिछले दिनों पूर्वांचल  राज्य के गठन के लिए इलाहाबाद में हुई सभा में अमर ने अपने बड़के भईया अमिताभ , भौजाई जया , सहेली जयाप्रदा और छोटे भाई संजय दत्त को आमंत्रित किया था | जिसमें सहेली और छोटे भाई जयाप्रदा और संजय दत्त को छोड़कर उनके  बड़के भाई -भौजाई दोनों मंच पर नही पहुंचे |   अंत में मुद्दे की बात यह है कि अमर-आज़म दोनों होशियार, वाकपटु , हाजिर जवाब , मुंहफट और अपने विरोधियों का कपड़ा उतारने में माहिर माने जाते  हैं | इसलिए आगे आने वाले एपीसोड में दोनों के कामेडी सर्कस से जनता को लुत्फ़ उठाने का अवसर अवश्य मिलेगा |  ऐसा राजनैतिक मौसम विभाग के विशेषज्ञों की राय है | 
                                                                  मुनीर अहमद मोमिन       
  

Saturday, December 4, 2010

मिशन के बदले कमीशनखोरी हो गई है पत्रकारिता

                  मीडिया का बाजारीकरण नहीं बाजारूपन
          वह दिन लद गए जब पत्रकारिता पेशा न होकर मिशन हुआ करता था | आज सरस्वती के इस प्रतिष्ठान पर लक्ष्मी के वाहक उल्लूओं ने कब्ज़ा जमा लिया है | बड़े-बड़े धन्ना सेठों ने अपने उद्योग हित हेतु मीडिया की दुकान खोलकर सरकार अथवा सरकारों पर दबाव बनाकर या चाटुकारिता करके कोटा-परमिट का खेल खेल रहे हैं | इनके हित हेतु ज्यादातर खबरें  प्रायोजित हुआ करती हैं | चूंकि मीडिया के ज्यादातर मालिकान धन्नासेठ होते हैं | इसलिए मीडिया पर बाज़ार का असर तो पड़ेगा ही | और जिस पर बाज़ार का असर पड़े उसे बाजारुपन होने से कौन रोक सकता है ? अब यह बात इतिहास की हो गयी है जब बाज़ार को मीडिया नियंत्रित करता था | लेकिन आज बाज़ार मीडिया को नियंत्रित करता है | बड़े- बड़े अखबार समूहों  में अब मार्केटिंग एडीटर होने लगे हैं | अब एडीटर के साथ मार्केटिंग शब्द लगे इसका अर्थ क्या ? ये मार्केटिंग एडीटर अखबार के वास्तविक एडीटर पर  बहुत भारी पड़ते हैं | क्योंकि इनका नाता  ही ख़बरों के सरोकार से न होकर सीधे-सीधे बाजार से होता है  | इनका एकमेव काम  सरकार और कार्पोरेट सेक्टरों के बीच अपने मालिक के हित की लाबिंग करना होता है | अफ़सोस तो तब होता है जब चुनाव के दौरान एक हे पेज पर एक ही निर्वाचन क्षेत्र के चार-चार, पांच-पांच प्रत्याशी जीत रहे होते हैं | एक बाजारू औरत में भी इतनी नैतिकता होती है कि वह एक वक्त में एक की ही साथी होती है | लेकिन मीडिया का चरित्र उससे भी गया गुजरा होता है | ये एक ही वक्त में एक साथ चार-चार, पांच-पांच लोगों को निपटा देते हैं | क्या इसका कोई जबाब है
 मीडिया के अलमबरदारों के पास ? खबरिया चैनलों में अक्सर पांच-दस लोगों को बुलाकर चर्चा कराने या "सीधी-बात" की नौटंकी होती है | लेकिन इसमें बुलाए  मेहमानों से उनकी प्रतिक्रिया या राय  जानने के बदले ऐसे कार्यक्रमों  के होस्ट या एंकर केवल अपनी सोच,  मुंहजोरी और ज्ञान  ही  बघारते  हैं | मेहमानों की बिल्कुल  सुनते ही नहीं, और न ही उन्हें अपनी बात ढंग से कहने का पूरा मौक़ा देते हैं | बस सवाल-दर-सवाल अपनी ही हांक कर ब्रेक लेते रहते हैं और एकांगी बहस करके केवल अपना नजरिया थोपते हुए  सबका जबरन धन्यवाद  अदा करके कार्यक्रम का क्रिया-क्रम कर देते हैं | ये पत्रकारिता का कौन सा रूप है? इसे खबरिया चैनलों की  कथित महान विद्वत आत्माएं  ही बता सकती  हैं
                                                                        मुनीर अहमद मोमिन       

Friday, December 3, 2010

be lagam: राजदीप जी मीडिया तो कभी से भ्रष्ट है

be lagam: राजदीप जी मीडिया तो कभी से भ्रष्ट है: "मौजूदा मीडिया की सोच : हम करें सो कायदा वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कल एक खबरिया चैनल पर भ्रष्ट मीडिया की पैरवी करते हुए अप..."

राजदीप जी मीडिया तो कभी से भ्रष्ट है

मौजूदा मीडिया की सोच : हम करें सो कायदा  

         वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कल एक खबरिया चैनल पर भ्रष्ट मीडिया की पैरवी करते हुए अपने शब्द जाल/तर्क से मीडिया को रिन अथवा निरमा से धुला झक सफ़ेद बताया | इसमें कोई शक नहीं कि राजदीप सरदेसाई जी एक नामवर, संवेदनशील और पैनी नजर वाले सभ्य व होनहार पत्रकार हैं और मैं स्वंय उनके अनन्य प्रशंसकों में से एक हूँ | लेकिन खबरिया चैनल पर मीडिया के पक्ष में की गयी उनकी वकालत किसी भी तरह किसी भी होशमंद के गले उतरने को तैयार नहीं है | यह तो वही बात हुई कि - " मार  पड़ी जब शमशीरों की , महाराज मै नाई हूँ " जब बात आई मीडिया के लोगों की दलाली करने की तो दलाल की जगह लाबिस्ट शब्द ढूढ़ निकाला है | तो भैया मीडिया के माई-बापों लाबिस्ट शब्द दूसरों के लिए क्यों नही ? दूसरे दलाल कहलायें ओर मीडिया वाले दलाली करें तो लाबिस्ट कहलायें | ऐसा शब्दों ओर सोच दोनों का दोगलापन क्यों ? अभी कुछ माह पहले ही "पेड न्यूज" के खिलाफ हिन्दी के मूर्धन्य पत्रकार स्व. प्रभाष जोशी जी  के पहल पर चलाए जा रहे अभियान से देश के कितने अखबारों, अखबार समूहों ओर खबरिया चैनलों के मालिक ओर संपादक सहमत हुए थे ? लगभग ढाई सौ सदस्यों वाली एडीटर गिल्ड्स के अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि लगभग ढाई सौ मीडिया के धुरंधरों में से केवल पच्चीस-तीस ही ईमानदारी व दयानतदारी दिखाते हुए "पेड न्यूज" बंद करने के पक्ष में थे | बाकी लगभग सवा दो सौ मीडिया के आकाओं की इस पर बोलती बंद है | मीडिया ने कब दलाली और राजनेताओं सहित नौकरशाहों की पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता नही की ? पिछले दो दशकों से मीडिया के आका व ठेकेदार किसी न किसी राजनेता और किसी न किसी राजनैतिक  पार्टी को प्रमोट करने अथवा लांछित करने की भी सुपारी लेते रहे हैं | और बदले में तमाम तरह से उपकृत होते रहे है | आज चिरकुट से चिरकुट मीडिया वाला भी साल में दो अंकों  से लेकर तीन अंकों तक की हवाई यात्राओं  का लाभ किसी न किसी के द्वारा कटाए टिकट पर लेते रहे हैं | इतना ही नही अपनी औकात से कई गुना  तमाम तरह की भौतिक सुख-सुविधाओं सहित राज्यसभा से लेकर विधान परिषद तक में जाने के लिए अनेकों मीडियाकर्मी  पत्रकार के बदले चाकरों की भूमिका निभाते आयें हैं | सच तो यह है कि आज देश में मीडिया का कारोबार सबसे ज्यादा लाभकारी साबित हो रहा है | विभिन्न प्रकार के लाइसेंसों सहित विभिन राजनैतिक दलों के चुनाव टिकटों के आवंटन तक मीडियाकर्मी कहाँ अपनी दलाली सारी ! लाबिंग करने से बाज आते हैं ? मेरी निजी राय है कि बरखा दत्त और वीर सिंघवी  तो इस लिए कटघरे में खड़े हैं कि उनका राज खुल गया | नही तो मीडिया में ऐसे दत्त और सिंघवी तो एक ढूढों हजार मिलते हैं | जो पकड़ गया वह मुजरिम नहीं  तो संत तो है ही | (जारी ...............)
                                                                मुनीर अहमद मोमिन        

be lagam: मंत्री, मुख्यमंत्री तक खा गया है

be lagam: मंत्री, मुख्यमंत्री तक खा गया है: " करप्सन का बदबू सब में आ गया है ये कैसा दौर आज - कल आ गया है ..."

मंत्री, मुख्यमंत्री तक खा गया है

                         करप्सन का बदबू सब में आ गया है


                                             ये कैसा दौर आज - कल आ गया है |
                                             भ्रष्टाचार चहुँ ओर छा गया है ||
                                             कहीं टू जी, कहीं आदर्श बनकर |
                                             मंत्री, मुख्यमंत्री तक खा गया है ||
                                             कभी नैनो वाले टाटा की नैना बनकर |
                                             सुप्रीमकोर्ट तक उन्हें दौड़ा गया है ||
                                             क्या मीडिया और क्या सरकारी तंत्र |
                                             करप्सन का बदबू सब में आ गया है ||
                                             सेक्स स्कैंडल का कभी चोला बदलकर |
                                             कितने आईएएस, आईपीएस तक पचा गया है ||
                                             रिश्वत  का असर सब पर है " मोमिन " |
                                             जिसे  देखो  वही  बौरा  गया  है ||

                                                                                 मुनीर अहमद मोमिन   

Wednesday, December 1, 2010

be lagam: टाटा की प्राइवेसी को पाइरेसी का चाटा

be lagam: टाटा की प्राइवेसी को पाइरेसी का चाटा: "संगीन साबित हो रहीं है फोन की रंगीन बातें आखिर प्राइवेसी के नाम पर रतन टाटा ने अपनी प्राइवेसी अथवा निजता को लेकर सुप्रीमकोर्ट ..."

टाटा की प्राइवेसी को पाइरेसी का चाटा

संगीन साबित हो रहीं है फोन की रंगीन बातें

            आखिर प्राइवेसी के नाम पर रतन टाटा ने अपनी प्राइवेसी अथवा निजता को लेकर सुप्रीमकोर्ट में ठीक उसी तरह की याचिका दायर कर दी है | जैसी याचिका कुछ वर्ष पूर्व बड़े भैया अमिताभ बच्चन के छोटे भैया अमर सिंह और विपाशा वसु जैसी लज्जाशील अभिनेत्रियों के बीच इलू-इलू अथवा रंगीन अथवा संगीन टेलीफोन वार्ता के टेप को सार्वजनिक करने के खिलाफ स्थगन आदेश मांगने के लिए दायर की थी, और माननीय सुप्रीमकोर्ट ने राजेश खन्ना की पूर्व महिला सखा पहले की टीना मुनीम और अबकी टीना अंबानी के पति अनिल अंबानी के लंगोटिया यार परमादरणीय अमर सिंह जी की गुहार को उचित मानते हुए उक्त टेप वार्ता को सार्वजनिक करने या छपने-छपाने पर रोक लगा दी थी | जबकि उक्त टेप वार्ता के कुछ मजेदार अंश टाइम्स समूह सहित हिन्दी और अन्य भाषाई कई अखबारों में छप-छपा चुके थे | इन दिनों नीरा राडिया और रतन टाटा के "बीच" की फोन वार्ता देश में चटखारे बहस का विषय बना हुआ है | नैनो वाले टाटा के उद्योग समूह की नैना बनी राडिया से  हुई बात- चीत को टाटा  अपनी प्राइवेसी या निजता मानते हुए उसे लीक करने से काफी भन्नाए हुए हैं | और इस कृत्य को वे भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अपनी निजता के अधिकार का हनन मान रहे हैं | वैसे इस देश में निजता हमेशा बड़े लोगों की ही होती है, और यह निजता इतनी बड़ी होती है कि, इसे ढकने के लिए बड़े-बड़े कनात ( तंबू ) भी छोटे पड़ जाते हैं | जिससे इनकी निजता इधर-उधर, दाएं-बाएं या आगे-पीछे यानि कहीं न कहीं से दिखने ही लगती है | हालांकि गुलछर्रे उड़ाते हुए रंगीनी में सराबोर होकर फोन पर चल छैंयां-छैंया, छैंया-छैंया.........करते समय किसी को भी अपनी  निजता का लेश मात्र भी ध्यान नही रहता | वह तो निजता की जवानी तब उफान पर आती है | जब निजता की बात सार्वजनिक होने लगती है | और उस कथित निजता वाले की छवि समाज में धूल- धुसरित होने का खतरा पैदा होने का अंदेशा हो जाता है | 
            इधर मीडिया ने भी  नीरा राडिया  से अपनी वफादारी  साबित करते हुए कड़ी मेहनत  के बाद उसके  लिए  "दलाल" के बदले  "लाबीस्ट" नामक शब्द  खोज निकला है | धन्य  हो मीडिया माता की |

                                                                                                           मुनीर अहमद मोमिन        

Monday, November 29, 2010

राडिया, मीडिया और मंडियां

      सत्ता के गलियारों  से लेकर कार्पोरेट सेक्टर के अलंबरदारों और  मीडिया के पहरेदारों को अपनी सुरतालों पर ताता-थैया करानेवाली नीरा  राडिया नामक दुर्लभ प्रजाति  की  महिला ने अपने  नाम और काम  की व्यापकता साबित करते  हुए जागरूक मीडिया  सहित सरकार,  नौकरशाह  और औद्योगिक  घरानों  के कथित  प्रतिष्ठित  और  नामधारी लोगों को भ्रष्टाचार  की  गंगोत्री  में डूबाने का पुख्ता  इंतजाम  करवा  लिया  है | राडिया  का काम था  औद्योगिक  घरानों / कम्पनियों का काम सरकार अथवा  नौकरशाहों  से  करवाना और लगे हाथ  वक्त  जरूरत अपनी  मनवाने  के लिए  मीडिया के द्वारा उन पर  दबाव बनवाना | इस तरह  एक महिला  दलाल ने मंत्री से लेकर नौकरशाह और मीडिया से लेकर कार्पोरेट सेक्टर तक को भी दलाली के दलदल में फांस दिया है | सीबीआई के पास इस तरह के वार्ताओं के लगभग ५८५१ रिकार्ड हैं | जिसमें से एक समाचार पत्रिका ने केवल सौ वार्ता टेप रिकार्डिंग की बात ही सार्वजनिक की है | इस बीच टाटा उद्योग समूह के सर्वेसर्वा रतन टाटा ने अपनी निजता की गुहार लगाते हुए सुप्रीमकोर्ट तक जाने का मन बना लिया है | क्योकि उनका मानना है कि टेपिंग गैरकानूनी ढंग से लीक हुयी  है | जिससे उनके अपनी जिन्दगी जीने के अधिकारों का हनन हुआ है | खैर कार्पोरेट सेक्टरों, सरकारों व नौकरशाहों में तो इस तरह की लुका-छिपी और चोर-सिपाही का खेल वर्षों से खेला जा रहा है | लेकिन इस हमाम में नंगी मीडिया का नंगापन सही ढंग से हमाम के बाहर तमाम हुआ है | पेड न्यूज के सहारे पेट भरने वाले अधिकतर मीडिया के चर्बीदार , हाईफाई लोग "बेस्ट क्वालिटी " की दलाली तो दशकों से गाहे- बगाहे  करते रहे हैं | लेकिन इन दिनों इनकी संख्या में कुछ ज्यादा ही इजाफा हो गया है | जनता को नैतिकता और आदर्शों का पोलियो ड्राप पिलाने वाले मीडिया के लोगों की मानसिक विकलांगता किसी भी प्रेस क्लब में लेट नाईट देखी जा सकती है | जब बोतल अन्दर जाती है तब इन नामधारी   सुसंस्कृत महाविद्वानों का आदर्श और नैतिक आवरण तार- तार होकर बाहर आने लगता है | हो सकता है कि अपने बचाव की दलील  में मीडिया वाले उस पर अपनी निजता का लेबल चस्पा कर दें | तो निजता क्या केवल मीडिया वालों की ही होती है ? फिर दूसरे लोगों की निजता को उधेड़ने का मीडिया को क्या हक़ है ? मुझे इस बाबत  एक  पुलिस वाले का एक मौलाना के लिए कहा गया वो  शेर याद आ रहा है |
       ये कैसा इन्साफ है , ऐ हजरते मौलाना |
      हम लें तो घूस और आप ले तो नजराना ||
अंत में यहाँ साफ़ तौर पर यह कहा जा सकता है कि अपने संवाद व संप्रेषण हेतु 5 डब्ल्यू ह्वाट, ह्वेन,व्हेयर, हू और ह्वाई से शुरू होने वाली मीडिया अब  3 डब्ल्यू यानी वूमेन, वाइन और वेल्थ में अटक कर रह गयी है |
                             मुनीर अहमद मोमिन
    

Saturday, November 27, 2010

be lagam: फेसबुक का चक्कर

be lagam: फेसबुक का चक्कर: " फेसबुक का चक्कर उधर सारे नेताओं ने, दिल्ली में धमाल कर दिया | इधर आलू ,प्याज ,लहसून ने कमाल कर दिया || बस मेरी इत्ती-..."

फेसबुक का चक्कर

             फेसबुक का चक्कर   
 उधर सारे नेताओं ने, दिल्ली में धमाल कर दिया  |
इधर आलू ,प्याज ,लहसून ने कमाल कर दिया ||
बस मेरी इत्ती- सी  फरमाइश पर बवाल कर दिया ||
हम से बेहतर ए. राजा थे जो चाटे खूब मलाई  | 
मैंने सनम से की थी नाश्ते की  गुजारिश | जब जनता का नंबर आया तो मिस काल कर दिया ||
उधर बिहारी जनता ने वोटो के तमाचों से |
सारे विरोधियों  का मुंह लाल कर दिया  ||
ये कैसा 'फेसबुक ' का चक्कर चला है 'मोमिन' |
चौपट समय का सारा सुर-ताल कर दिया ||   
          मुनीर अहमद मोमिन 
             फेसबुक का चक्कर   
 उधर सारे नेताओं ने, दिल्ली में धमाल कर दिया  |
इधर आलू ,प्याज ,लहसून ने कमाल कर दिया ||
बस मेरी इत्ती- सी  फरमाइश पर बवाल कर दिया ||
हम से बेहतर ए. राजा थे जो चाटे खूब मलाई  | 
मैंने सनम से की थी नाश्ते की  गुजारिश | जब जनता का नंबर आया तो मिस काल कर दिया ||
उधर बिहारी जनता ने वोटो के तमाचों से |
सारे विरोधियों  का मुंह लाल कर दिया  ||
ये कैसा 'फेसबुक ' का चक्कर चला है 'मोमिन' |
चौपट समय का सारा सुर-ताल कर दिया ||   
          मुनीर अहमद मोमिन 

Friday, November 26, 2010

नीतीश बनाम फिनीश

नीतीश फिनीश हो गया ये लालू के शत प्रतिशत शब्दशः वे बोल हैं जो लगभग  आज  से डेढ़  दशक पहले  लालू यादव ने नीतीश कुमार द्वारा अपना साथ छोड़ने के बाद पटना के एक प्रेस कान्स्फ्रेंस में नीतीश का मखौल उड़ाते हुए कहा था | ये बोल लालू और नीतीश सहित मीडिया वाले भी भूल गए थे | लेकिन बिहार विधान सभा के हुए चुनाव में बिहारी जनता ने उस लालू जी को ही कम्प्लीट  फिनीश कर दिया, जिन्होंने अपनी लुगाई को एक लम्बे अर्से तक  मुख्यमंत्री की कुर्सी पर चिपकाकर चरवाहा की तरह पूरे बिहार को हांका है | हालाँकि  तमाम  खबरिया  चैनलों  सहित अखबारों  में बिहार के चुनाव बाबत  इतना विश्लेषण  हो चुका है कि  अब इस  विषय  पर चर्चा  करना  कुछ  खास  नहीं  होगा | फिर  भी इस सम्बन्ध  में बहुत  सारे  अनछुए  पहलू  हैं जिन्हें  कांग्रेस, लालू, पासवान  सहित  उस भाजपा  को भी गौर करना पड़ेगा जो बिहार में ९०  फीसदी से भी ज्यादा मिली अपनी अप्रत्याशित जीत से बम-बम है | यूँ तो सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर भारतीय राजनीति में गैर कांग्रेस  और  गैर भाजपा  लगभग  सभी नेताओं ने अपनी-अपनी दुकान खोल रखी  है | लेकिन नीतीश  कुमार को छोड़कर  शायद  किसी  ने आम जनता की नब्ज पकड़कर इस तरह का शुद्ध देशीय उपचार किया हो | 
                                                                            मुनीर अहमद मोमिन

Tuesday, November 23, 2010

be lagam: छिड़ना मुंबईवाली का दिल्ली में

be lagam: छिड़ना मुंबईवाली का दिल्ली में: " महिला राष्ट्रपति वाले देश और महिला ही मुख्यमंत्री वाले प्रदेश की राजधानी दिल्ली में गुल पनाग छिड़ क्या गयी मीडिया ने इसे लेकर वैचारिक सर..."

छिड़ना मुंबईवाली का दिल्ली में

    महिला राष्ट्रपति वाले देश और महिला ही मुख्यमंत्री वाले प्रदेश की राजधानी दिल्ली में गुल पनाग छिड़ क्या गयी  मीडिया ने इसे लेकर वैचारिक सर्वे और प्रतिक्रियाओं की शाब्दिक जंग ही छेड़ दी | इलेक्ट्रानिक मीडिया ने तरह-तरह के विश्लेषणों के जरिये भारतीय  जनता को जबरन अपनी  समझ  ड्राप पिलाना शुरू कर दिया | कि दिल्ली से मुंबई कैसे अच्छी है | क्योकि मुंबई में लडकियों के छिड़ने का कोई खतरा नही रहता | जबकि दिल्ली में छेड़ने वाले छेड़कर ही छोड़ते हैं | 
    भाई, छिड़ना,छेड़ना यह कोई भौगोलिक, नागरी, प्रांतीय  अथवा देशीय प्रवृत्ति  नही होती | बल्कि यह एक सहज विपरीत लिंगी  रूग्ण मानसिक प्रवृत्ति  होती है | इसलिए इस प्रवृत्ति के लोग जहां भी रहेंगे छेड़ने-छिडाने का काम होता ही रहेगा | चाहे दिल्ली हो या मुंबई, पंजाब हो या कश्मीर, कोलकाता हो या पटना, राजस्थान हो या गुजरात, लखनऊ हो या बंगलूरु या हैदराबाद | इस तरह के "छेडू जीव "  हर जगह पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं | और इस तरह की देश में हजारों घटनाएँ प्रतिदिन घटती हैं | लेकिन छिड़ना उन्ही का पानीपत के युद्ध के माफिक ऐतिहासिक हो जाता है जो कथित तौर पर सेलीब्रेटी होते है | उनके  छिड़ते ही परम  जागरूक  मीडिया  सहित समाज सेवकों यहाँ तक कि राजनेताओं में भी तर्क-कुतर्क-वितर्क-सतर्क की जंग छिड़ जाती है | यदि किसी भाजपा शासित प्रदेश में कोई महिला छिड़ती है तो कांग्रेसी कहते है कि भाजपा के शासन में महिलाएं महफूज नही | यही कारनामा कांग्रेसी राज में हो तो भाजपा कांग्रेस राज में नारियों को असुरक्षित बताने लगती है | इस तरह गुल पनाग दिल्ली में छिड़ने वाली कोई प्रथम भरतीय महिला या मुंबई वासी नही हैं | स्मृता ईरानी को भी लोकसभा के चुनाव में पर्चा दाखिला के दौरान किसी ने जबर्दस्त छेड़ दिया था | तब इल्जाम दिल्ली के युवा कांग्रेसियों पर आया था |
                                                
                                                                           मुनीर अहमद मोमिन            

Monday, November 22, 2010

be lagam: राजयोग बनाम सत्ताभोग

be lagam: राजयोग बनाम सत्ताभोग: " माया मिले न राम शीतकाल शुरू होते ही इन दिनों राम और माया में ठना शीत युद्ध अब राजनै..."

राजयोग बनाम सत्ताभोग

                                                        माया मिले न राम
शीतकाल शुरू होते ही इन दिनों राम और माया में ठना शीत युद्ध अब राजनैतिक अखाडा की शक्ल अख्तियार करते जा रहा है | बात यहाँ योग गुरू बाबा रामदेव उर्फ़ रामकिसन यादव और उत्तर-प्रदेश की चिरकुवांरी  मुख्यमंत्री बहन मायावती की चल रही है | माया-राम में तनातनी की गांठ पिछले १७ मार्च को बसपा की २५वी  वर्षगांठ पर होने वाले एक समारोह में पडी थी | जिसमें  सुश्री  मायावती ने  बिना राम का नाम लिए कहा था कि एक बाबा है जो लोगों को कसरत सिखाता  है तथा राजनीति में भी आना चाहता  है | बस तब से लेकर योग वाले रामदेव से सत्ताभोग वाली मायावती में छत्तीस  का आंकड़ा  बना  है | वैसे  किसी  महिला  से बाबा रामदेव का यह  कोई पहला  पंगा  नहीं  है  | ऐसे प्रसंग  का शुभारम्भ  सबसे  पहले  अपने  कामरेड  प्रकाश  करात की लाल बिंदी वाली लुगाई  सांसद वृंदा  करात से हुई  | फिर  "चरित्रता "  के  मामले में संभावना  सेठ  आदि  जैसी  अत्याधुनिक  जगत  की महिलाओं  ने भी बाबा पर आँखें  तरेरा था | बाबा रामदेव अपने साथ  देश  की सौ  करोंड़ जनता  होने का दावा  करते हैं | उन्होंने  योग शिविर के माध्यम  से भ्रष्टाचार  के खिलाफ  भी अभियान  छेड़  रखा है | इसलिए  २१ नवंबर  को जिला प्रशासन  ने उत्तर-प्रदेश के महाराजगंज  में बाबा रामदेव के योग शिविर पर रोक लगा   दिया | उखाड़-पछाड़  की राजनीति की सिद्धहस्त  मायावती  ने एक तो यह भांप  लिया  है  कि निकट  भविष्य  में  यह बाबा उनके राह  में बांधा बन  सकता  है | दूसरे मायावती बाबा को रामदेव न मानकर  यादव कुनबा  से जोड़कर  इन्हें  मुलायम  यादव और लालू यादव की श्रेणी  में डालकर  देख  रहीं  हैं | और यादवी  राजनीति से मायावती की राजनैतिक दुश्मनी  और खुन्नस  जग  जाहिर  है | संभावित  तौर  पर यदि  उत्तर-प्रदेश में बाबा रामदेव  और मुलायम इकट्ठा हो गए  तो बहन जी  के हाथी  की हालत  पतली  होना  अवश्यंभावी है |  निःसंदेह  बाबा रामदेव के योग शिविर से बहुसंख्य लोग  लाभान्वित  हुए  हैं  और उनसे  काफी  लोग जुड़े  हैं | लेकिन कोई  जरूरी  नहीं कि योगों  का आसन  बाबा को राजनैतिक सिंहासन  दिला  ही दे | क्योंकि  भारत  की जनता का अजीबो-गरीब  स्वभाव  है | वह  जिस  गति  से सर पर बिठाना  जानती  है, उससे  द्रुतगति  से पैरों  तले रौंदना  भी जानती है |
                                                                                                                 मुनीर  अहमद  मोमिन
      

Saturday, November 20, 2010

be lagam: देश में मध्यावधि चुनाव की शोशेबाजी

be lagam: देश में मध्यावधि चुनाव की शोशेबाजी: " कांग्रेस ने चला विरोधियों की हवा निकालने का दांव २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले में भारतीय संसद के सत्र का दो सप्ताह पूरी तरह बर्बाद हो..."

देश में मध्यावधि चुनाव की शोशेबाजी

       कांग्रेस ने चला विरोधियों की हवा निकालने का  दांव
     २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले में भारतीय संसद के सत्र का दो सप्ताह पूरी तरह बर्बाद होने के बाद केंद्र सरकार परेशान तो है लेकिन वह विपक्ष के सामने झुकने को बिल्कुल तैयार नही है | इसलिए कल राजधानी में कांग्रेस के रणनीतिकारों ने " ऑफ़ द रिकार्ड" के नाम पर शोशा  छोड़ दिया कि संसद में जारी गतिरोध के मद्देनजर कांग्रेस मध्यावधि चुनाव को भी वैकल्पिक समाधान की दृष्टि से देख रही है | कांग्रेस को यह आशा है कि मध्यावधि चुनाव का नाम सुनते ही शायद विपक्ष के तेवर ढीले पड़ जायेंगे और उनकी हवा निकल जायेगी | हालांकि राजनैतिक जगत की बहन मायावती और जगत अम्मा जयललिता मध्यावधि चुनाव के लिए प्रथम दृष्टया तैयार नज़र आती हैं | क्योंकि जयललिता को लगता है कि २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले के सहारे सत्तारूढ़ डीएमके के करुणानिधि का तमिलनाडू में चश्मा उतरवा लेंगी | और कुछ यही हाल बहन मायावती का भी है | उनका तो हाथी चुनावी दंगल रौदने के लिए चौबीसों घंटा हमेशा तेल-पानी लगाकर तैयार रहता है | लेकिन अन्य राजनैतिक दलों भाजपा,सपा,राजद, जेडीयू और कामरेड बन्धुओं की पार्टी के पहलवान  भी अभी चुनावी दंगल में लंगोट कसने के मूड में बिल्कुल नही दिखते | उधर राहुल गाँधी की पुरजोर वकालत के बावजूद राजधानी में यह  अफवाह थमने का नाम नही ले रही है कि प्रधानमंत्री स्तीफा दे सकते हैं | क्योंकि इन दिनों वह काफी विचलित हैं | बेचारे सीधे-सादे  मनमोहन सिंह को सुप्रीमकोर्ट के कमेन्ट से ज्यादा बयान-ए-राजा परेशान कर रहा है कि वह उन्होंने "सब कुछ " प्रधानमंत्री की जानकारी में किया है | राजा के इस बयान पर प्रधानमंत्री को अपनी चुप्पी तोड़ते हुए यह कहना पड़ा कि दोषी बख्शे नही जायंगे | फिर भी प्रधानमंत्री के स्तीफे की आशंकाओं और कुशंकाओं के बीच शेयर मार्केट की नाव आज  भी सेंसेक्स के भंवर में हिचकोले खा रही है | 

                         शेरवानी खूंटी पर 
   अब बात महाराष्ट्र में मंत्री बनने के लिए सर्वाधिक प्रबल उतावले हुसैन दलवाई की | कथित प्रगतिवादी विचारधारा वाले मुसलमान नेता की फ्रेम में जबरन अपना फोटो चस्पा करने वाले दलवाई को  खुद पृथ्वी बाबा ने गुरूवार को फोन करके कहा कि मियाँ दलवाई मिठाई के लिए हलवाई को आर्डर देने के साथ-साथ बतौर शिक्षा मंत्री शपथ के लिए शेरवानी आदि का इंतजाम कर लो | लेकिन पता चला कि गुरूवार को आधी रात बाद दिल्ली के एक बड़े मुस्लिम नेता ने बकरीद के शुभ अवसर पर दलवाई को हलाल कर दिया | उसने कांग्रेस आला कमान को इनकी कुंडली बता दिया कि  महाराष्ट्र में कभी मुलायम के साइकिल सवार रह चुके दलवाई कांग्रेस संगठन में भी व्यापारिक व्यवहार के लिए कुख्यात रहे हैं | जिससे  कांग्रेस हाई  कमान ने दलवाई के मंत्री मेल डाट काम को लाग आउट कर दिया |                                                           मुनीर अहमद  मोमिन          

Friday, November 19, 2010

be lagam: हाई कमान यानि ऊँचा और टेढा

be lagam: हाई कमान यानि ऊँचा और टेढा: " चव्हाण को हाई कमान की पहली चपत पीएमओ में बतौर राज्यमंत्री एक अर्सा गुजारने के बाद महाराष्ट्..."

हाई कमान यानि ऊँचा और टेढा

                                            चव्हाण को  हाई कमान की पहली चपत 
   पीएमओ में बतौर राज्यमंत्री एक अर्सा गुजारने के बाद महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले पृथ्वीराज चव्हाण को लगता था कि प्रधानमंत्री और कांग्रेस हाई कमान से नजदीकी के कारण  वे महाराष्ट्र में खुलकर फरुखावादी खेल खेलेंगे | इस लिए उन्होंने एलाने पृथ्वी कर दिया कि महाराष्ट्र सरकार  के गठन में कुछ कटु निर्णय लेने पड़ेंगे | बस इत्ती जरा सी बात को मीडिया जगत ने समझ लिया कि पृथ्वी मंत्रिमंडल दूध से धुला झक सफेद बेदाग़ होगा | और मीडिया ने एक हफ्ते तक इसे मथकर दूध से बरास्ता दही, मट्ठा की तरह पनियाला कर दिया | जिससे  मंत्रिमंडल गठन के बाद मंत्रियों के नामों को देखकर लोगों के मुहं में खटास पैदा हो गयी | 
    सच तो यह है कि मनमोहन और सोनिया से नजदीकी के कारण पृथ्वी बाबा ने यह मुगालता पाल लिया था कि वे जो कहेंगे या करेंगे हाई कमान उस पर आँख मूदकर अपनी मुहर लगा देगा | लेकिन हाई कमान ने मंत्रियों की जो लिस्ट पकडाई उसे नश्वर पृथ्वी बाबा के नीचे से जमीन खिसक गयी जिससे  उन्हें शेषनाग का फन नजर आने लगा, जिस पर सारस्वत पृथ्वी माता टिकी हैं | इस तरह उन्हें अबोल इशारे में समझा दिया गया कि चूंकि वास्तविक पृथ्वी भी शेषनाग के फन पर ही टिकी है | इस लिए तुम अपने भी नाम की सार्थकता सिद्ध  करते हुए मंत्रिमंडल में फनकार / फनधारी मंत्रियों को टिकाओ | 
     इस तरह राजनैतिक जीवन में पहली बार पृथ्वी बाबा को यह ज्ञान हुआ होगा को हाई कमान क्यों हाई कमान कहलाता है |  क्योंकि  हाई मतलब ऊंचा और कमान मतलब आकृतिक रूप से टेढा | सिद्ध यह हुआ कि जो ऊंचा और टेढा हो उसे हाई कमान कहते हैं | उम्मीद है कि इसे समझने के लिए पृथ्वीराज चव्हाण को भविष्य में ट्यूशन लेने की जरूरत नही पड़ेगी | 
     खबर है कि मुख्यमंत्री घोषित होते ही स्वच्छता के नाम पर मंत्री सफाई की झाडू मार अभियान चलाने की शंका के मद्देनज़र यहाँ  के फनकार  नेताओं  ने पृथ्वी बाबा की कुंडली की  भी हाई कमान के सामने पटेलगिरी  करवा दी | कि वर्तमान चव्हाण की कमीज भी भूतपूर्व चव्हाण की कमीज से कोई ख़ास उजली नही है | पृथ्वीराज चव्हाण ने भी अजमेरा बिल्डर द्वारा निर्मित वीनस को-आपरेटिव हाउसिंग सोसायटी वडाला में आर्थिक पिछड़े वर्ग के कोटे से अपनी वार्षिक आय मात्र ७६ हजार रूपये बताकर फ़्लैट हथियाया है | जिसका ब्योरा उन्होंने राज्यसभा चुनाव के दौरान अपनी संपत्ति घोषणा के दौरान नही दिया है | इसलिए उन्होंने भी जनप्रतिनिधित्व कानून १९५१ के मुताबिक़ आदर्श आचार संहिता का घोर उलंघन किया है | इस तरह हाई कमान ने फुदक रहे पृथ्वी को टप्पू मारकर जमीन दिखा  दिया | 
                                                   मुनीर अहमद मोमिन                       

be lagam: सौ वक्ता एक चुप हरावे

be lagam: सौ वक्ता एक चुप हरावे: " घोटालों के सवालों पर चौतरफा हमला झेल रहे देश के नितांत शरीफ अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने पूर्ण रूपेण इस मुहावरे को आत्मसात कर लिया है, ..."

सौ वक्ता एक चुप हरावे

  घोटालों के सवालों पर  चौतरफा हमला झेल रहे देश के नितांत शरीफ  अर्थशास्त्री  प्रधानमंत्री ने पूर्ण रूपेण इस मुहावरे को आत्मसात कर लिया है, कि एक चुप हजार चुप या सौ वक्त एक चुप हरावे | प्रधानमंत्री की चीरचुप्पी या मौन धारण को देश की सर्वोच्च अदालत भी नही डिगा सकी |   इससे पहले तो विपक्ष प्रधानमंत्री को घेरकर संसद में कबड्डी-कबड्डी खेलना चाहता था | लेकिन प्रधानमंत्री की ख़ामोशी  को देखकर अब भाजपा ने भी राग भैरवी  छेड़ दिया है कि कुछ  तो बोलिए  सिंह  साहेब | लेकिन सिंह साहेब हैं  कि प्रण  कर बैठे हैं कि "मैंना बोलूँगा, कुछ ना बोलूँगा" जबकि सिंह नामक जीव दहाड़ने के लिए मशहूर है| लेकिन अपने सिंह चुप रहने के लिए प्रसिद्ध हैं| विनोदी और मनोवैज्ञानिक प्रवृत्त के लोग भाजपा को यह सलाह दे सकते हैं कि हल्के आसमानी पगडीवाले सिंह के बगल में अगर वह अपने नवजोत सिंह सिद्धू को लगा दे तो शायद  खरबूजा को देखकर खरबूजा रंग बदल दे| या चल चित्र के  माध्यम  से  भाजपा  में  चलती चलाने वाले  शत्रुघ्न सिन्हा , हेमा मालिनी, विनोद खन्ना  और स्मृति ईरानी  आदि  की  टीम  बनाकर  मनमोहन  सिंह  को घेरवाकर ये  सम्पादित  पैरोडी  गवाना  शुरू  कर दें  कि  "चुप -चुप  पड़े  हो , जरूर  कोई  घात है |  ये घोटालों  की बात है, ये घोटालों  की बात है"| लेकिन  मुझे  नहीं  लगता कि प्रधानमंत्री  को घेरकर  विपक्ष  अपना  उल्लू  सीधा  कर पायेगा | मनोवैज्ञानिक  विश्लेषकों की राय  है कि विपक्ष समझ  रहा  है कि उसने  प्रधानमंत्री  की बोलती  बंद  कर दिया  है| जबकि  प्रधानमंत्री मन  ही मन कह रहें है कि -
विपक्ष कर रहा है, मेरी  खामोशी  का तवाफ़ |
और देश समझ रहा है, कि कश्ती भंवर में है || 
                                                                          मुनीर अहमद मोमिन   

Wednesday, November 17, 2010

टाटा का चांटा

उद्योगपति रतन टाटा ने रिश्वत मांगने का आरोप ऐसे समय पेश किया है , जब भारतीय संसद में २ जी स्पेक्ट्रम भ्रष्टाचार के तार झनझना रहें हैं | एक दशक बाद अपनी लम्बी चुप्पी तोड़ने वाले टाटा ने यही मौका क्यों चुना ये भी शोध का विषय हो सकता है| अभी पिछले पखवाड़े अमेरिकी  राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा एवं उनकी लुगाई द्वारा ममता दीदी की आँखों में खटकने वाली अपने नैनो की तारीफ से गदगदाए टाटा ने आरोप का ऐसा गदा घुमाया है कि कई राजनेता चकरघिन्नी बन गए हैं| इसमें पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री सी.एम.इब्राहिम ने तो "घूसमंगता मंत्री" का नाम सार्वजनिक न करने पर  आत्महत्या करने तक की धमकी दे डाला है|  वहीं टाटा के चांटा से भाजपा में भी हलचल मच  गयी है| सिंगापुर एयर लाइन्स  के साथ मिलकर भारत में अपनी  एयर लाइन्स शुरू करने का जो प्रस्ताव १९९० के दशक में टाटा ने केंद्र सरकार को दिया था| उस समय केंद्र में अटल विहारी वाजपेयी की सरकार थी और उड्डयन मंत्री अनंत कुमार तथा घोषित सूचना प्रसारण मंत्री एवं अघोषित फंड मैनेजर स्व. प्रमोद महाजन थे| इसके बाद १९९६ में केंद्र में घोर निद्रा पुरूष एच.डी.देवगौड़ा  की सरकार थी| जिसमें सी.एम.इब्राहिम नागरिक उड्डयन मंत्री थे| इसमें कांग्रेस के लिए ये राहत की बात है कि उस  वक्त केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार थी| मौजूदा  समय में देश के सभी प्रान्तों सहित केंद्र में भी भ्रष्टाचार की ज्वालामुखी धधक रही है| इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर हो रहे रामकिसन यादव उर्फ़ बाबा रामदेव ने अपने लिए जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा मांगी है| पेट फुलाने पचकाने के योग में माहिर बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से जहाँ  भ्रष्टाचारी अपने पेट में लात लगने से आशंकित होकर पिचक रहे हैं| वहीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के भी पेट में मरोड़ हो रहा है| जिनके खिलाफ उनकी भारत स्वाभिमान संस्था ने अभियान छेड़ रखा है 
                                                 मुनीर अहमद मोमिन

Tuesday, November 16, 2010

राखी माता की जय हो

        आप आश्चर्य में पड़ गए होंगे कि  राखी और माता यह परम विरोधीवाची शब्द एक साथ कैसे तो भाई वह यूं कि दो ही माता को बलि पसंद है | एक सनातन कालीन कालीमाता और अब कलियुगी नईनवेली राखी माता भी बलि लेने लगी है | इस क्रम में  लक्ष्मणप्रसाद अहिरवार नामक एक २५ वर्षीय युवक का "नामर्द" नामक शाब्दिक हथियार से बलि ले लिया | यह बात हम नही बल्कि उत्तरप्रदेश के एक पुलिसथाने में दर्ज रपट और मध्यप्रदेश के इंदौर की अदालत में दायर एक याचिका कहती है | अब लाख टके की बात यह है कि राखी ने किस अनुभव या जांच पड़ताल की बिना पर मृतक युवक को नामर्द बताया यह बात अब तक रहस्य बना हुआ है | वैसे राखी सावंत की भाव भंगिमाएं अपने सबसे तेज चैनल वाले आज तक के सीधी-बात के नाम पर टेढ़ी बात करने वाले श्रीयुत प्रभु चावला जी अथवा आपकी अदालत वाले सम्मानीय रजत शर्मा जी को भले भाती हो लेकिन अभिषेक अवस्थी जैसे निरीह जीवों को यह मर्दमार महिला खौफजदा ही करती रहती है | नख से शिख तक नारी स्वतन्त्रता की पुरजोर पैरोकार राखी सावंत के डांस की थिरकनो और दलदल में फंसी भैंस की छटपटाहट में हम जैसे मोटी अक्ल वाले लोगों को कोई ख़ास अंतर नजर नही आता | दर असल राखी के नाम पर अग्नि मिसाइल की तरह काम करने वाली राखी किसी भी एंगल से राखी नही लगती | जबकि भारतीय सनातन परंपरा ने राखी को विशेष महत्व प्रदान कर रखा है | इस नाम का त्यौहार जहां भाई -बहनों के लिए विश्व प्रसिद्ध है वहीं अपने पुरखों का पवित्र नदियों में राखी प्रवाह भी एक परम श्रद्धेय अनुष्ठान है | इतना ही नही उत्तर भारतीय व्यंजनों में भौरी( बाटी ) जो राखी में सेंकी जाती है उसके लज्जत का कोई जवाब नही | अंत में चलते-चलते फ़िल्मी दुनिया के ढलान की ओर ढली एक और राखी को भी गुलजार करना चाहता हूँ | किसी जमाने में गुलजार साहेब की शरीके हयात रहीं राखी ने उस समय बोस्की का निर्माण किया था जब भिवंडी के पावरलूम उद्योग में बोस्की के बजाय केवल काटन,टू बाई टू और सिल्क के ही कपड़े तैयार होते थे | राखी जी जब तक गुलजार साहेब के सानिध्य में थी तब तक उन्होंने अपने को केवल राखी नाम तक ही सीमित रखा | लेकिन गुलजार साहेब से अलग होते ही वे राखी गुलजार लिखने लगी थी | 
                                                       मुनीर अहमद मोमिन                     

Monday, November 15, 2010

आखिर राजा का बज ही गया बाजा

                                           देश की सर्वोच्च पंचायत में कचाईन
       संसद सत्र का पिछ्ला सप्ताह सांसदों की कचाईन और किच-किच में ही निकल गया | महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को एलबीडब्ल्यू करके विकेट लेने के बाद विपक्ष एक लाख ७६ हजार करोड़  के घोटाले वाले २जी स्पेक्ट्रम की पोल खोलते हुए राजा का बाजा बजाने पर अड़ा रहा और राजा का बाजा बज भी गया | लेकिन राजा ने जाते-जाते पूर्ववर्ती एनडीए सरकार के दो संचार मंत्रियों स्व.प्रमोद महाजन और अरुण शौरी की ढोलक पर अपना थाप देना नही भूले | उन्होंने इसके लिए एनडीए के उक्त दोनों मंत्रियों को भी काजल की कोठरी में घसीटते हुए पत्रकारों को एक-एक सफाई नामा की पत्रिका भी थमा दिया | जिसमें बताया गया है कि कैसे उन्होंने अपने पूर्ववर्ती संचारमंत्रियों द्वारा स्पेक्ट्रम का लाइसेंस जारी करने वाली वर्ष १९९९ में बनी नीतियों को ही लागू करने अथवा आगे बढाने का काम किया है | 
   सच तो यह है कि सत्ताधारियों में भ्रष्टाचार ठीक उसी तरह रच बस गया है जैसे रोम-रोम में राम | क्या कांग्रेस क्या बीजेपी | सपा,बसपा,एडीएमके,डीएमके या राजद आदि इत्यादि | हाँ यह बात अलग है कि इनमे केवल बीजेपी ही अपने ऐबों को बड़ी चतुराई से ढकने और अपनी वाकपटुता से हाथी भी हजम करने का दम रखती है | इसके पात्र "कुछ" भी करके हमेशा आदर्श रहते है | क्योंकि  सास भी कभी बहू थी की आदर्श बहू स्मृता ईरानी की तरह | भले ही उसने अपने सीरियल में आदर्श बहू का अद्वितीय नमूना पेश करते हुए कमोबेश आधा दर्जन खसमपात्र बदलने के बावजूद अन्तत: आदर्श बहू बनी रही और अपने नाम के आगे ईरानी लगाकर भी ठेठ  हिन्दुस्तानी पार्टी की पदाधिकारी बनी रहीं | बहरकैफ बात भ्रष्टाचार की चल रही थी | क्या वास्तव में इस पर नरेन्द्र मोदी अथवा ममता बनर्जी जैसे चंद राजनेताओं को छोड़कर मुलायम,लालू,जयललिता,माया या इन जैसे सैकड़ों राजनैतिक काया को बोलने का नैतिक अधिकार है ? 
    महाराष्ट्र   के आदर्श सोसायटी घोटाले ने अशोक चव्हाण को मुख्यमंत्री से पैदल कर दिया | लेकिन विलासराव और सुशीलकुमार शिंदे अभी भी उसी यूपीए सरकार के सर पर भरतनाट्यम कर रहे हैं | क्या कांग्रेस,सोनियां गाँधी और मनमोहन सिंह को इसका पता नही है ? या इसे केवल अहमद पटेल की  कलाकारी का  ही कमाल कहा जायगा | अंत में अशोक चव्हाण के लिए इतना इशारा जरुर करना चाहूँगा कि भविष्य में पटेल की पटेलगिरी चमकाने वाले कभी किसी  लकडावाले से लकड़ीबाजी का लफडा  मत करना | नही तो फिर किसी जैन के माध्यम से आपका चैन हराम हो जायेगा |
                                                                                                मुनीर अहमद मोमिन                

मजदूरों की चिंता कौन करेगा ?

प्रसंग वश अपनी बात इस लोकोक्ति के साथ शुरू करना पद रहा है कि " मार पड़ी जब शमसीरों की,महाराज मैं नाई हूँ "| यह शतप्रतिशत यहाँ के पावरलूम मालिकों पर लागू होती है | जब लूम ठीक-ठाक चलता है तब पावरलूम मालिक शेरो की तरह गर्जना करते फिरते हैं  | लेकिन जरा सा टैक्स आदि, धागे का भाव और बिजली का बिल आदि दाएं-बाएं होने पर यह लोग सियार की तरह हुआं-हुआं करना शुरू कर देते हैं | हालांकि पावरलूम मालिकों के समक्ष उत्पन्न हुई इस दुखद घड़ी में मैं पूर्ण रूपेण इनके साथ हूँ | लेकिन मैं इनके तरह इनके उद्योग के वाहक पावरलूम मजदूरों के भी हितों को कत्तई नजर अंदाज नही कर सकता | यह सच है कि पावरलूम उद्योग पिछले पचास वर्षों से तरह-तरह की परेशानियों को झेलते हुए निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर है | और इसका प्रभाव पावरलूम मालिकों के उपर भी देखने को मिल रहा है | जिससे खोली में रहने वाला सेठ फ्लैटों और बगलों में रहने लगा | पैदलिया और सैकिलिया सेठ विभिन्न माडलों की चमचमाती कारो में चलने लगा | पांच,दस-बीस पावरलूम वाला सेठ कई पावरलूम शेडो का मालिक बन बैठा | लेकिन उसी समय का मजदूर आज भी मजदूर और पैदलिया ही है | हाँ,उसने इस अवधि में इतना तरक्की जरुर कर लिया कि जो पहले उसकी लकड़ी की फलटी की दीवार थी वह ईंट की और छत कबेलू के बजाय सीमेंट के पतरों की हो गयी है | मजदूरी आज भी वहीं की वहीं है | कोई भी कारोबार या उद्योग मालिक और मजदूर के समानुपातिक आर्थिक तालमेल की बुनियाद पर ही विकसित होता या जीवंत होता है | पावरलूम मालिको ने धांगों की कीमतों के बढ़ोत्तरी के विरोध में १६ नवंबर से २० नवंबर तक पांच दिवसीय हड़ताल का ऐलान कर दिया है | लेकिन इस अवधि में  मजदूरों के होने वाले आर्थिक नुकसान का क्या ? क्योकि जब लूम चलता है तभी उनको मजदूरी मिलती है |
                                                मुनीर अहमद मोमिन     

Sunday, November 14, 2010

वेलडन पुलिस के कमिश्नर

                      वेलडन पुलिस के कमिश्नर                                            

आधा दर्जन माह से कम अवधि में ही रिटायर होने वाले ठाणे पुलिस आयुक्तालय के  पुलिस आयुक्त एस.पी.एस.यादव ने ठाणे पुलिस आयुक्तालय के सभी ३१ पुलिस थानों में  एक बहुत ही जनपयोगी व अभिनव अभियान की शुरुआत करते हुए पुलिस से  संवंधित विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ देने एवं पुलिस और जनता के बीच संवाद व  समन्वय स्थापित करने के लिये  सभी पुलिस स्टेशनों में जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) नियुक्त कर दिया है | जिनसे जनता की मुलाक़ात  पुलिस स्टेशन में घुसते ही हो जायेगी |
 पुलिस आयुक्त एस.पी.एस.यादव ने नों में जनसंपर्क अधिकारी नियुक्त कर दिया है | पुलिस स्टेशनों में तैनात यह जनसंपर्क अधिकारी पुलिस स्टेशन के मुहाने पर ही टेबल लगाकर बैठे रहकर  पुलिस स्टेशन में   आने  वाले लोगों को तथोचित मार्गदर्शन एवं  जानकारियाँ देंगे | शांतिनगर पुलिस स्टेशन के सीनियर इंस्पेक्टर भारत  निंबालकर ने स्वयं  पुलिस आयुक्त एस.पी.एस. यादव के कार्यों की सराहना  करते हुए बताया कि पुलिस और जनता के बीच की संवाद हीनता की खाई को पाटकर  समन्वय स्थापित करने के लिए ही इस अनूठे अभियान की शुरुआत की  है | जिससे  पुलिस स्टेशन में शिकायत लेकर आने वालों को किस अधिकारी से मिलना है,कौन अधिकारी कहाँ बैठा है,आया है या छुट्टी पर है | यह  सभी जानकारियाँ बिना भटके लोगों को  पीआरओ से ही मालूम हो जायगी |
       इस तरह के सार्थक अभियान की आवश्यकता एक लम्बे अरसे से महाराष्ट्र क्या पूरे देश के पुलिस थानों में इस आपेक्षा के साथ की जा रही थी कि इससे जहां पुलिस विभाग से संवन्धित कामों को करने में आम लोगों को काफी आसानी होगी वहीं पुलिस और जनता के बीच बेहतर तालमेल होने से पुलिस विभाग के साथ फेबीकोल से  जुड़े दलाल नामक जैविक  महामारी से भी लोगों को राहत होगी |
                                                                                             मुनीर अहमद मोमिन                                                                                               
                                                                                        

Saturday, November 13, 2010

एमपी साहेब का नो बाल

                                           एमपी साहेब का नो बाल
आज दिनांक १३ नवंबर को धागों के भाव में हुए बेतहाशा वृद्धि को लेकर विधायक अब्दुल रशीद ताहिर मोमिन की पहल पर हुई  एक सर्वदलीय बैठक में अपने को भिवंडी का प्रथम सांसद कहलाने का प्रबल राज रोग पाले श्री सुरेश टावरे के हवाले से कही गयी यह बात लोग डेढ़ दर्जन पचनोल की गोली खाकर भी यह नही पचा पा रहे हैं कि उन्हें पावरलूम से जुडी समस्याओं के बारे में उन्हें कोई बताता नही | जिससे वे उसका निदान कर सकें  | श्री टावरे देश की संसद में उस शहर का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे देश की  विद्युत करघा नगरी और हिन्दुस्तान का मानचेस्टर कहा जाता है | इतना ही नही यह शहर देश की आवश्यकता का कमोबेश तकरीबन ५० फीसदी कपड़े की आपूर्ति अकेले करता है | और यदि ऐसे शहर का कोई जनप्रतिनिधि सार्वजनिक मंच से यह कहे कि उसे इस शहर की रीढ़ के हड्डी की हैसियत वाले पावरलूम उद्योग के लिए लगने वाले धागों की कीमतों की कोई जानकारी नही है तो हमारे समझ से इस पर कोई टिप्पणी करना "टिप्पणी शब्द" के साथ बलात्कार करने जैसा है | आखिर टावरे साहेब जैसी  महान आत्माएं राजनीति में किस मकसद से आती हैं | जिन्हें शहर की समस्याओं, उद्योगों,क्रियाकलापों और भौगोलिक स्थितियों आदि की जानकारी ही नही होती | यहाँ की आम जनता प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह सहित कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गाँधी से निवेदन करती है कि यदि कांग्रेस अपने जनप्रतिनिधियों के लिए क्षेत्रीय संवेदनहीनता का कोई जन पुरस्कार निकट भविष्य में  तय करने वाली है तो हमारे शहर के प्रथम सांसद के नाम को ही इस प्रथम पुरस्कार के लिए प्राथमिकता के साथ अवश्य चयनित करें |ताकि पूरा देश जान सके मजदूर बहुल्य भिवंडी शहर का एमपी भी वुद्धि विवेक से मजदूर बहुल्य ही है |  ...............    मुनीर अहमद मोमिन      
       

Friday, November 12, 2010

चव्हाण जी बधाई लेकिन................

                             चव्हाण जी बधाई लेकिन................     

राज्य के नव नियुक्त मुख्यमंत्री मा. श्री पृथ्वीराज चव्हाण जी का मैं भिवंडी की केवल आम  जनता के तरफ से हार्दिक अभिनन्दन  करते हुए यह अपेक्षा करता हूँ कि विल्डरों और धन्नासेठों के बजाय महाराष्ट्र के निचले लोगों का भी  केवल बयानों से ही नही बल्कि कारनामों से भी ध्यान रखेगे, हालांकि वर्तमान लोकतंत्र की सत्ताधीशों से इस प्रकार की अपेक्षा करना किसी नितांत  कंगाल से सौ करोड़ रूपये का दान मांगने के समान है |