माया मिले न राम
शीतकाल शुरू होते ही इन दिनों राम और माया में ठना शीत युद्ध अब राजनैतिक अखाडा की शक्ल अख्तियार करते जा रहा है | बात यहाँ योग गुरू बाबा रामदेव उर्फ़ रामकिसन यादव और उत्तर-प्रदेश की चिरकुवांरी मुख्यमंत्री बहन मायावती की चल रही है | माया-राम में तनातनी की गांठ पिछले १७ मार्च को बसपा की २५वी वर्षगांठ पर होने वाले एक समारोह में पडी थी | जिसमें सुश्री मायावती ने बिना राम का नाम लिए कहा था कि एक बाबा है जो लोगों को कसरत सिखाता है तथा राजनीति में भी आना चाहता है | बस तब से लेकर योग वाले रामदेव से सत्ताभोग वाली मायावती में छत्तीस का आंकड़ा बना है | वैसे किसी महिला से बाबा रामदेव का यह कोई पहला पंगा नहीं है | ऐसे प्रसंग का शुभारम्भ सबसे पहले अपने कामरेड प्रकाश करात की लाल बिंदी वाली लुगाई सांसद वृंदा करात से हुई | फिर "चरित्रता " के मामले में संभावना सेठ आदि जैसी अत्याधुनिक जगत की महिलाओं ने भी बाबा पर आँखें तरेरा था | बाबा रामदेव अपने साथ देश की सौ करोंड़ जनता होने का दावा करते हैं | उन्होंने योग शिविर के माध्यम से भ्रष्टाचार के खिलाफ भी अभियान छेड़ रखा है | इसलिए २१ नवंबर को जिला प्रशासन ने उत्तर-प्रदेश के महाराजगंज में बाबा रामदेव के योग शिविर पर रोक लगा दिया | उखाड़-पछाड़ की राजनीति की सिद्धहस्त मायावती ने एक तो यह भांप लिया है कि निकट भविष्य में यह बाबा उनके राह में बांधा बन सकता है | दूसरे मायावती बाबा को रामदेव न मानकर यादव कुनबा से जोड़कर इन्हें मुलायम यादव और लालू यादव की श्रेणी में डालकर देख रहीं हैं | और यादवी राजनीति से मायावती की राजनैतिक दुश्मनी और खुन्नस जग जाहिर है | संभावित तौर पर यदि उत्तर-प्रदेश में बाबा रामदेव और मुलायम इकट्ठा हो गए तो बहन जी के हाथी की हालत पतली होना अवश्यंभावी है | निःसंदेह बाबा रामदेव के योग शिविर से बहुसंख्य लोग लाभान्वित हुए हैं और उनसे काफी लोग जुड़े हैं | लेकिन कोई जरूरी नहीं कि योगों का आसन बाबा को राजनैतिक सिंहासन दिला ही दे | क्योंकि भारत की जनता का अजीबो-गरीब स्वभाव है | वह जिस गति से सर पर बिठाना जानती है, उससे द्रुतगति से पैरों तले रौंदना भी जानती है |
मुनीर अहमद मोमिन
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