Friday, April 29, 2011
be lagam: 'माया राज' में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं !
be lagam: 'माया राज' में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं !: " उत्तर-प्रदेश सरकार के सारे दावे खोखले राष्ट्रीय महिला आयोग की बात को यदि सच माने तो महिला और दलित महिला उत्पीड़न क..."
'माया राज' में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं !
उत्तर-प्रदेश सरकार के सारे दावे खोखले
राष्ट्रीय महिला आयोग की बात को यदि सच माने तो महिला और दलित महिला उत्पीड़न की घटनाओं में अपना उत्तरप्रदेश अव्वल है | लेकिन बहन मायावती जी की सरकार पिछली सरकार के आंकड़े गिनाकर पिछले चार साल में हुई महिला उत्पीड़न की घटनाओं में कमी आने का दावा कर रही है | लेकिन जमीनी हकीकत तो यह है कि बहन जी के चार साला मुख्यमंत्रित्व काल में महिला उत्पीड़न की घटनाएं कई हजार का आंकडा पार कर चुकी है | यहाँ मैं यह बता देना जरूरी समझता हूँ कि यह आंकड़े विपक्ष के किसी दल या बहन जी के धुर विरोधी मुलायमसिंह यादव के कुनबा या रीता बहुगुणा या उनकी पार्टी कांग्रेस ने नहीं जुटाए हैं | बल्कि यह आंकड़े उत्तरप्रदेश के राज्य सरकार के अपराध अभिलेख ब्यूरो द्वारा जारी किये गए हैं |
माया राज में दलित महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा बलात्कार की घटनाएं वर्ष २००८ में ३५६ , वर्ष २००९ में २८५ व वर्ष २०१० में २८० दर्ज की गई है | दलितों के अलावा अन्य महिलाओं के साथ बलात्कार की सबसे ज्यादा घटनाएं वर्ष २००९ में हुईं | इस साल १५५२ महिलाएं बलात्कार की शिकार हुईं | जबकि इसके पिछले वर्ष वर्ष २००८ में १६९६ और उसके अगले वर्ष २०१० में यह आंकडा १२९० था | इसी तरह शीलभंग की सबसे ज्यादा घटनाएँ वर्ष २००८ में ३०२९ हुईं थीं | इसी क्रम में महिलाओं के अपहरण की सबसे ज्यादा घटनाएँ वर्ष २०१० में ४९०३ हुईं थीं | बता दें कि पिछले साल २०४५० कुल महिला उत्पीडन की घटनाएं दर्ज हुईं | मायावती सरकार के सतारूढ़ होने के छः माह बाद वर्ष २००८ में इस तरह के कुल २३३३८ दर्ज किये गए थे | आश्चर्यजनक बात तो यह है कि महिला उत्पीडन की सबसे ज्यादा घटनाएं बहन जी की पार्टी बसपा के गढ़ में ही हुईं हैं | जिसमें कई मामलों में तो बसपा के मंत्री और विधायक ही आरोपी बने हैं | इनमें से कुछ पर कार्रवाई की गाज गिरी | लेकिन जो सरकार और संगठन के लिए ज्यादा उपयोगी थे, उन्हें क्लीन चिट दे दी गई |
यह बात कहने में कोई हिचक नहीं है कि महिला मुख्यमंत्री के राज्य में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं | सरकार के तमाम दावों के बावजूद उत्तर-प्रदेश में महिला उत्पीडन की घटनाओं का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है | हाल ही में जिस प्रकार बरेली में एथलेटिक अरुणिमा को चलती ट्रेन से फेंका गया | जिसके कारण उसे अपनी एक टांग गवानी पड़ी | इससे साफ़ है कि दबंगों के आगे क़ानून व्यवस्था की प्राथमिकता बौनी साबित हो रही है | अरुणिमा से पहले भी इस तरह की दर्जनों घटनाओं को अंजाम दिया गया है | लेकिन बहन जी हैं कि अपनी 'राग भैरवी' के आगे किसी की मानने को तैयार ही नहीं हैं | भले सपा, भाजपा और कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष विरोध का 'कत्थक' और 'भरतनाट्यम' कर रहा हो |
मुनीर अहमद मोमिन
be lagam: दलाली के दलदल से 'दलालमय' होता जा रहा है देश !
be lagam: दलाली के दलदल से 'दलालमय' होता जा रहा है देश !: " सालाना ४४ हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान ? आज समूचा देश दलाली के दलदल में फंसकर दलालमय होता जा रहा है | दलालों न पूरे ..."
दलाली के दलदल से 'दलालमय' होता जा रहा है देश !
सालाना ४४ हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान ?
आज समूचा देश दलाली के दलदल में फंसकर दलालमय होता जा रहा है | दलालों न पूरे देश को और उसके सिस्टम को अपने खूनी पंजे में जकड़ लिया है | एक पुरानी कहावत है पैसा-पैसे को खींचता है | इसलिए आदमी-आदमी से दूर होता जा रहा है | सारा माल दलाल खा रहे हैं | इसलिए करोड़ों लोग रोज़ रात को भूखे ही सोते हैं | महंगाई एक प्रतिशत भी बढती है | तो ३० लाख से अधिक भारतीय गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं | जबकि दलालों को रोज़ १८० करोड़ रूपए तक फायदा होता है | इससे तीन करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता है | यह है तो एक अनुमान लेकिन इससे पता चलता है कि हम कैसे देश और कैसे समाज में रहते हैं | हमारे लिए पैसा और मनुष्य में किसकी कीमत ज्यादा है ? हममें से कुछ लोग इतना खाते हैं कि उन्हें बदहजमी हो जाती है और कितने ही लोग भूख से तडपते हुए जब मर जाते हैं | तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कोई भी बोगस बीमारी का उल्लेख कर दिया जाता है | क्योंकि भूख सबसे बड़ी बीमारी है | और भूखे व्यक्ति को कोई भी बीमारी हो सकती है | वह बीमार भी न हो तो ठंड में अकड़कर मर सकता है | गर्मी में भी वह लू लगने से मर सकता है |
फाइव स्टार होटल में कोल्ड्रिक के लिए सैकड़ों रूपए देने वाले लोगों की बीवियां बाज़ार में सब्जी खरीदने पर मोल-भाव करती दिखाई दे सकती हैं | हमारे देश में क्रिकेट में जीतने पर करोड़ों रूपए मिलते हैं | मगर जब कोई पूरा परिवार आत्म हत्या कर लेता है, माता-पिता बच्चों का गला घोंटकर या उन्हें जहर पिलाकर खुद फांसी लगा लेते हैं | तब पता चलता है कि यह मौत की नहीं बल्कि गरीबी की मार है | आप पाएंगे कि देश में कास्मेटिक्स और हर्बल प्राडक्ट्स के बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहे हैं | मगर करोड़ों बच्चों के लिए दूध तो छोड़े बीमार पड़ने पर दवा की कोई व्यवस्था तक नहीं है | ये सब मैं क्यों बता रहा हूँ ? इसलिए कि हम और आप इसी समाज में रहते हैं | भारत एक ऐसा देश है जहां कृषि उत्पादकों या किसानों का सकल घरेलू उत्पाद में या देश की कुल आय में हिस्सेदारी से ज्यादा उसी के पैदा किए गए अनाज के वायदा बाज़ार का कारोबार है | यानि कमाता है धोती वाला, खाता है टोपी वाला (नेता,दलाल) और ऐश करता है टाई वाला (अधिकारी वर्ग) |
कामन वेल्थ गेम के ही घोटाले को ले लें तो यह घोटाला चाहे ३५ हजार करोड़ रूपए का हो या ७० हजार करोड़ रूपए का | उसमें ९०० करोड़ रूपए ऐसे शामिल बताए गए हैं, जो देर से निर्णय लेने के कारण अतिरिक्त खर्च हुए | मतलब यह घोटाला एक तरह का अतिरिक्त घोटाला या एडिशनल स्कैम है | जहां तक घोटाले का मुद्दा है, सीबीआई जांच कर रही है | अब वह जांच में कितने का घोटाला पाती है | यह तो भविष्य का सवाल है | इतना जरूर है कि हमारे सिस्टम में आलस्य या लापरवाही कूट-कूट कर भरी हुई है | समय पर निर्णय नहीं लेना, लिए गए निर्णय को लागू नहीं करना पर्सेंटेज के लिए आपस में सांठ-गांठ और टेंडर प्रक्रिया में बे-वजह देरी के कारण यह अतिरिक्त खर्च बढ़ता है | यदि तीन सालों में औसत अनुमान ही लगाएं तो करीब एक लाख ३५ हजार करोड़ रूपए का नुकसान इस देरी के कारण अतिरिक्त खर्च के रूप में देश को होता है | एक अनुमान के मुताबिक़ देश भर के राज्य व केंद्र का कुल बजट ३० लाख करोड़ रूपए है | यानि महंगाई की बढती दर को १०% भी माने तो तीन लाख करोड़ रूपए का नुकसान ! यह अर्थ व्यवस्था का ऐसा छिपा हुआ पहलू है | जिसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता | हर साल ४४ हजार करोड़ रूपए से अधिक का नुकसान इसी से होता है | यह नुकसान पूरे सिस्टम में है | पंचायत स्तर से लेकर नगरपालिका, महानगरपालिका और ज़िला परिषद व अन्य सरकारी कार्यालयों, विभागों तक यदि इस पहलू को ध्यान में रखकर आडिट किया जाए तो पता चलेगा कि देश में पिछडापन इसी वजह से है |
मुनीर अहमद मोमिन
Wednesday, April 27, 2011
be lagam: चार्ज सीट में करूणा की पत्नी दयालु क्यों नहीं ?
be lagam: चार्ज सीट में करूणा की पत्नी दयालु क्यों नहीं ?: "कलमाड़ी के बाद, अब कनिमोजी की जेल यात्रा तय राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी तो नप गए और ९० दिन तक जमानत के ..."
चार्ज सीट में करूणा की पत्नी दयालु क्यों नहीं ?
कलमाड़ी के बाद, अब कनिमोजी की जेल यात्रा तय
राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी तो नप गए और ९० दिन तक जमानत के कोई आसार भी नहीं हैं | क्योंकि सीबीआई ने कोर्ट से चार्जसीट पेश करने का ९० दिन का समय माँग लिया है | इससे कलमाड़ी की ९० दिन की 'जेल बुकिंग ' पक्की मानी जा रही है | दूसरी तरफ 'वेटिंग लिस्ट' में चल रहीं वयोवृद्ध द्रमुक नेता करूणानिधि की कभी पत्रकार रहीं सांसद पुत्री कनिमोजी की गिरफ्तारी भी जल्द ही 'कंफर्म' होने वाली है | कभी अपनी धुर विरोधी जे. जयललिता को तमिलनाडू विधानसभा के दौरान सदन में ही साड़ी खिंचवाकर पेटीकोट की हालत में ला देने वाले परम राजनैतिक घाघ पुरुष करुणानिधि की अपनी बेटी पर अपनी सारी करुणाओं की समस्त निधि लुटाने के बावजूद उसकी जेल यात्रा का विधि विधान अवश्यम्भावी माना जा रहा है | इससे अम्मा जे. जयललिता पहले से भी ज्यादा फूलकर 'कुप्पा' नज़र आ रही हैं | तमिलनाडू की राजनीति में एक दूसरे को फूटी आँख भी न सुहाने वाले चश्माधारी करुणा निधि और चिरकुंवारी अम्मा जयललिता कभी भी एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते | इसी क्रम में जयललिता ने मुख्यमंत्री रहते हुए करुणा निधि का चश्मा उतारकर और लुंगी खुलवाकर अपनी साड़ी खुलवाने का ' शेम-शेम ' स्टाइल में बदला ले लिया था |
खैर यहाँ बात कनिमोजी की चल रही है | २जी स्पेक्ट्रम घोटाले के चार्जशीट में शामिल कनिमोजी कभी भी गिरफ्तार हो सकती हैं | हालांकि कनिमोजी एक सक्रिय पत्रकार व कवि भी रह चुकी हैं | लेकिन पत्रकारिता और कविता से उबकर उन्होंने २००७ में राज्यसभा के सदस्य के रूप में राजनीति में कदम रखा | सीबीआई के अनुसार उनके टीवी चैनल कलईगनर को २जी स्पेक्ट्रम घोटाले के तहत दो सौ करोड़ रूपये मिले हैं | कनिमोजी के अलावा कलईगनर टीवी के प्रबंध निदेशक शरत कुमार 'स्वान टेलीकाम' के प्रवर्तक शाहिद बलवा के भाई आसिफ बलवा 'कुसेगाव फ्रूट्स' के निदेशक राजीव अग्रवाल तथा सिनेयुग फिल्म के करीम मोरानी आदि अभियुक्त हैं | कनिमोजी की गिरफ्तारी हो या न हो लेकिन सीबीआई के चार्जसीट से एक बात तो आईने की तरह साफ़ हो गई है कि २जी स्पेक्ट्रम महाघोटाले और करुणा की द्रमुक के बीच चोली-दामन का साथ है | सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि कनिमोजी के अलावा इस मामले में करुणा की पत्नी दयालु का भी नाम चर्चा में था | लेकिन जादुई तौर पर कलईगनर टीवी में ६० प्रतिशत मालिकाना अधिकार होने के बावजूद भी दयालु का नाम सीबीआई के चार्जशीट में नहीं है |
बता दें अब तक इस मामलें में सीबीआई पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा सहित नौ लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है | दूसरी चार्जशीट में नये हाई प्रोफाइल नाम आने के बाद इस महाघोटाले का विदेश से भी कनेक्शन का खुलासा होने की उम्मीद है | यहाँ यह बताना जरूरी है कि दूसरी चार्जशीट में इस घोटाले के लिए २१४ करोड़ की रिश्वत के लेन-देन के तरीके का खुलासा किया गया है | रिश्वत के रूप में जो २१४ करोड़ की राशि दी गई है वह डीबी रियलटी के माध्यम से कुसेगाव कंपनी को फिर यही राशि सिनेयुग फिल्म्स के जरिए कलईगनर टीवी तक पहुँची | सीबीआई द्वारा पेश चार्जशीट में कनिमोजी और शरतकुमार पर घूस लेने जबकि राजीव अग्रवाल, आसिफ बलवा व करीम मोरानी पर घूस देने का आरोप है | जिसके आधार पर दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने सीबीआई की चार्जशीट को मंजूर करते हुए कनिमोजी,शरद कुमार और करीम मोरानी को सम्मन जारी किया है | जिसमें कनिमोजी को आगामी ६ मई को कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया गया है | माना जा रहा है कि इसी दिन कनिमोजी की गिरफ्तारी हो सकती है |
मुनीर अहमद मोमिन
Tuesday, April 26, 2011
be lagam: तार- तार किया बाप- बेटी के रिश्ते को !
be lagam: तार- तार किया बाप- बेटी के रिश्ते को !: " महाराष्ट्र में 11 महिला सिपाही गर्भवती दो अलग-अलग घटनाएं ! लेकिन दोनों ही जगह हवस की शिकार बनी महिलाएं | एक जगह अबला..."
तार- तार किया बाप- बेटी के रिश्ते को !
महाराष्ट्र में 11 महिला सिपाही गर्भवती
दो अलग-अलग घटनाएं ! लेकिन दोनों ही जगह हवस की शिकार बनी महिलाएं | एक जगह अबला तो दूसरी जगह पुलिस की जवान | कुल मिलाकर हम कितना ही विकास का दावा कर लें, महिलाओं के लिए जितना भी समानाधिकार का राग अलाप लें | लेकिन आज दिन भी कथित सभ्य, सुसंस्कृत और विकासवादी हाईटेक समाज महिलाओं को उपभोग की वस्तु मानने की मानसिकता से उबर नहीं पाया है | पहली घटना उत्तराखंड के पवित्र नगरी के रूप में मान्य हरिद्वार से है | जहाँ पिता और पुत्री के रिश्ते को तार-तार कर समाज को स्तब्ध कर देने वाली एक भयावह घटना में एक पिता ने अपनी पुत्री के साथ शारीरिक संबंध बनाया | इतना ही नहीं, उसके चाचा ने भी युवती को अपनी हवस का शिकार बनाया और फिर दोनों ने उसे जिस्मफरोशी के धंधे में उतरने के लिए मजबूर किया | धन के लोभी पिता ने अपनी बेटी को जिस्म का धंधा करने वालों के यहाँ भेजने के लिए तरह-तरह की यातनाएं भी दीं |
उत्तराखंड महिला आयोग में हरिद्वार की निवासी युवती ने लिखित रूप से शिकायत की है कि उसके साथ पहले उसके पिता ने शारीरिक संबंध बनाया और फिर उसके चाचा ने भी उसके साथ यही कुकृत्य किया | सामाजिक रिश्तों को कलंकित करने के बाद पिता और चाचा ने मिलकर उससे जिश्मफरोशी का धंधा करवाने के लिए भी मजबूर किया | युवती ने अपनी शिकायत में यह भी लिखा है कि पिता और चाचा ने इस घटना की जानकारी किसी को देने पर उसको जान से मारने की धमकी भी दी और पिछले तीन वर्षों से उसे इस नर्क की आग में झोंका जा रहा है | हद तो तब हो गई जब युवती की बाद में शादी करा दी गई | शादी के बाद भी पिता और चाचा उसे ब्लैक मेल करते हुए उसे फिर से धंधे में शामिल होने के लिए मजबूर करने लगे | इस दौरान इस धंधे से उबरने के लिए युवती ने कई बार अपने हाथ की नस काटकर आत्म हत्या करने की कोशिश भी की | लेकिन उसे हर बार बचा लिया गया और भावनात्मक रूप से ब्लैक मेल किया गया | इस दौरान पिता और चाचा ने कई बार अपनी पुत्री का गर्भपात भी कराया और तरह -तरह की यातनाएं भी दी |
युवती के अनुसार १७ वर्ष की उम्र से ही उससे जिश्म फरोशी कराई जा रही थी और २० वर्ष की उम्र में उसकी शादी एक स्थानीय युवक से करा दी गई | लेकिन देह व्यापार का कार्य उससे सतत कराया जाता रहा | उसे हरिद्वार के पास लक्सर था उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में जिश्म फरोशी के लिए अक्सर भेजा जाता रहा | ससुराल वालों को जब इस घटना की सूचना मिली तो उन लोगों ने युवती को न्याय दिलाने की ठानी | लेकिन युवती अब न तो ससुराल में रहना चाहती है और न ही मायके में | क्योंकि वह ऐसी शर्मनाक स्थिति को लेकर ससुराल वालों का सामना नहीं कर पा रही है |
दूसरी घटना महाराष्ट्र के कोल्हापुर से है, जहाँ ट्रेनिंग ले रही ११ महिला पुलिस कांस्टेबल यौन शोषण का शिकार होकर गर्भवती हो गईं | कोल्हापुर में महिला पुलिस कांस्टेबलों को शोषित और पीड़ित जनता की रक्षा करने के बारे में जिस पुलिस ट्रेनिग सेंटर में ट्रेनिग दी जाती है | उसी सेंटर में महिला कांस्टेबलों को एक इंस्पेक्टर ने सेक्स की ट्रेनिंग दे डाली | इस ट्रेनिंग सेंटर की ११ कुंआरी पुलिस कांस्टेबल गर्भवती हो गई हैं | पता चला है कि सेक्स की यह ट्रेनिंग इंस्पेक्टर युवराज कांबले दिया करता था | जिसे गिरफ्तार कर लिया गया है | जबकि इस बाबत कांबले का कहना है कि केवल उसे बलि का बकरा बनाया जा है | क्योंकि ट्रेनिग के दौरान कई बड़े अफसर भी लडकियों के यौन शोषण में शामिल रहते हैं | इस बीच मेडिकल टेस्ट में महिला कांस्टेबलों के गर्भवती होने की पुष्टि हो गई है | इनमें से ज्यादातर अविवाहित हैं | पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में यह गोरखधंधा किसी संगठित अपराध का हिस्सा भी हो सकता है और जांच होने के बाद कई रसूखदार लोग बेनकाब भी हो सकते हैं |
मुनीर अहमद मोमिन
Monday, April 25, 2011
be lagam: भ्रष्टाचार के आरोप में 'अण्णा' खुद घिरे !
be lagam: भ्रष्टाचार के आरोप में 'अण्णा' खुद घिरे !: " भ्रष्टाचार शिरोमणि का ताज महाराष्ट्र के सर भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सजग प्रहरी के रूप में जननायक बनकर उभरे गांधीवादी विचारधा..."
भ्रष्टाचार के आरोप में 'अण्णा' खुद घिरे !
भ्रष्टाचार शिरोमणि का ताज महाराष्ट्र के सर
भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सजग प्रहरी के रूप में जननायक बनकर उभरे गांधीवादी विचारधारा के पूर्वसैनिक किशन बाबूराव हजारे उर्फ़ अण्णा हजारे को स्वयं भ्रष्टाचार के मामले में २५ अप्रैल को पुणे की एक अदालत में पेश होना पड़ा | जज सुचित्रा एस.घोडके ने हजारे को उनके खिलाफ कथित भ्रष्टाचार के मामले की शिकायत पर अदालत में हाजिर होने के लिए नोटिस जारी किया था | हजारे के खिलाफ भ्रष्टाचार मामलें में वर्ष १९९८ में शिकायत की गई थी | शिकायत में बताया गया था कि अण्णा हजारे ने अपना ६१वां जन्म दिन मनाने के लिए अपने सार्वजनिक ट्रस्ट के दो लाख रूपये खर्च किये थे | उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा ४०६ और ४०९ के तहत मामला दर्ज किया गया था | इस बाबत अण्णा का कहना है कि यह मामला पिछले आठ वर्ष से चल रहा है और मुझे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है | मुझे अदालत में हाजिर होने के लिए कहा गया था | यह बताता चलूँ कि अण्णा के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक संगठन के अध्यक्ष हेमंत कोलेकर ने पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी, कि अण्णा ने १५ जून १९९८ को अपना जन्मदिन मनाने के लिए अपने 'हिंद स्वराज ट्रस्ट' में से दो लाख रूपये खर्च कर दिए |
इसी हफ्ते से उत्तर-प्रदेश से भ्रष्टाचार के विरोध में अभियान चलाने वाले अण्णा को वहाँ की मुख्यमंत्री बहन मायावती ने भी 'दलित नाद' करते हुए यह कह दिया है कि अण्णा पहले अपने गृह प्रदेश महाराष्ट्र का भ्रष्टाचार खत्म करें फिर उत्तरप्रदेश का रुख करें | इसी बीच राष्ट्रीय 'अपराध रिकार्ड ब्यूरो' के आंकड़ों ने भी महाराष्ट्र राज्य को भ्रष्टाचार शिरोमणि के रूप में दर्शा दिया है | भ्रष्टाचार पर देश भर में छिड़े बवाल की पृष्ठभूमि में यह बात जले पर नमक छिडकने जैसी हो सकती है | महाराष्ट्र राज्य जैसा अण्णा हजारे का गृह राज्य भ्रष्टाचार की सीढी के शीर्ष पायदान पर खड़ा है | लेकिन यहाँ दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों की संख्या के मुकाबले दोषियों को सजा दिए जाने का प्रतिशत बहुत ही कम है | राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े दर्शातें हैं कि वर्ष २००० से लेकर २००९ के बीच महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के कुल ४५६६ मामलें दर्ज किये गए, जिसमें केवल २७ फीसदी मामलों में ही आरोपियों पर दोष साबित हो पाए | इन मामलों में राज्य में नौ करोड़ रूपये की संपत्ति जब्त की गई | ब्यूरो के आंकड़ों पर नज़र डालें तो यह भी बात सामने आती है कि देश में वर्ष २००० से लेकर अब तक भ्रष्टाचार के मामलों में साल दर साल लगातार इजाफा ही होता जा रहा है | क्योकि वर्ष २००० में जहाँ देश में कुल २९४३ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किये गए | तो वहीं २००९ में ३६८३ मामले दर्ज किये गए | इन मामलों में ६० फीसदी दोष साबित हुआ और तकरीबन ६० करोड़ रूपये की संपत्ति जब्त की गई | वर्ष २००० से लेकर २००९ के दौरान महाराष्ट्र में ४५६६, राजस्थान में ३७७०, उड़ीसा में २९५७, पंजाब में २७१४ और आन्ध्र प्रदेश में २६८६ मामले दर्ज किये गए |
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जिन पांच राज्यों में भ्रष्टाचार के सर्वाधिक मामलें दर्ज किये गए उनमें से केवल आन्ध्र प्रदेश में अन्य राज्यों के मुकाबले दोषियों को सजा दिए जाने का प्रतिशत सर्वाधिक था | राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि झारखंड में भ्रष्टाचार के २२५ मामले दर्ज किये गए और भ्रष्टाचारियों को सींखचों के पीछे पहुंचाने का दर काफी शानदार है | आंकड़ों के मुताविक भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की दिशा में नागालैंड (दो मामले, दोष सिद्धि दर सौ फीसदी) लक्षदीप और बिहार में भी शानदार प्रदर्शन किया | लक्षदीप में जहाँ सौ फीसदी दोष सिद्धि दर रही तो वहीं बिहार में दोषियों को सजा देने का प्रतिशत ७८ फीसदी रहा | इसके अलावा त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, गोवा तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह जैसे कुछ ऐसे प्रदेश और केंद्र शासित प्रदेश रहे जहां भ्रष्टाचार संबंधी क्रमशः १५. २१ ,२५ , ३२ और २३ मामलें दर्ज किये गए | लेकिन इन सभी राज्यों में किसी भी मामलें में किसी भी आरोपी को दोषी साबित नहीं किया जा सका | इसी तरह वर्ष २००० में जहाँ भ्रष्टाचार के मामलों में दोषियों को सजा दिए जाने का प्रतिशत मात्र २० था , जो वर्ष २००९ में बढ़कर ६० फीसदी तक जा पहुंचा | इस दृष्टि से वर्ष २००१ सर्वाधिक निराशाजनक वर्ष रहा जब भ्रष्टाचार के देश में कुल २९९० मामले दर्ज किये गए | लेकिन केवल १७ फीसदी मामलों में ही आरोपियों को दोषी ठहराया जा सका |
मुनीर अहमद मोमिन
Friday, April 22, 2011
be lagam: रिश्वतखोरों की नकेल का पुख्ता इंतजाम ?
be lagam: रिश्वतखोरों की नकेल का पुख्ता इंतजाम ?: " रिश्वत देने को कानूनन जायज़ बनाने की तैयारी हमारे देश में पहले से मौजूद कुछ कानूनी जटिलताओं को हटाकर यदि उन्हें प्रासंगिक और ..."
रिश्वतखोरों की नकेल का पुख्ता इंतजाम ?
रिश्वत देने को कानूनन जायज़ बनाने की तैयारी
हमारे देश में पहले से मौजूद कुछ कानूनी जटिलताओं को हटाकर यदि उन्हें प्रासंगिक और व्यवहारिक बना दिया जाए तो वाकई अपराधों या भ्रष्टाचार पर दबाव या अंकुश लगाया जा सकता है | अक्सर लोग रिश्वत देने की शिकायत इसलिए नहीं करते कि रिश्वत लेना और देना दोनों समान रूप से अपराध है | काम कराना जरूरी है और बिना रिश्वत के काम होना सर्वथा नामुमकिन है | देश का हर सरकारी विभाग रिश्वतखोरी में परम पारंगत हो चुका है | आज हालात ये हैं कि बिना रिश्वत के सरकारी आफिसों में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता | आप यह कह ही नहीं सकते कि फलां सरकारी विभाग ठीक है | हर विभाग एक दूसरे से बढ़-चढ़कर भ्रष्ट है | कोई किसी से कम नहीं | बल्कि एक दूसरे से होड़ लगी रहती है कि देखें कौन ज्यादा लूटता है | ऐसे में केन्द्रीय वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार द्वारा एक बहुत ही व्यवहारिक कदम उठाने के संकेत मिले हैं | देश भर में उठे भ्रष्टाचार के भयंकर बवंडर के बीच केन्द्रीय वित्त मंत्रालय ने रिश्वत खोरी पर लगाम लगाने की अनूठी तरकीब इजाद करते हुए इसे बहस के लिए देश के सामने रखा है |
वह तरकीब यह है कि अपना जायज़ या जरूरी काम करवाने के लिए मजबूरन तंग आकर दी जाने वाली रिश्वत को वैध (जायज) घोषित किया जाना चाहिए | भ्रष्टाचार से लड़ने का यह नया हथियार वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौसिक बासु ने पेश किया है और इसे सार्वजनिक बहस के लिए वित्त मंत्रालय ने अपनी वेबसाईट पर डाल दिया है | इस बहस पत्र में कौशिक बासु द्वारा रिश्वत को दो खानों में बांटकर अपना जायज काम निकालने के लिए तंग आकर मजबूरन दी जाने वाली रिश्वत को दंड के दायरे से बाहर लाने की दलील दी है | लेकिन इसके साथ-साथ जायज काम के लिए रिश्वत लेने वाले रिश्वतखोरों को दंडित करने का पूर्ववत प्रावधान ज्यों का त्यों बरकरार रखा जाए | इस विचार पत्र में मुख्य आर्थिक सलाहकार ने उदाहरण देते हुए कहा है कि यदि कोई व्यक्ति अपना टैक्स रिफंड लेने के लिए रिश्वत देने के लिए मजबूर हो या रियायत पर आवंटित ज़मीन के दस्तावेज़ को हासिल करने के लिए किसी को रिश्वत देने के लिए बाध्य होना पड़े तो इसे तंग आकर दी गई रिश्वत माना जाए और इसे वैध मानते हुए रिश्वत देने वाले व्यक्ति को दंड के दायरे से बाहर रखा जाए |
भ्रष्टाचार बाबत इस नई और व्यवहारिक पहल के बारे में वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार का मन्तव्य है कि अगर यह कदम उठाया जाए तो रिश्वत देने वाले व्यक्ति रिश्वत लेने वाले को पकड़वाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे | क्योंकि आज की स्थिति में रिश्वत लेना और देना दोनों दंडनीय अपराध है | जिसके कारण रिश्वत देने वाला व्यक्ति अपना मुंह बंद ही रखता है | जो कुछ हो इसे देश के कोने-कोने से उठ रही भ्रष्टाचार के विरोध की आवाज़ का असर माना जाए | या वक्त की नजाकत, दोनों ही परिस्थितियों में सरकार द्वारा उठाए गए एक व्यवहारिक कदम के श्रेणी में इसे रखा जा सकता है |
मुनीर अहमद मोमिन
Wednesday, April 20, 2011
be lagam: जन-लोकपाल भी महिला बिल की राह पर?
be lagam: जन-लोकपाल भी महिला बिल की राह पर?: " महिला विधेयक की राह का कौन है रोड़ा जन-लोकपाल विधेयक पर इस समय पूरे देश में कचाईन मची हुई है | देश में चर्चा के पर्याय..."
जन-लोकपाल भी महिला बिल की राह पर?
महिला विधेयक की राह का कौन है रोड़ा
जन-लोकपाल विधेयक पर इस समय पूरे देश में कचाईन मची हुई है | देश में चर्चा के पर्यायवाची शब्द के रूप में अघोषित 'मान्यता' प्राप्त स्वंयभू महाविद्वान श्रीयुत सुब्रहमण्यम स्वामी जी ने अपना प्रवचन सुनाते हुए कहा है कि गांधीवादी नेता अण्णा हजारे के इर्द-गिर्द भ्रष्ट लोगों का जमावड़ा है | जबकि लालकृष्ण आडवानी के अण्णा के खिलाफ बयान के बावजूद बीजेपी ने कांग्रेस पर खुला आरोप लगाया है कि अण्णा हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को बदनाम करने के लिए केंद्र सरकार ने पेशेवर लोगों को सुपारी दे रखी है | बीजेपी के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने अपने बयान में कहा है कि कांग्रेस पर्दे के पीछे भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को बदनाम करने के लिए कई तरह के घटिया, शर्मनाक और अनैतिक हथकंडे प्रयोग कर रही है | पता नहीं नकवी ने अपने पार्टी के प्रधानमंत्री बनने की प्रबल लालायित आडवानी का चार दिन पहले का बयान याद है कि नहीं | जिसमें उन्होंने अण्णा को लोकतंत्र का "इज्जत उतारू" बताया था | अधिकाँश राजनैतिक दलों के दोगलापन के कारण अब आशंका पैदा होने लगा है कि जन-लोकपाल विधेयक का संसद में वही हश्र न हो जो महिला बिल का होता आया है |
बता दें कि १३ साल की लम्बी लड़ाई के बाद पिछले दिनों लोकसभा के शीतकालीन सत्र में महिला उत्पीड़न रक्षा विधेयक २०१० में पेश हुआ | जो केन्द्रीय मन्त्रिमंडल की मंजूरी के बाद लोकसभा की स्थाई समिति के पास जा चुका है | लेकिन इस विधेयक में भी बहुत झोल-झाल बताया जा रहा है | इस नए विधेयक की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह क़ानून घरेलू महिला कामगारों पर लागू नहीं होगा | इस तरह जिन महिलाओं को इस नए क़ानून से सबसे ज्यादा सुरक्षा मिलनी चाहिए, उन तमाम घरेलू कामगार महिलाओं को इस नये क़ानून के दायरे से बाहर रखा गया है | जबकि हम सभी लोग यह बात जानते हैं कि हमारे देश में घरेलू कामगार महिलाओं का सबसे ज्यादा यौन शोषण होता है | हर रोज़ कहीं न तो कहीं से अपनी घरेलू नौकरानी के साथ मालिक या घर के बिगड़े शहजादों द्वारा दुराचार या बुरी नियत से पकड़ने की खबरें आती रहती हैं | पैसे के बल पर आज न जाने कितनी महिलाओं की आबरू से खेला जाता है | और फिर चाणक्य नीति साम, दाम, दंड, भेद अपनाते हुए ये अमीर लोग बेचारी इन गरीब महिलाओं का मुंह पैसे से बंद कर देते हैं
अगर आज इन्हें ही नये विधेयक से छोड़ दिया गया तो फिर इस विधेयक का उद्देश्य ही खत्म हो गया | इस बाबत जानकारों का कहना है कि दरअसल सरकार द्वारा घरेलू कामगार महिलाओं को इस विधेयक में न लेना और उन्हें इस विधेयक से दूर रखने के पीछे सरकार की शायद ये मंशा हो सकती है, कि इनके द्वारा इस विधेयक का दुरूपयोग हो सकता है | क्योंकि देश में लाखों-करोड़ों की तादाद में घरेलू कामगार महिलाएं हैं | इससे नौकर-मालिक की जरा सी खट-पट सरकार का सिरदर्द बढ़ा सकती है | वजह बिलकुल साफ़ है | आज देश की हर एक अदालत में मुकदमों का अम्बार लगा हुआ है | सरकारी आंकड़ों और विधि मंत्रालय के पास ताज़ा मौजूद आंकड़ों के मुताबिक़ देश भर के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग २६५ न्यायाधीशों की आज भी कमी है, और इस कमी के चलते लंबित मुकदमों की संख्या लगभग ३९ लाख हो गई है | वहीं देश की विभिन्न अदालतों में लगभग ३,१२८ करोड़ लंबित मामले चल रहे हैं | कई वर्ष पहले राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस विधेयक पर काम कर महिला संगठनों और वकीलों से व्यापक विचार-विमर्श कर इसके कई प्रारूप तैयार किए | पर उसी राष्ट्रीय महिला आयोग का कहना है कि इस प्रारूप की जरा सी झलक भी इस नए विधेयक में दूर-दूर तक भी नहीं दिखाई दे रही है |
उल्लेखनीय बात यह है कि सबसे पहले हमारा यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न विधेयक में क्या-क्या रखा गया है | इस नए क़ानून में किसी भी पुरूष साथी द्वारा कार्य स्थल पर अपनी महिला साथी के साथ अप्रिय यौन आचरण, अश्लील मौखिक टिप्पणी, शारीरिक संपर्क, द्वीअर्थी बातें, छेड़-छाड़, सूक्ष्म यौन इशारे, अश्लील मजाक, चुटकुले, महिला को अश्लील साहित्य दिखाना (शाब्दिक, इलेक्ट्रानिक अथवा मुद्रित), यौन एहसान की मांग या अनुरोध, अन्य कोई अप्रिय शारीरिक, मौखिक या गैर मौखिक क्रिया | ये सब इस नए महिला यौन उत्पीड़न के तहत आते हैं |
मुनीर अहमद मोमिन
Tuesday, April 19, 2011
be lagam: तिहाड़ जेल से भी निकल सकते हैं आईएएस !
be lagam: तिहाड़ जेल से भी निकल सकते हैं आईएएस !: "शिक्षा निधि का दान, मेरा भारत महान शिक्षा जगत से संबंधित दो ख़बरें हैं और दोनों की दोनों ही आश्चर्य जनक हैं | एक सुखद तो एक दुखद ..."
तिहाड़ जेल से भी निकल सकते हैं आईएएस !
शिक्षा निधि का दान, मेरा भारत महान
शिक्षा जगत से संबंधित दो ख़बरें हैं और दोनों की दोनों ही आश्चर्य जनक हैं | एक सुखद तो एक दुखद | एक से जहां बाक़ी लोगों को शिक्षा मिलेगी, वहीं दूसरी से निश्चित तौर पर मन में क्षोभ पैदा होगा | सुखद ये कि तिहाड़ जेल के छह कैदी आईएएस बनने के लिए सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं | वहीं देश के कई राज्य सरकारों द्वारा शिक्षा बजट को क्रिकेटरों पर लुटाने की खबर है | क्योंकि विश्व विजेता बनी भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों को मिलने वाली नकद रकमें शिक्षा के बजट से दी गई हैं | हम क्रिकेटरों के इनाम देने के कत्तई विरोधी नहीं हैं | लेकिन शिक्षा जैसे महत्व पूर्ण बजट से बटमारी करके इनाम की रकम के घाल-मेल पर आपत्ति तो है ही | क्योंकि आज़ादी के अर्द्ध शताब्दी से अधिक की अवधि गुजारने के बावजूद हम पूरे देश को अभी तक साक्षर तक नहीं कर पाए हैं और न ही अभी तक सभी विद्यालयों में शिक्षा संबंधी मूल-भूत बुनियादी सुविधाएं मुहैया करा पाने में कामयाब हो पाए हैं | ऐसे में ऐसे महत्वपूर्ण विभाग के मद से इनाम राशि का बन्दर-बाँट करना देश के मौजूदा शैक्षणिक परिस्थितियों के मद्देनजर मुनासिब तो कत्तई नहीं कहा जा सकता |
बता दें कि २८ साल के बाद विश्व कप जीतने का रिकार्ड बनाने वाली टीम इंडिया के धुरंधरों पर पैसों की जो बरसात हुई, वह पैसा कहीं और से नहीं बल्कि शिक्षा बजट से निकाला गया था | कई राज्यों ने अपने शिक्षा बजट से पैसा निकालकर क्रिकेटरों को इनाम दिए | दिल्ली, पंजाब और महाराष्ट्र ने शिक्षा बजट से इनाम की धनराशि निकाली | जबकि तमिलनाडू, कर्नाटक और उत्तराखंड ने खिलाड़ियों को जमीन आवंटित की और साथ में नकद इनाम भी दिया | हालांकि इसके स्रोत का पता नहीं है | अब मुम्बई के एक एनजीओ ने बाम्बे हाईकोर्ट को खत लिखकर इस बारे में शिकायत की है और कोर्ट से " सू मोटो " यानी अपने विवेक से निर्णय करने का आग्रह किया है |
दूसरी ओरबड़े अपराधियों के लिए बनी तिहाड़ जेल में छह कैदी ऐसे हैं जो मौजूदा परिस्थितियों से शिक्षा लेते हुए जीवन में कुछ बनने के लिए जी-जान से प्रयासरत हैं | अमूमन तिहाड़ जेल देश में बड़े आपराधिक वारदातों को अंजाम देने वालों के बन्दीगृह के रूप में जाना जाता है | लेकिन इसी बदनाम जेल के छह कैदी भारत की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के सिलसिले में रात-दिन एक करके जुटे हुए हैं | तिहाड़ में जेल संख्या तीन में हत्या, अपहरण और धोखा-धड़ी जैसे अपराधों के मामले में बंद छह कैदी आईएएस की तैयारी में जी-जान से जुटे हुए हैं | हालांकि ये कैदी अपनी रिहाई के बारे में निश्चित नहीं हैं | इन कैदियों को कोई कोचिंग की सुविधा आदि भी नहीं है | बल्कि कलेक्टर बनने का सपना संजोने वाले ये कैदी स्वाध्ययन के साथ अपनी परीक्षा की तैयारी के सिलसिले में एक अन्य कैदी से सहायता व मार्गदर्शन प्राप्त कर रहे हैं | जिसने पूर्व में आईएएस की तैयारी में छात्रों को कोचिंग दी थी |
मुनीर अहमद मोमिन
तिहाड़ जेल से भी निकल सकते हैं आईएएस !
शिक्षा निधि का दान, मेरा भारत महान
शिक्षा जगत से संबंधित दो ख़बरें हैं और दोनों की दोनों ही आश्चर्य जनक हैं | एक सुखद तो एक दुखद | एक से जहां बाक़ी लोगों को शिक्षा मिलेगी, वहीं दूसरी से निश्चित तौर पर मन में क्षोभ पैदा होगा | सुखद ये कि तिहाड़ जेल के छह कैदी आईएएस बनने के लिए सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं | वहीं देश के कई राज्य सरकारों द्वारा शिक्षा बजट को क्रिकेटरों पर लुटाने की खबर है | क्योंकि विश्व विजेता बनी भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों को मिलने वाली नकद रकमें शिक्षा के बजट से दी गई हैं | हम क्रिकेटरों के इनाम देने के कत्तई विरोधी नहीं हैं | लेकिन शिक्षा जैसे महत्व पूर्ण बजट से बटमारी करके इनाम की रकम के घाल-मेल पर आपत्ति तो है ही | क्योंकि आज़ादी के अर्द्ध शताब्दी से अधिक की अवधि गुजारने के बावजूद हम पूरे देश को अभी तक साक्षर तक नहीं कर पाए हैं और न ही अभी तक सभी विद्यालयों में शिक्षा संबंधी मूल-भूत बुनियादी सुविधाएं मुहैया करा पाने में कामयाब हो पाए हैं | ऐसे में ऐसे महत्वपूर्ण विभाग के मद से इनाम राशि का बन्दर-बाँट करना देश के मौजूदा शैक्षणिक परिस्थितियों के मद्देनजर मुनासिब तो कत्तई नहीं कहा जा सकता |
बता दें कि २८ साल के बाद विश्व कप जीतने का रिकार्ड बनाने वाली टीम इंडिया के धुरंधरों पर पैसों की जो बरसात हुई, वह पैसा कहीं और से नहीं बल्कि शिक्षा बजट से निकाला गया था | कई राज्यों ने अपने शिक्षा बजट से पैसा निकालकर क्रिकेटरों को इनाम दिए | दिल्ली, पंजाब और महाराष्ट्र ने शिक्षा बजट से इनाम की धनराशि निकाली | जबकि तमिलनाडू, कर्नाटक और उत्तराखंड ने खिलाड़ियों को जमीन आवंटित की और साथ में नकद इनाम भी दिया | हालांकि इसके स्रोत का पता नहीं है | अब मुम्बई के एक एनजीओ ने बाम्बे हाईकोर्ट को खत लिखकर इस बारे में शिकायत की है और कोर्ट से " सू मोटो " यानी अपने विवेक से निर्णय करने का आग्रह किया है |
दूसरी ओरबड़े अपराधियों के लिए बनी तिहाड़ जेल में छह कैदी ऐसे हैं जो मौजूदा परिस्थितियों से शिक्षा लेते हुए जीवन में कुछ बनने के लिए जी-जान से प्रयासरत हैं | अमूमन तिहाड़ जेल देश में बड़े आपराधिक वारदातों को अंजाम देने वालों के बन्दीगृह के रूप में जाना जाता है | लेकिन इसी बदनाम जेल के छह कैदी भारत की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के सिलसिले में रात-दिन एक करके जुटे हुए हैं | तिहाड़ में जेल संख्या तीन में हत्या, अपहरण और धोखा-धड़ी जैसे अपराधों के मामले में बंद छह कैदी आईएएस की तैयारी में जी-जान से जुटे हुए हैं | हालांकि ये कैदी अपनी रिहाई के बारे में निश्चित नहीं हैं | इन कैदियों को कोई कोचिंग की सुविधा आदि भी नहीं है | बल्कि कलेक्टर बनने का सपना संजोने वाले ये कैदी स्वाध्ययन के साथ अपनी परीक्षा की तैयारी के सिलसिले में एक अन्य कैदी से सहायता व मार्गदर्शन प्राप्त कर रहे हैं | जिसने पूर्व में आईएएस की तैयारी में छात्रों को कोचिंग दी थी |
मुनीर अहमद मोमिन
Monday, April 18, 2011
be lagam: सीडी के पीछे क्या है ?
be lagam: सीडी के पीछे क्या है ?: " देश में खूब हो रही है भ्रष्टाचारी चकल्लस लगता है वकील बाप-बेटे शांतिभूषण..."
सीडी के पीछे क्या है ?
देश में खूब हो रही है भ्रष्टाचारी चकल्लस
लगता है वकील बाप-बेटे शांतिभूषण और प्रशांत भूषण आज-कल शनि की साढ़े साती की चपेट में चल रहे हैं | लोक-जनपाल विधेयक के लिए ड्राफ्टिंग के मद्देनजर बनी सिविल सोसायटी कमेटी के गठन के समय ही पेट 'फुलाने-पचकाने' के योग वाले बाबा रामदेव द्वारा इनके विरोध में चलाए गए 'रामबाण' का प्रभाव दिनों-दिन गहराता ही जा रहा है | बाबा के बाद इन दोनों बाप-बेटों पर इलाहाबाद में एक मकान की खरीददारी पर स्टैम्प ड्यूटी बचाने या चुराने का आरोप लगा | फिर कल-परसों एक सीडी हवा में तैरती हुई भूचाल लेकर आई | जिसमें पूर्व क़ानून मंत्री और कानूनी पहलवान शान्ति भूषण को मुलायम सिंह यादव का एक मामला निपटाने के लिए किसी जज को पटाने के एवज में चार करोड़ रूपयों के लेन-देन की बात कही गई है | इसकी 'सेटिंग' कराने में बड़े कद के बड़े भैया अमिताभ के छोटे कद के छोटे भैया अमरसिंह का नाम है | फिर क्या था खबरिया चैनलों द्वारा इस सीडी प्रकरण की खूब खबर ली गई | जिसके कारण सिविल सोसायटी के सदस्य और शान्ति भूषण के चिरंजीव व नूरे नजर प्रशांत भूषण को अपने बाप के बचाव में आना पड़ा |
प्रशांत का कहना था कि उनके पिता ने २००६ में जो सीडी सुप्रीम कोर्ट में जमा की थी | उसी सीडी से मुलायम की आवाज़ उठाकर इस सीडी में डाली गई है | इस सीडी में अमर सिंह यह कह रहे हैं कि मेरे एक जज से अच्छे संबंध हैं | जिनसे मैं कुछ भी काम करवा सकता हूँ | ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रशांत ने कहा कि इसके पीछे अमर सिंह का हाथ हो सकता है | और चार करोड़ की बात किसी दूसरे सन्दर्भ में कही गई होगी | जिसे इस सीडी से जोड़ा गया है | लेकिन वे यह बताने में नाकाम रहे कि यह चार करोड़ की बात किस प्रसंग में कही गई है | जिसे इस सीडी से जोड़ा गया है | रहा सवाल अमर सिंह का तो इस बात से किसी को इन्कार नहीं होना चाहिए कि अमरसिंह के जज से अच्छे संबंध हैं | लोगों को याद होगा कि इसी तरह का एक सीडी प्रकरण अमर सिंह का भी हुआ था | जिसमें जिगर से बीडी जलाकर कलेजे से धुंआ निकालने वाली बंगाली बाला विपाशा बसु सहित अनेक अभिनेत्रियों की बहुत ही रंगीन-संगीन बातें थीं | जिसका कुछ अंश उस समय देश के एक बड़े अखबार समूह में एक दिन छपा भी था | लेकिन सुप्रीप कोर्ट ने अमर सिंह की याचिका पर उस सीडी के प्रसारण और उसका अंश अखबारों में छपने पर रोक लगा दी थी |
जबकि इसी तरह के कुछ मिलते-जुलते मामले को लेकर अभी तक कथित कुवांरे देश के सबसे प्रतिष्ठित उद्योग पति रतन टाटा भी लगभग छः माह पहले नीरा राडिया से अपनी बात-चीत के टेप के प्रसारण व उसके अंशों के प्रकाशन पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था | लेकिन एक जैसे ही मामले में अमर सिंह को राहत देने वाली सर्वोच्च अदालत ने रतन टाटा को किसी प्रकार का कोई राहत देने से साफ इन्कार कर दिया | हालांकि दोनों ही मामलों में ' इलू-इलू ' कामन यानी उभय पक्ष था | न्यायदेवी के गलियारों से भी अक्सर ऐसी बातें बाहर आती रहीं हैं | जो बाहरी दुनिया में चर्चा का विषय रही हैं | भले ही दबी जबान से ही हों | देश के पहले दलित मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन बसपाइयों की बहन और दौलत की बेटी सारी दलित की चिरकुवांरी बेटी मायावती को अपनी मुंह बोली बेटी का दर्जा दे रखे थे | उसी दौरान ताज कारीडोर सहित कई एक मामलों में बहन जी को बेटी होने का 'राहत-लाभ ' नसीब हुआ था |
मुनीर अहमद मोमिन
Sunday, April 17, 2011
इधर लोकपाल में बवाल,उधर सुप्रीम कोर्ट का धमाल !
यानि बहुत कठिन है डगर पनघट की
कल शनिवार को एक साथ दो महत्वपूर्ण बातें हुईं | एक तरफ जहां लोकपाल विधेयक की ड्राफ्टिंग कमेटी की पहली ही बैठक में वाद-विवाद व बवाल हो गया | वहीं दूसरी और उच्चतम न्यायालय के मुख्यन्यायाधीश एस. एच. कपाडिया ने काले कोट वालों की भी खबर लेते हुए कहा कि काली कोट पहनने वालों की उजली छवि आवश्यक है | इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए उन्होंने राजनेताओं से भी मुखातिब होकर भ्रष्ट जजों को संरक्षण न देने तक की बात कह डाला |
अब बात पहले लोकपाल पर, लोकपाल विधेयक लाने हेतु बनाई गई ड्राफ्टिंग कमेटी की पहली ही बैठक विवादों के हवाले हो गई | इस विधेयक से भ्रष्ट मंत्रियों और जजों के निलंबन का प्रस्ताव वापस लिया गया है | जबकि सिविल सोसायटी का प्रतिनिधित्व कर रहे अरविंद केजरीवाल ने सरकार के इस बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि सरकार देश के लोगों को गुमराह कर रही है | क्योंकि सिविल सोसायटी ने भ्रष्ट मंत्रियों और जजों के निलम्बन का प्रस्ताव वापस नहीं लिया है | लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करने के लिए गठित संयुक्त समिति की पहली बैठक में मसौदों का आदान-प्रदान किया गया | जिसमें अगली बैठक में चर्चा होने की खबर है | समिति के बैठकों की वीडियोग्राफी पर भी सहमति नहीं बन सकी | मगर चर्चाओं की आडिओ रिकार्डिंग करने का फैंसला कर लिया गया | दोनों ही पक्ष चाहते हैं कि एक ठोस लोकपाल विधेयक संसद के मानसून सत्र में पेश किया जाय | इसके लिए समिति की दो मई की होने वाली बैठक में विधेयक का प्रारूप बनाने के तौर- तरीकों पर विचार- विमर्श किया जाएगा | इसके लिए वेब साईट और सीधे सम्पर्क के जरिये विधेयक पर सीधे जनता के सुझाव लेने का फैंसला भी लिया गया | इसके साथ ही नागरिक समाज के विधेयक के मसौदे में तब्दीली करते हुए लोकपाल की नियुक्ति करने वाली समिति में राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के अध्यक्ष के बजाए प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता को शामिल किया गया है | सबसे आश्चर्य जनक बात तो यह है कि सरकार का मानना है कि शान्ति भूषण की अध्यक्षता में सिविल सोसायटी के सदस्यों ने जो मसौदा पेश किया वह पहले से तैयार किए गए जन लोकपाल बिल के मुकाबले कमजोर है |
दूसरी और उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस.एच. कपाडिया ने कहा कि भ्रष्ट न्यायाधीशों को राजनैतिक संरक्षण कत्तई नहीं दिया जाना चाहिए | देश में फैले चहुँ और भ्रष्टाचार के माहौल में अपने घर यानि न्यायपालिका की छवि से चिंतित प्रधान न्यायाधीश श्री कपाडिया ने "काले परिधान में साफ़ लोंगो" की जरूरत पर बल देते हुए राजनीतिक वर्ग से भ्रष्ट जजों को संरक्षण नहीं देने को भी कहा | श्री कपाडिया का यह कहना दिल छू लेने वाला है कि -' हमें उदाहरण पेश करना होगा ताकि न्यायपालिका की स्वतन्त्रता और सत्यनिष्ठा बनी रहे | न्यायधीशों को आत्म-संयम बनाए रखना चाहिए और वकीलों, राजनैतिक दलों, उनके नेताओं या मंत्रियों से तब तक संपर्क नहीं रखना चाहिए, जब तक विशुद्ध रूप से कोई सामाजिक मौक़ा न हो' | श्री कापडिया का कथन निःसंदेह स्वागत योग्य और एक शुभ संकेत है, क्योंकि विगत दिनों से न्यायपालिका का भी नाम गाहे-बगाहे किसी-किसी मामले में संदेह के घेरे में रहा है |
मुनीर अहमद मोमिन
Friday, April 15, 2011
किसानों ने देश को 'सोमालिया' होने से बचाया
देश की सभी योजनाएं सफेद हाथी !
इस आपा-धापी के दौर में हम इतने व्यस्त व लस्त-पस्त हो गये या करा दिए गए हैं कि हमें यह पता नही चल पा रहा है कि कैसे-कैसे 'अजगर' हमारी योजनाओं और अर्थ व्यवस्था को निगलते जा रहे हैं | देश के करोड़ों निवेशकों की कमाई अमीरों और वेदेशी निवेशकों के हाथों में जाने के कारण हमारी राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो गयी है | इसे केवल और केवल भारतीय किसानों ने संभाला है | हालात यह है कि यदि देश में २२-२३ करोड़ टन अनाज पैदा नहीं हुआ होता तो आज भारत दूसरा 'सोमालिया' बन जाता | फिर भी हमारी असफल सरकार देश पर दिनों-दिन मंहगाई और गरीबी लादती ही चली जा रही है | जबकि दूसरी ओर हर साल उद्योगपतियों और अमीरों को लगभग डेढ़ लाख करोड़ रूपये की टैक्स में छूट या राहत मिलती रही है | वह भी इन परिस्थितियों में कि वे ५० हजार करोड़ रूपये से अधिक का बैंक लोन भी डूबो चुके हैं | इतना ही नहीं घोटालों या हवाला कारोबार से भी भारतीय अर्थ व्यवस्था की भारी क्षति हुई है | जरूरत है आज भ्रष्टाचार, आंदोलन और सरकारी अहंकार में फंसे विकास को बाहर निकालकर दिशा व गति देने की | यह सदबुद्धि हमारे देश के राजनेताओं, मंत्रियों, सरकार अथवा सरकारों को कब आयेगी ?
एक ओर देश भ्रष्टाचार से लड़ रहा है, तो दूसरी ओर सरकार के मंत्री और उसका तंत्र भ्रष्टाचार में पूरी तरह लिप्त नजर आ रहे हैं | इन दो पाटों के बीच में हमारा राष्ट्रीय विकास फंसकर छट-पटा रहा है | चालू वित्त वर्ष में केंद्र सरकार ने नौ लाख करोड़ रूपये का राजस्व हासिल करने का इरादा जताया है | यह रकम पिछले साल से एक लाख आठ हजार करोड़ रूपये अधिक है | जारी वित्तीय वर्ष का बजट पेश करते समय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने यह दावा किया था कि तीन वर्षों में १५ लाख करोड़ रूपये की राशि योजना बजट में रखी या खर्च की गयी है | लेकिन "चतुर सुजान 'दादा" यह बात साफ़ तौर पर छिपा गए कि इतनी भारी रकम खर्चने के बावजूद जो विकास होना चाहिए वह तो देश में गधे के सींग की तरह कहीं दिखाई नहीं दे रहा है | गरीबों का जीवन स्तर उठना तो दूर इन्फ्रास्ट्रक्चर को लेकर वही भिखमंगाई चहुँ ओर दिखाई दे रही है | 'दादा' यह बात भी सिरे से गोल कर गए कि योजना बजटों की राशि से तिगुनी रकम गैर योजना बजट यानी प्रशासन के मद में खर्च हुई | ये खर्च क्या इस बात को साबित नहीं करते कि हम सफेद हाथी पाल रहे हैं | राजनेता, मंत्री भ्रष्ट हैं और उनके साए में पल रहा प्रशासन नामक 'सफेद हाथी' के कब्जें में ही देश का खजाना हैं |
यही कारण है कि देश का विकास भी हाथी चाल यानी मन्दगति से ही हो रहा है | प्रणव दा के मुताबिक़ यदि नौ लाख करोड़ रूपये या इससे ज्यादा का राजस्व हासिल भी होता है तो विकास कार्यों में कितनी रकम खर्च होगी | जो जारी वर्ष में ३५ से ४० फीसदी के बीच ही है | इससे साबित होता है कि हमारे समक्ष पैसे के कमी की समस्या बिलकुल ही नहीं है | इस सन्दर्भ में हम अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा का उदाहरण ले सकते हैं | क्योंकि पिछले १२ वर्षों में अमेरिका को करीब १९ लाख करोड़ रूपये का बजटीय घाटा हुआ है | जिसके मद्देनजर वे घाटे को घटाने के लिए अमीरों को दी जा रही टैक्स कटौती वापस लेना चाहते हैं | लेकिन भारत में लोकतंत्र के नाम पर एक ऐसी पूंजीवादी सरकार है जो अमीरों, कालाबाजारियों और जमाखोर-दलालों की है | प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी अमीरों के घोर पैरोकार तो हैं ही, कृषि मंत्री शरद पवार भी खेती-किसानों को वायदा बाज़ार के हवाले करते रहें हैं | वित्त मंत्री रहते हुए पी. चिदम्बरम ने खुलकर शेयर बाज़ार की तेजी का पक्ष लिया | परिणाम यह हुआ कि निम्न मध्यम वर्ग व मध्यम वर्ग ने जमकर निवेश किया . फिर उसके बाद बाज़ार ढहता चला गया | नतीजतन आज यह वर्ग खुद औंधे मुंह पड़ा है |
मुनीर अहमद मोमिन
be lagam: घोटाले के नये शिकार शरद पवार
be lagam: घोटाले के नये शिकार शरद पवार: "MONDAY, NOVEMBER 29, 2010 राडिया, मीडिया और मंडिया ..."
घोटाले के नये शिकार शरद पवार
MONDAY, NOVEMBER 29, 2010
राडिया, मीडिया और मंडिया
("नीरा राडिया ने देश के सबसे बड़े पावरफुल राजनेता शरद पवार का नाम लेकर भारतीय राजनीति में फिर गरमाहट पैदा कर दी है, अभी जुमा-जुमा आठ दिन पहले ही अण्णा हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी 'गुगली' से उबरे पवार के लिए यह बड़ा झटका माना जा रहा है | लेकिन पवार को नजदीक से जानने वाले लोगों का कहना है कि जोड़-तोड़ की राजनीति के "सिद्ध पुरूष" पवार का ऐसे मामलों से निपटना उनके दाएं-बाएँ हाथ का खेल है |मैंने 29 नवम्बर 2010 को राडिया बाबत यह ब्लॉग लिखा था |जिसे प्रसंग वश आज भी बिना किसी फेर-बदल के हू-ब-हू दोबारा पेश कर रहा हूँ ")
सत्ता के गलियारों से लेकर कार्पोरेट सेक्टर के अलंबरदारों और मीडिया के पहरेदारों को अपनी सुरतालों पर ताता-थैया कराने वाली नीरा राडिया नामक दुर्लभ प्रजाति की महिला ने अपने नाम और काम की व्यापकता साबित करते हुए जागरूक मीडिया सहित सरकार, नौकरशाह और औद्योगिक घरानों के कथित प्रतिष्ठित और नामधारी लोगों को भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डूबाने का पुख्ता इंतजाम करवा लिया है |राडिया का काम था औद्योगिक घरानों/कम्पनियों का काम सरकार अथवा नौकरशाहों से करवाना और लगे हाथ वक्त जरूरत अपनी मनवाने के लिए मीडिया के द्वारा भी उन पर दबाव बनवाना | इस तरह एक महिला दलाल ने मंत्री से लेकर नौकरशाह और मीडिया से लेकर कार्पोरेट सेक्टर तक को भी दलाली के दलदल में फांस दिया है | सीबीआई के पास इस तरह के वार्ताओं के लगभग ५८५१ रिकार्ड हैं | जिसमें से एक समाचार पत्रिका ने केवल सौ वार्ता टेप रिकार्डिंग की बात ही सार्वजनिक की है |
इस बीच टाटा उद्योग समूह के सर्वेसर्वा रतन टाटा ने अपनी निजता की गुहार लगाते हुए सुप्रीमकोर्ट तक जाने का मन बना लिया है | क्योंकि उनका मानना है कि टेपिंग गैरकानूनी ढंग से लीक हुयी है | जिससे उनके अपनी जिन्दगी जीने के अधिकारों का हनन हुआ है | खैर कार्पोरेट सेक्टरों, सरकारों व नौकरशाहों में तो इस तरह की लुका-छिपी और चोर-सिपाही का खेल वर्षों से खेला जा रहा है | लेकिन इस हमाम में नंगी मीडिया का नंगापन सही ढंग से पहली बार हमाम के बाहर तमाम हुआ है | 'पेड न्यूज' के सहारे पेट भरने वाले अधिकतर मीडिया के चर्बीदार , हाईफाई लोग "बेस्ट क्वालिटी " की दलाली तो दशकों से गाहे-बगाहे करते रहे हैं | लेकिन इन दिनों इनकी संख्या में कुछ ज्यादा ही इजाफा हो गया है | जनता को नैतिकता और आदर्शों का पोलियो ड्राप पिलाने वाले मीडिया के लोगों की मानसिक विकलांगता अक्सर 'प्रेस क्लब' में 'लेट नाईट' देखी जा सकती है | जब बोतल अन्दर जाती है तब इन कथित नामधारी और सुसंस्कृत महाविद्वानों का आदर्श और नैतिक आवरण 'तार-तार' होकर बाहर आने लगता है | हो सकता है कि अपने बचाव की दलील में मीडिया वाले उस पर अपनी निजता का लेबल चस्पा कर दें | तो निजता क्या केवल मीडिया वालों की ही होती है ? फिर दूसरे लोगों की निजता को उधेड़ने का मीडिया को क्या हक़ है ? मुझे इस बाबत एक पुलिस वाले का एक मौलाना के लिए कहा गया वो शेर याद आ रहा है |
ये कैसा इन्साफ है , ऐ हजरते मौलाना |
हम लें तो घूस और आप ले तो नजराना ||
हम लें तो घूस और आप ले तो नजराना ||
अंत में यहाँ साफ़ तौर पर यह कहा जा सकता है कि अपने संवाद व संप्रेषण हेतु 5 डब्ल्यू ह्वाट, ह्वेन,व्हेयर, हू और ह्वाई से शुरू होने वाली मीडिया अब 3 डब्ल्यू यानि वूमेन, वाइन और वेल्थ में अटक कर रह गयी है |
मुनीर अहमद मोमिन
Thursday, April 14, 2011
be lagam: पढ़ो, संगठित होवो, संघर्ष करो-बाबा साहेब
be lagam: पढ़ो, संगठित होवो, संघर्ष करो-बाबा साहेब: " बाबा साहेब का नाम 'सत्ता करेंसी' के रूप में आज जिस बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर की १२०वी जयंती है | वे महज एक व्यक्ति नहीं बल..."
पढ़ो, संगठित होवो, संघर्ष करो-बाबा साहेब
बाबा साहेब का नाम 'सत्ता करेंसी' के रूप में
आज जिस बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर की १२०वी जयंती है | वे महज एक व्यक्ति नहीं बल्कि अपने आप में एक पूरा संस्थान, एक समग्र व परिपूर्ण विचारधारा थे, जिनका नाम आज उन्हीं के अनुयायियों द्वारा महज एक सत्ता की करेंसी के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है | स्वतंत्र भारत के प्रथम क़ानून मंत्री बाबासाहेब ने सामाजिक उत्थान के लिए एक नारा दिया था - पढ़ो, संगठित होवो, संघर्ष करो | यह नारा ही उनकी व्यापक विचारधारा को व्यक्त करने के लिए काफी है | जिन्होनें शिक्षा को अग्रणी रखा, उसके बाद एकजूटता फिर किसी संघर्ष के सफल होने की कामना की थी |
युग पुरूष डा. बाबासाहेब आम्बेडकर न केवल स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं में से एक थे, बल्कि वे दलितों के जूझारू नेता, जाने-माने शिक्षाविद, अर्थशास्त्री, और कानून के प्रकांड पंडित थे | उनका जन्म एक दलित वर्ग के 'महार' नामक जाति में १४ अप्रैल १८९१ को मध्य-प्रदेश के महू में हुआ था | इनके पिता का नाम रामजी और माता का नाम भीमाबाई था | जिस समय बाबासाहेब का जन्म हुआ था, उस समय भारतीय समाज में अस्पृश्यता की बुराई चरम पर थी | जिसके चलते उनको अपने छात्र जीवन में तिरस्कार का बार-बार सामना करना पड़ा था | अपने स्कूल के दिनों में चपरासी भी उन्हें पानी नहीं देता था | स्वाभिमानी होने के कारण वे दिन भर प्यासे रहते थे | किन्तु अपमानित होकर पानी पीना उन्हें मंजूर नहीं था | इन्हीं धटनाओं ने उनमें समानता का अधिकार पाने की कोशिश और पढ़-लिखकर ऐसा विद्वान बनने का संकल्प जगाया | जिसके बाद वो लोगों को मनवा सकें कि वे भी उन्हीं लोगों की तरह मनुष्य हैं |
फिर बाद के दिनों में भारत में चल रहे जातिवाद से दुखी होकर ही उन्होंने १४ अक्टूबर १९५६ में नागपुर की भरी सभा में हिन्दू धर्म का त्याग करके बौद्ध धर्म को अपना लिया | दो लाख अनुयायियों के साथ में इतनी बड़ी संख्या में धर्म परिवर्तन की यह ऐतिहासिक घटना थी | उस समय भारत में उनके समतुल्य कोई बैरिस्टर नहीं था | इसीलिये उन्हें संविधान समिति का अध्यक्ष बनाया गया | बाबासाहेब ने अर्थशास्त्र, राजनीति, अछूतोद्धार, कानून तथा अन्य सामयिक व प्रासंगिक सन्दर्भों पर अनेक पुस्तकें भी लिखीं | तब उनके घर में खुद की ३५००० किताबों का भंडार था | जो बहुत अनोखी बात है | छह दिसम्बर १९५६ को दिल्ली में उनका महानिर्वाण हो गया | डा. बाबासाहेब आम्बेडकर का जीवन केवल दलितों के लिए ही नहीं अपितु सारे भारत वासियों के लिए प्रेरणादायक है | एक बहुत ही साधारण बालक कदम-कदम पर अपमान सहते हुए भी मानवता की बुलंदी तक पहुंच गया | एक महान समाजसुधारक तथा भारत के महान सपूत के रूप में उन्हें हमेशा याद किया जाता रहेगा |
यहाँ इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि देश में वर्तमान समय में संविधान परिवर्तन का मुद्दा महत्वपूर्ण है | वास्तव में बाबासाहेब द्वारा निर्मित भारतीय संविधान एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है | जिसमें भारतीय प्रशासन एवं लोकतंत्र की आत्मा निहित है | जिस कठोर श्रम व बुद्धि से संविधान का निर्माण किया है | विहंगम दृष्टि से देखा जाए तो इस दस्तावेज़ में परिवर्तन की गुंजाईश ही नहीं है | स्वंय संविधान समिति के अध्यक्ष न्यायाधिपति वेंकट चैलया ने माना है कि आम्बेडकर द्वारा निर्मित संविधान के मूल ढाँचे में परिवर्तन की कोई गुंजाईश नहीं है | न ही वे अपने कार्य सूची में मूल ढाँचे के बारे में कोई बिंदु लेंगे | वास्तव में देखा जाए तो संविधान को लागू करने वाला तंत्र या सरकार निष्पक्ष नहीं है तो संविधान कितना भी अच्छा हो उसके निर्देश महत्वहीन हो जाएंगे | यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि वास्तव में भारतीय संविधान में बाबासाहेब कि आत्मा निहित है | जिसके आधार में भारतीय लोकतंत्र की अर्द्ध शताब्दी सफलता पूर्वक पूर्ण की है | देखना यह है कि संविधान समीक्षा समिति आम्बेडकर की निहित पवित्र आत्मा को अनावश्यक ठेस न पहुंचाए, अन्यथा उसके दूरगामी गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं |
मुनीर अहमद मोमिन
Wednesday, April 13, 2011
be lagam: अण्णागिरी से घबराई नेतागिरी !
be lagam: अण्णागिरी से घबराई नेतागिरी !: " भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद ने उडाई नींद ! पहले कपिल सिब्बल और सलमान खुर्शी..."
अण्णागिरी से घबराई नेतागिरी !
भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद ने उडाई नींद !
पहले कपिल सिब्बल और सलमान खुर्शीद, फिर आडवानी उसके बाद 'दिग्गी राजा' के नाम से मशहूर कांग्रस के महासचिव दिग्विजय सिंह आदि नेताओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद से परेशान होकर धीरे-धीरे अपने खोल से बाहर आना शुरू कर दिया है | केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और सलमान खुर्शीद ने कहा कि लोकपाल विधेयक से कुछ नहीं बदलेगा | इस पर अण्णा ने कहा था कि यदि प्रस्तावित लोकपाल बिल सार्थक नहीं है तो कपिल सिब्बल कमेटी से इस्तीफा दे दें | फिर राकांपा के नेता तारिक अनवर ने भी अण्णा पर आँखें तरेरी | तदोपरांत लालकृष्ण आडवानी ने अण्णा की सोच को लोकतंत्र के खिलाफ बताते हुए कहा है कि जिस तरह नेताओं के खिलाफ मुहिम चलाई जा रही है | उससे संदेह का वातावरण निर्माण हो रहा है और लोकतंत्र अपमानित हो रहा है | सभी नेता भ्रष्ट नहीं हैं | यदि अण्णा ऐसा सोचते हैं तो उनकी सोच लोकतंत्र के विरूद्ध है | कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह का भी कुछ इसी तरह का कहना है | कि सभी नेता भ्रष्ट नहीं होते |
लेकिन भूतपूर्व सैनिक अण्णा हजारे ने भी आडवानी को आईना दिखाते हुए कह दिया है कि आडवानी का कहना गलत है | अगर आडवानी जैसे नेता सही रास्ते पर होते तो हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना बड़ा कदम उठाने की जरूरत नहीं पडती | दरअसल ये तमाम बातें पैदा ही नहीं होती, इसकी शुरूआत बाबा रामदेव और स्वामी अग्निवेश के चेला-चापड़ों से हुई | सर्व प्रथम रामकिसुन यादव उर्फ़ बाबा रामदेव ने किशन बाबूराव हजारे उर्फ़ अण्णा हजारे से ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल नामों पर परिवारवाद के नाम पर एतराज़ जताया | क्योंकि अण्णा की ओर से कमेटी में पूर्व क़ानून मंत्री शान्तिभूषण के सह-अध्यक्ष होने और उनके पुत्र प्रशांत भूषण को समिति का सदस्य बनाये जाने पर बाबा रामदेव को आपत्ति थी | जिस पर कटाक्ष करते हुए शांतिभूषण ने भी मीडिया में कहा कि वहां योग का नहीं कानूनी कसरत का काम है | फिर बाबा ने भी प्रत्युत्तर में उवाचा कि योग से ही दिमाग ठिकाने रहता है | इस तरह की बातें बंद कमरे या आमने-सामने भी हो सकती थीं | लेकिन ये सारे आरोप-प्रत्यारोप खबरिया चैनलों के जरिए हुई | इस दौरान अण्णा द्वारा नरेंद्र मोदी और नितीश कुमार की तारीफ़ भी लोगों को अनावश्यक महसूस कर गई |
फिर इसी दौरान दिल्ली के गलियारों में ये बात भी फैलने लगी कि कभी दिल्ली यातायात पुलिस में रहकर 'क्रेन बेदी' के नाम से मशहूर रह चुकीं भारतीय पुलिस सेवा की प्रथम महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी का आन्दोलन के समर्थन की एक अपनी राम कहानी है | किरण बेदी को वजाहत हबीबुल्लाह के इस्तीफे से खाली हुए मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर नियक्ति की माँग की गई थी | जिसको मानना तो दूर सरकार ने इसे ढंग से सुना भी नहीं | बुद्धिजीवी वर्ग का भी मानना है कि अण्णा के लोगों द्वारा जन लोकपाल विधेयक का जो प्रारूप पेश किया जा रहा है | वह न तो तर्क संगत है और न ही लोकतांत्रिक प्रणाली में उसकी स्वीकार्यता की कोई विशेष संभावना है | लेकिन यह तथ्य भी उतना ही पीडादायक है कि भारतीय संसद में लोकपाल विधेयक का 42 वर्षों तक लटके रहना | यह किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकता |
यहाँ यह बताना जरूरी है कि जिन देशों ने आधुनिक विकास का लक्ष्य हासिल किया है | वहां लोकपाल सदृश्य स्वतंत्र संस्थाओं के समयोचित गठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है | कहने का तात्पर्य यह है कि अण्णा के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को चारो तरफ से व्यूह रचना करके पलीता लगाने की कोशिश शुरू हो गई है | जिससे भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई का सारा दारोमदार अब आम जन के सूझ-बूझ और बुद्धि-विवेक पर निर्भर हो गया है | क्योंकि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सारे राजनेता मिलकर और मीडिया भी आज नहीं तो कल उनसे मिलने ही वाली है | इस मुहिम की हवा निकालने की जुगत नें लग गए हैं | इसलिए आज आम जन की यह जिम्मेदारी बनती है कि भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की धार कुंद न होने दें | और अपने समर्थन द्वारा दिन-रात इसके प्रज्ज्वलन शक्ति में इजाफा ही करते रहें |
मुनीर अहमद मोमिन
Tuesday, April 12, 2011
be lagam: अण्णा के आंदोलन में युवाओं की निर्णायक भूमिका
be lagam: अण्णा के आंदोलन में युवाओं की निर्णायक भूमिका: " देश हित के लिए निहायत शुभ संकेत जो कुछ भी हो भ्रष्टाचा..."
अण्णा के आंदोलन में युवाओं की निर्णायक भूमिका
देश हित के लिए निहायत शुभ संकेत
जो कुछ भी हो भ्रष्टाचार के सन्दर्भ में जन लोकपाल बिल को लेकर किशन बाबूराव हजारे उर्फ़ अण्णा हजारे द्वारा किए गए जनांदोलन की सफलता ने दो बात तो उजागर कर ही दी है - एक नई उम्मीद और दूसरे नई जिम्मेदारी पैदा करने की | आज़ादी के बाद जो गलतियाँ हुईं, वह अब दोहराना नहीं चाहिए | क्योंकि आज़ादी के आन्दोलन के सफलता के बाद देशवासियों से दो बड़ी चूक हुई | पहला ये कि जो युवा शक्ति इस आन्दोलन को अपने कंधों पर उठाकर आज़ादी के मुंहाने तक लेकर आई, जो वास्तविक रूप से सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव और राजगुरू जैसे नौजवान शहीदों व क्रांतिकारियों की असली वारिस और महात्मा गांधी की ही शक्ति थी | लेकिन आज़ादी के बाद उसे वापस कालेज कैम्पस और घरों में घुसा दिया गया | उनसे कहा गया कि अब तम्हारा काम खत्म हो गया | अब तुम जाकर पढाई-लिखाई करो और अपने भविष्य के रोटी-रोजी के जुगाड़ में जुट जाओ |
लेकिन जिन लोगों ने इस युवा-शक्ति को कालेज कैम्पस और घरों में घुसाया, उन्हीं लोगों ने इसका 'राजनैतिक इस्तेमाल' करते हुए इन युवाओं को अपना राजनैतिक अनुयायी बनाकर रख दिया | देश के हर राजनैतिक दल को युवा और छात्र संगठन नामक विस्फोटक हथियार चाहिए | युवा और छात्र संगठन के नाम पर इन युवाओं को गुंडों, दादाओं और छुटभैये नेताओं की जमात में तब्दील कर दिया गया | यह बहुत बड़ी गलती थी हमारे नेताओं और देश के कथित कर्णधारों की | जिन्होंने अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए युवाओं को बेरोजगारों की भीड़, हताश व निराश लोगों का जमावड़ा और गुंडों-अपराधियों की फौज में बदल दिया | जिससे हमारा राजनैतिक पतन तो हुआ ही, हमारा सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक चरित्र भी ढह गया | इस त्रासदी को आज़ादी के बाद की दो पीढियां भोग चुकीं हैं | अब तीसरी पीढी हमारे समक्ष तैयार बैठी है | देश के रीढ़ की हड्डी मानी जाने वाली युवा-शक्ति को सृजनात्मक दिशा नहीं दी गई |
हालांकि यह बात बिलकुल सच है कि बच्चे और बूढ़े सृजन नहीं कर पाते, हमारे देश के बूढ़े नेताओं ने पूरे देश को केवल बच्चे पैदा करने और गरीब होने के लिए बाध्य कर दिया | ज्यादातर हमारे युवा व छात्र नाराज़ होने पर अपनी छोटी-मोटी मांगों के लिए लड़ते और संघर्ष करते रहे | लेकिन "राष्ट्र निर्माण या समाज निर्माण" के लिए वे 'परिवर्तनकारी शक्ति' नहीं बन सके | हमारे बूढ़े नेताओं के गलतियों के कारण ही हमारे युवा २५ साल की उम्र में ही बूढ़े से हो गए | यहाँ इस बात का ज़िक्र जरूरी है कि निहायत ईमानदार नेता की छवि वाले स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री ने ' इस बाबत सकारात्मक कदम उठाते हुए 'जय जवान-जय किसान' का नारा देकर इस देश की मुख्य शक्ति युवायों और किसानों को प्राथमिकता प्रदान करने की कोशिश जरूर की थी | लेकिन दुर्भाग्य वश न किसानों की जय हो पाई और न ही जवानों की | न तो स्व. शास्त्री जी के समकालीन नेताओं ने इस नारे को कोई ख़ास तवज्जो दी और न उन नेताओं के उत्तराधिकारियों ने | इस तरह यह नारा महज़ नारा और पाखंड तक ही सीमित हो गया |
मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि अब देश की युवा शक्ति को न तो फिर से सीमाओं में बांधा जाए और न ही उन्हें असमय बूढा होने दिया जाए | बल्कि इस भ्रष्टाचार विरोधी और समाज विरोधी लड़ाई को एक जूझारू युवा और एक जां-बाज़ सिपाही की तरह लगातार लड़ने की प्रेरणा दी जाए | क्योंकि भ्रष्टाचार एक सतत प्रक्रिया है, और इस सतत प्रक्रिया को रोकने के लिए सतत संघर्ष की जरूरत होगी | हमें एक ऐसे सजग और जूझारू समाज का निर्माण करना है | जो भ्रष्टाचार पर कड़ी निगरानी रखे और जहां कहीं भी भ्रष्टाचार हो रहा हो, वहां उसके विनाश व विदाई हेतु तत्पर रहे |
Monday, April 11, 2011
be lagam: कृषि नहीं अब भ्रष्टाचार प्रधान होगा भारत
be lagam: कृषि नहीं अब भ्रष्टाचार प्रधान होगा भारत: "निजी क्षेत्रों में भाई-भतीजावाद व भ्रष्टाचार का बोलबाला वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब कृषि प्रधान क..."
कृषि नहीं अब भ्रष्टाचार प्रधान होगा भारत
निजी क्षेत्रों में भाई-भतीजावाद व भ्रष्टाचार का बोलबाला
वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब कृषि प्रधान कहलाने वाला अपना देश भारत भ्रष्टाचार प्रधान देश कहलाने लगेगा | कम से कम भ्रष्टाचार बाबत हुई एक सर्वे रिपोर्ट से तो यही आशंका बलवती हो रही है | प्रबंध सलाहकार कंपनी (केपीएमजी) द्वारा किए गए सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में भ्रष्टाचार निरोधी क़ानून समुचित अमल में न होने, कारोबार में राजनैतिक दखलंदाजी, दोषियों को सजा न मिलने व न्यायिक प्रणाली में विलंब ही देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार के मुख्य कारण हैं | रिपोर्ट में रीयल इस्टेट सेक्टर को सबसे भ्रष्ट माना गया है | जबकि दूर-संचार क्षेत्र दूसरे स्थान पर है | सर्वेक्षण के अनुसार देश में भ्रष्टाचार नियंत्रण में आ जाए तो देश की विकास दर नौ फीसदी से अधिक हो सकती है |
अधिकाँश बड़ी कम्पनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और मुख्य वित्त अधिकारियों का मानना है कि आए दिन भ्रष्टाचार के नए-नए मामले सामने आने से पूरी दुनिया में भारत की छवि को नुकसान पहुंच रहा है | इसका नकारात्मक असर भारत के बाज़ार पर भी पड़ रहा है | सर्वे में शामिल ३२ प्रतिशत लोगों ने सबसे भ्रष्ट क्षेत्र के रूप में रीयल इस्टेट का नाम लिया | १७ फीसदी लोगों का मानना है कि टेलीकाम ज्यादा भ्रष्ट है | २-जी घोटाले के बाद टेलीकाम क्षेत्र में भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ था | सर्वे में शिक्षा, गरीबी उन्मूलन को तीसरा सबसे भ्रष्ट क्षेत्र माना गया है | इसी तरह रक्षा को नौ फीसदी, आईटी और बीपीओ को छह फीसदी लोगों ने भ्रष्ट माना | कारपोरेट क्षेत्र भी यह दावा नहीं कर सकते कि वे भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं | क्योंकि वे खुद भी इसके लिए जिम्मेदार हैं |
यहाँ मैं यह बता देना जरूरी समझता हूँ कि अगले वित्तीय वर्ष का बजट पेश करते हुए प्रणव मुखर्जी ने भ्रष्टाचार के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए कहा था कि इस समस्या का सामना करना सरकार की प्राथमिकता होगी | फिर भी इसके संबंध में सरकार की किसी प्रकार की कोई इच्छाशक्ति कहीं नज़र नहीं आई | क्योंकि सर्वेक्षण के दौरान भी लोगों ने साफ़-साफ़ कहा कि ऐसा लगता नहीं कि सरकार भ्रष्टाचार और रिश्वत के बढ़ते मामलों पर रोक लगा पाएगी | जब कारोबारियों से पूछा गया कि अगले दो साल में उन्हें भ्रष्टाचार के मामलों में कमी आती दिखती है या नहीं ? तो ४६ फीसदी लोगों का जवाब था कि भारत में भ्रष्टाचार की स्थिति जल्दी में नहीं सुधरने वाली | अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि जिन देशों में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, वहां दीर्घकालीन निवेश में कमी आ रही है | इससे देश के आर्थिक वातावरण को नुकसान पहुंच रहा है |
मुनीर अहमद मोमिन
Sunday, April 10, 2011
be lagam: अनुपम खेर की खैर नहीं ?
be lagam: अनुपम खेर की खैर नहीं ?: " विशेषाधिकार हनन सहित खेर के घर पर पथराव अण्णा हजार..."
अनुपम खेर की खैर नहीं ?
विशेषाधिकार हनन सहित खेर के घर पर पथराव
अण्णा हजारे के अनशन को समर्थन देने पहुंचे हिन्दी फिल्मों के मशहूर खलनायक अनुपम खेर द्वारा अति उत्साहित होकर अथवा कांग्रेस की अतिरंजना में एक खबरिया चैनल को कथित रूप से भारतीय संविधान विरोधी उनका दिया गया बयान खेर के गले की हड्डी बनता जा रहा है | संविधान के खिलाफ कथित टिप्पणी करने पर अनुपम खेर के विरूद्ध नौ अप्रैल को महाराष्ट्र के विधान सभा में प्रश्न काल के दौरान शरद पवार की पार्टी राकांपा के विधायक जितेन्द्र आव्हाड ने यह मुद्दा उठाते हुए सदन को बताया कि एक खबरिया चैनल पर अनुपम खेर ने बार-बार संविधान के खिलाफ निन्दात्मक बात की है | साथ ही साथ उन्होंने विधायिका (सदन) की भी अवमानना करते हुए कहा है कि वे विधान सभा में उठने वाले मुद्दों की परवाह नहीं करते |
सबसे गौरतलब बात तो यह है कि जहाँ राकांपा के विधायक ने इस मुद्दे को जिस समय सदन के समक्ष उठाया उस समय कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायकों का समर्थन तो समझ में आता है | लेकिन राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के बाला नांदगांवकर और भाजपा के सुधीर मुनगंटीवार और प्रकाश शेंडगे का अनुपम खेर के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की माँग समझ से परे है | क्योंकि खेर की छवि हमेशा भाजपा समर्थक की रही है | यहाँ तक कि उनकी पत्नी किरण खेर भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की स्थाई आमंत्रित सदस्य हैं | केंद्र में भाजपा की ही सरकार में वे फिल्म सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष बने थे | बाद में मनमोहन सरकार के आने पर उन्हें हटाकर क्रिकेटर नवाब पटौदी की अभिनेत्री बीवी शर्मिला टैगोर को सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया था | उस समय भी अनुपम खेर ने काफी उछल-कूद मचाया था | तब से उनकी कांग्रेस से तना-तनी जगजाहिर है |
बहरकैफ यहाँ भाजपा के सुधीर मुनगंटीवार का विधान सभा में दिया गया बयान भी काबिले गौर है |मुनगंटीवार ने खेर की जमकर खैरियत लेते हुए कहा है कि खेर ने कथित रूप से कहा था कि 'संविधान को फेंक देना चाहिए' | मुनगंटीवार की दलील है कि, " संविधान की वजह से ही हर नागरिक को बोलने की आज़ादी मिलती है | लेकिन इस आज़ादी के दुरूपयोग की अनुमति नहीं दी जा सकती | सदन के अन्य सदस्यों ने भी संविधान का अपमान करने पर खेर को सलाखों के पीछे भेजने की पुरजोर माँग की | हालांकि खबरिया चैनलों के माध्यम से खेर ने अपनी सफाई दे दी है, इसके बावजूद यह मामला थमता नजर नहीं आ रहा है |
इस बीच जबकि आगामी १४ अप्रैल को संविधान के रचयिता डा. बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर की जयंती है | ऐसे मौके पर खेर द्वारा की गई टिपण्णी से नाराज़ भारतीय रिपब्लिकन पार्टी (आरपीआई) के कार्यकर्ताओं ने कथित रूप से कल आठ बजे के करीब खेर के घर पर पथराव किया |
Saturday, April 9, 2011
be lagam: 'नग्न सुंदरी' पूनम की नग्नता की कीमत करोड़ों में?
be lagam: 'नग्न सुंदरी' पूनम की नग्नता की कीमत करोड़ों में?: " खुल गई पूनम की लाटरी की दुकान वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में ..."
'नग्न सुंदरी' पूनम की नग्नता की कीमत करोड़ों में?
खुल गई पूनम की लाटरी की दुकान
वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में भारत की जीत पर नंगा होने का ऐलान करने वाली कथित 'नग्न सुंदरी' पूनम पाण्डेय के इरादों पर बीसीसीआई ने भले इंकार करके पानी फेर दिया | लेकिन इस मंशा को सार्वजनिक करके पूनम पाण्डेय भारत सहित पूरे विश्व में पूनम के चाँद की तरह चर्चित हो गई | लगता है पूनम ने देश में १९७५ में लगाये गए आपातकाल के 'घोष वाक्य' अपने जीवन में अंगीकार कर लिया है | यानि दूर दृष्टि, पक्का इरादा, कड़ी मेहनत और अनुशासन | जिसमें अनुशासन को छोड़कर सब उसके पास है | अब उसका नंगा होने का यही पक्का इरादा उसे करोड़पति बनाने जा रहा है | पूनम ने दूरदृष्टि के तहत यह सोच लिया था कि " बदनाम भी होंगे तो, क्या नाम नहीं होगा " | लगता है इस मामले में पूनम ने शायद याना गुप्ता को अपना आदर्श चुना है | जो अभी हाल में ही एक कार्यक्रम में पेंटी पहनकर जाना भूल गई थी | मजेदार बात तो यह है कि याना को यह पता नहीं था कि वह पेंटी नहीं पहनी है | लेकिन कार्यक्रम के फोटोग्राफर को यह बखूबी पता था कि याना कमर से नीचे नंगी है | यानि कुल मिलाकर चर्चा के जरिए घटिया मार्केटिंग का घटिया हथकंडा |
हाँ, तो बात यहाँ पूनम के नंगेपन की चल रही है | एक बात तो साफ़ है कि उसने अति उत्साह या अनजाने में नंगा होने की नंगई की मंशा नहीं जाहिर की थी | उसने जानबूझकर चर्चा में आने और अपनी मार्केटिंग के लिए ही यह शोशा छोड़ा था | और उसका तीर भी बिलकुल निशाने पर बैठ गया | इसी हफ्ते गुर्दे के पथरी का आपरेशन करा चुकी लाज-शर्म के मामले में पत्थर दिल पूनम पाण्डेय की अब बल्ले-बल्ले हो गई है | खबर है कि सिर्फ कपड़े उतारने की बात कहने के बाद से ही पूनम की चांदी हो गई थी | लेकिन अब तो उसकी लाटरी भी खुल गई है |
दरअसल पूनम को इसके बाद एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका के लिए करोड़ों का आफर मिला है | हालांकि भारत की जीत के बाद पेरिस में कपड़ा उतारने की बात का बहाना बताकर उसने अपना वादा पूरा नहीं किया | इस बाबत पूनम की सफाई थी कि बीसीसीआई ने उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं दी | उसने यह भी सफाई दी कि वह अपने वादे पर अभी भी कायम है | नंगा होने की नाव पर सवार होकर उसने काफी चर्चाएँ भी बटोर ली हैं | जिसका उसे अब फायदा भी मिलने जा रहा है | खबर है कि जहाँ पूनम को कई रियल्टी शोज के आफर मिले हैं,वहीं उसे एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ने न्यूड फोटो शूट के लिए करोड़ों रूपये का आफर भी दिया है |
मुनीर अहमद मोमिन
Friday, April 8, 2011
be lagam: उमा उई माँ बोलीं और चौटाला चोटियाए गए
be lagam: उमा उई माँ बोलीं और चौटाला चोटियाए गए: " आंदोलनकारियों ने नेताओं को रोटी नहीं सेंकने दी हमारे देश के राजनेता चाहे वह किसी भी दल क..."
उमा उई माँ बोलीं और चौटाला चोटियाए गए
आंदोलनकारियों ने नेताओं को रोटी नहीं सेंकने दी
हमारे देश के राजनेता चाहे वह किसी भी दल के हों | शादी-विवाह से लेकर श्मशान बरास्ता शव यात्रा तक में अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने से बाज नहीं आते |यहाँ तक कि गैर-राजनैतिक संगठनों या सामाजिक संगठनों द्वारा जब कोई ढंग का अभियान चलाया जाता है, तो वहां के केवल सत्तापक्ष के नेताओं को छोड़कर बाकी विपक्ष के सारे नेता अपने समर्थन की टोकरी लेकर घडियाली आंसू बहाने पहुंच जाते हैं | जब कभी इस प्रकार के प्रदर्शन आदि को व्यापक जन-समर्थन मिलने लगता है तो उसका राजनैतिक लाभ लेने के लिए राजनैतिक दलों में होड़ सी लग जाती है | "मान न मान, मैं तेरा मेहमान" बनकर वे उसमें शामिल होने के लिए व्याकुल हो जाते हैं |
इस तरह अच्छे उद्देश्यों और अच्छे कार्यों के लिए शुरू किया गया आन्दोलन इन राजनैतिक दलों की घटिया राजनीति का साधन बनकर रह जाता है | अण्णा हजारे के भी आमरण सत्याग्रह को बिना मांगे समर्थन देने के लिए निहित स्वार्थों वाले नेताओं का मजमा दिल्ली के जंतर-मंतर रोड पर जुट गया | कम से कम दो राजनैतिक दलों ने अण्णा के समर्थन में आगे आने की की घोषणा की है | पर चतुर सुजान गांधीवादी अण्णा हजारे व उनके समर्थकों को यह भली-भांति विदित है कि वे उनके साथ इसलिए नहीं जुड़ना चाहते की भ्रष्टाचार से इन्हें परहेज़ है | बल्कि इसलिए कि अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने का यह अवसर वे अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहते | अण्णा इस बात को अच्छी तरह जानते हैं, इसलिए उन्होंने पहले ही साफ़ कर दिया था कि अब वे किसी भी पार्टी के नेताओं को अपने मंच पर नहीं आने देंगे |
यही कारण है कि अण्णा की मुहीम को समर्थन देने के घोषित उद्देश्य से वहां पहुंचे उमा भारती और ओमप्रकाश चौटाला के समर्थन की दाल नहीं गली | इस तरह आन्दोलनकारियों द्वारा लगाए गए "पालिटिशियन्स गो बैक" के नारा द्वारा जहां उमा उई माँ कहते हुए खिसक लीं वहीं चौटाला भी समर्थकों द्वारा चोटिया (भगा) दिए गए | यहाँ यह बताना जरूरी है कि इन्हीं उमा भारती के केंद्र में मंत्री रहते हुए दो बार लोकपाल बिल संसद में पारित होने के लिए आने के बावजूद पैदल हो गई | इस समय पूरा देश भयानक भ्रष्टाचार के चपेट में है | राजस्व, पुलिस, पीडब्ल्यूडी, आरटीओ, महानगरपालिका, जिलापरिषद से लेकर ग्राम पंचायत तक, दूर-संचार, रियल इस्टेट, मानव संसाधन, लाइसेंस और पीडीएस सहित लगभग हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार है | एक मैनेजमेंट गुरू के मुताबिक़ हर साल करीब ढाई लाख करोड़ रूपये का नुकसान भ्रष्टाचार के कारण होता है |
लोकसभा व विधान सभाओं के चुनावों में ही २५ हजार करोड़ से अधिक भ्रष्टाचार की मद में भेंट चढ़ते हैं | वर्ष २००९ के चुनाव में चुनाव आयोग व केंद्र-राज्य सरकारों ने लोक सभा चुनाव में दो हजार करोड़ रूपए ही खर्च किए, जबकि उम्मीदवारों ने लगभग १० हजार करोड़ रूपए ? इस हिसाब से हर एक सांसद की कीमत करीब दस करोड़ रूपए पडती है | विधायक भी तीन से पांच करोड़ रूपए में पड़ता है | जीत के बाद ये जन-प्रतिनिधि जनता से कई गुना पैसा वसूलते हैं | खाद्यान्न वितरण और केंद्र राज्य सरकारों के बजट का कम से कम ३५% हिस्सा भ्रष्टाचार का शिकार हो जाता है | करीब एक लाख ८८ हजार करोड़ रूपए तक की रिश्वत ली-दी जाती है ! ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ऐसी ही जंग की जरूरत देश को लम्बे अरसे से थी | इसके अभाव में सरकार या नेता और सिस्टम या ब्यूरोक्रेट्स व दलाल मिलकर देश को सरेआम डकार रहे थे | अण्णा ने इस जरूरत को समझा, इसीलिए उनके आन्दोलन को इतना जबरदस्त जन-समर्थन मिल रहा है | यह लड़ाई निर्णायक हो, ताकि सचमुच देश को भ्रष्टाचार से आज़ादी मिल सके |
मुनीर अहमद मोमिन
Thursday, April 7, 2011
be lagam: अण्णा की गुगली पर पवार क्लीन बोल्ड
be lagam: अण्णा की गुगली पर पवार क्लीन बोल्ड: " आखिर लोकपाल पर बवाल क्यों ? महात्मा गांधी के विचारों के अनुयायी कहे जाने वाले गां..."
अण्णा की गुगली पर पवार क्लीन बोल्ड
आखिर लोकपाल पर बवाल क्यों ?
महात्मा गांधी के विचारों के अनुयायी कहे जाने वाले गांधी टोपीधारी अण्णा हजारे द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर रोड पर किये जा रहे अनशन ने केन्द्रीय सरकार के सुख-चैन को छू-मंतर कर दिया है | इस तरह पहले से ही नाना प्रकार के भ्रष्टाचारों के आरोपों से दबे-घिरे मनमोहनी मुस्कान वाले नीली पगड़ी धारी प्रधानमंत्री खासे परेशान नजर आ रहे हैं | अभी जुमा-जुमा आठ दिन पहले ही विकिलीक्स द्वारा एक ओर खोदे गये कुंए को पाटने की जुगत में लगी केन्द्रीय संप्रग सरकार के लिए अण्णा हजारे के आंदोलन ने दूसरे तरफ खाई खोद दी है |
सबसे संतोषजनक बात तो यह है कि अण्णा द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान को देश के कोने-कोने से मिल रहा जन-समर्थन इस बात का सबूत है कि देशवासी भ्रष्टाचार से अब उबरना चाहते हैं | और तो और इस बार मीडिया ने भी इस अभियान की धार को पैनी बनाने के लिए अभी तक तो ठीक-ठाक ही रवैया अपनाया है | हालांकि अण्णा द्वारा खड़े किये गये इस आंदोलन पर भी संदेह की उंगली उठाने वालों की भी कमी नही है | ऐसे लोगों का माना है कि यह आंदोलन कांग्रेस के अंदर से ही डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से हटाने या उनका कद बौना करने की चाल है ? या इसके पीछे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (RSS) का हाथ है, जो समझौता बम कांड से देश का ध्यान हटाना चाहता है | दरअसल यह संदेह वे लोग खड़ा करने या करवाने की साजिश कर रहे हैं | जो भ्रष्टाचार के खिलाफ देश व्यापी जन-जागृत से भयभीत हो रहे हैं |
दिल्ली क्यों अपने गृह प्रदेश महाराष्ट्र में ही अण्णा हजारे के निंदकों की कोई कमी नहीं है | जो उनके समर्पित जीवन को लेकर तरह-तरह की उंगलियाँ उठाते रहे हैं | वैसे महाराष्ट्र में पिछले लगभग एक दशक से अण्णा ने भ्रष्टाचार के ढोल की पोल खोलते हुए कई मंत्रियों की बलि ली है | जिसमें सुरेश दादा जैन, नवाब मलिक आदि का नाम प्रमुख है | हाँ, यह बात जरुर है कि महाराष्ट्र में ज्यादातर शरद पवार के राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के लोग ही अण्णा हजारे के निशाने पर रहे हैं | दिल्ली में भी अण्णा के इस ताजे अभियान से शरद पवार का 'गेम' हो गया और वे क्लीन बोल्ड होकर मंत्री समूह समिति की पिच से पैवेलियन लौट चुके हैं |
यहाँ इस बात का उल्लेख अति आवश्यक है कि देश में लोकपाल की स्थापना संबंधी बिल की अवधारणा सबसे पहले १९६६ में सामने आयी | इसके बाद यह बिल अब तक लोकसभा में आठ बार पेश किया जा चुका है | लेकिन आज तक यह पारित नहीं हो पाया | पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के कार्यकाल में एक बार १९९६ में और अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी दो बार १९९८ और २००१ में इसे लोकसभा में लाया गया | वर्ष २००४ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वादा किया था कि जल्द ही लोकपाल बिल संसद में पेश किया जाएगा | लेकिन अब तक सरकार ने इसकी कोई सुध नहीं ली | इस बिल के तहत प्रधानमंत्री को लाया जाय या नहीं इस पर लम्बे समय से मशक्कत चल रही है | फिर भी अब तक कोई नतीजा हासिल नहीं हुआ |
मुनीर अहमद मोमिन
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