Friday, April 29, 2011

दलाली के दलदल से 'दलालमय' होता जा रहा है देश !

   सालाना ४४ हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान ?
         
         आज समूचा देश दलाली के दलदल में फंसकर दलालमय होता जा रहा है | दलालों न पूरे देश को और उसके सिस्टम को अपने खूनी पंजे में जकड़ लिया है | एक पुरानी कहावत है पैसा-पैसे को खींचता है | इसलिए आदमी-आदमी से दूर होता जा रहा है | सारा माल दलाल खा रहे हैं | इसलिए करोड़ों लोग रोज़ रात को भूखे ही सोते हैं | महंगाई एक प्रतिशत भी बढती है | तो ३० लाख से अधिक भारतीय गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं | जबकि दलालों को रोज़ १८० करोड़ रूपए तक फायदा होता है | इससे तीन करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता है | यह है तो एक अनुमान लेकिन इससे पता चलता है कि हम कैसे देश और कैसे समाज में रहते हैं | हमारे लिए पैसा और मनुष्य में किसकी कीमत ज्यादा है ? हममें से कुछ लोग इतना खाते हैं कि उन्हें बदहजमी हो जाती है और कितने ही लोग भूख से तडपते हुए जब मर जाते हैं | तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कोई भी बोगस बीमारी का उल्लेख कर दिया जाता है | क्योंकि भूख सबसे बड़ी बीमारी है | और भूखे व्यक्ति को कोई भी बीमारी हो सकती है | वह बीमार भी न हो तो ठंड में अकड़कर मर सकता है | गर्मी में भी वह लू लगने से मर सकता है | 
         फाइव स्टार होटल में कोल्ड्रिक के लिए सैकड़ों रूपए देने वाले लोगों की बीवियां बाज़ार में सब्जी खरीदने पर मोल-भाव करती दिखाई दे सकती हैं | हमारे देश में क्रिकेट में जीतने पर करोड़ों रूपए मिलते हैं | मगर जब कोई पूरा परिवार आत्म हत्या कर लेता है, माता-पिता बच्चों का गला घोंटकर या उन्हें जहर पिलाकर खुद फांसी लगा लेते हैं | तब पता चलता है कि यह मौत की नहीं बल्कि गरीबी की मार है | आप पाएंगे कि देश में कास्मेटिक्स और हर्बल प्राडक्ट्स के बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहे हैं | मगर करोड़ों बच्चों के लिए दूध तो छोड़े बीमार पड़ने पर दवा की कोई व्यवस्था तक नहीं है | ये सब मैं क्यों बता रहा हूँ ? इसलिए कि हम और आप इसी समाज में रहते हैं | भारत एक ऐसा देश है जहां कृषि उत्पादकों या किसानों का सकल घरेलू उत्पाद में या देश की कुल आय में हिस्सेदारी से ज्यादा उसी के पैदा किए गए अनाज के वायदा बाज़ार का कारोबार है | यानि कमाता है धोती वाला, खाता है टोपी वाला (नेता,दलाल) और ऐश करता है टाई वाला (अधिकारी वर्ग) |
            कामन वेल्थ गेम के ही घोटाले को ले लें तो यह घोटाला चाहे ३५ हजार करोड़ रूपए का हो या ७० हजार करोड़ रूपए का | उसमें ९०० करोड़ रूपए ऐसे शामिल बताए गए हैं, जो देर से निर्णय लेने के कारण अतिरिक्त खर्च हुए | मतलब यह घोटाला एक तरह का अतिरिक्त घोटाला या एडिशनल स्कैम है | जहां तक घोटाले का मुद्दा है, सीबीआई जांच कर रही है | अब वह जांच में कितने का घोटाला पाती है | यह तो भविष्य का सवाल है | इतना जरूर है कि हमारे सिस्टम में आलस्य या लापरवाही कूट-कूट कर भरी हुई है | समय पर निर्णय नहीं लेना, लिए गए निर्णय को लागू नहीं करना पर्सेंटेज के लिए आपस में सांठ-गांठ और टेंडर प्रक्रिया में बे-वजह देरी के कारण यह अतिरिक्त खर्च बढ़ता है | यदि तीन सालों में औसत अनुमान ही लगाएं तो करीब एक लाख ३५ हजार करोड़ रूपए का नुकसान इस देरी के कारण अतिरिक्त खर्च के रूप में देश को होता है | एक अनुमान के मुताबिक़ देश भर के राज्य व केंद्र का कुल बजट ३० लाख करोड़ रूपए है | यानि महंगाई की बढती दर को १०% भी माने तो तीन लाख करोड़ रूपए का नुकसान ! यह अर्थ व्यवस्था का ऐसा छिपा हुआ पहलू है | जिसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता | हर साल ४४ हजार करोड़ रूपए से अधिक का नुकसान इसी से होता है | यह नुकसान पूरे सिस्टम में है | पंचायत स्तर से लेकर नगरपालिका, महानगरपालिका और ज़िला परिषद व अन्य सरकारी कार्यालयों, विभागों तक यदि इस पहलू को ध्यान में रखकर आडिट किया जाए तो पता चलेगा कि देश में पिछडापन इसी वजह से है |
                                                                                     मुनीर अहमद मोमिन   

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