आंदोलनकारियों ने नेताओं को रोटी नहीं सेंकने दी
हमारे देश के राजनेता चाहे वह किसी भी दल के हों | शादी-विवाह से लेकर श्मशान बरास्ता शव यात्रा तक में अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने से बाज नहीं आते |यहाँ तक कि गैर-राजनैतिक संगठनों या सामाजिक संगठनों द्वारा जब कोई ढंग का अभियान चलाया जाता है, तो वहां के केवल सत्तापक्ष के नेताओं को छोड़कर बाकी विपक्ष के सारे नेता अपने समर्थन की टोकरी लेकर घडियाली आंसू बहाने पहुंच जाते हैं | जब कभी इस प्रकार के प्रदर्शन आदि को व्यापक जन-समर्थन मिलने लगता है तो उसका राजनैतिक लाभ लेने के लिए राजनैतिक दलों में होड़ सी लग जाती है | "मान न मान, मैं तेरा मेहमान" बनकर वे उसमें शामिल होने के लिए व्याकुल हो जाते हैं |
इस तरह अच्छे उद्देश्यों और अच्छे कार्यों के लिए शुरू किया गया आन्दोलन इन राजनैतिक दलों की घटिया राजनीति का साधन बनकर रह जाता है | अण्णा हजारे के भी आमरण सत्याग्रह को बिना मांगे समर्थन देने के लिए निहित स्वार्थों वाले नेताओं का मजमा दिल्ली के जंतर-मंतर रोड पर जुट गया | कम से कम दो राजनैतिक दलों ने अण्णा के समर्थन में आगे आने की की घोषणा की है | पर चतुर सुजान गांधीवादी अण्णा हजारे व उनके समर्थकों को यह भली-भांति विदित है कि वे उनके साथ इसलिए नहीं जुड़ना चाहते की भ्रष्टाचार से इन्हें परहेज़ है | बल्कि इसलिए कि अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने का यह अवसर वे अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहते | अण्णा इस बात को अच्छी तरह जानते हैं, इसलिए उन्होंने पहले ही साफ़ कर दिया था कि अब वे किसी भी पार्टी के नेताओं को अपने मंच पर नहीं आने देंगे |
यही कारण है कि अण्णा की मुहीम को समर्थन देने के घोषित उद्देश्य से वहां पहुंचे उमा भारती और ओमप्रकाश चौटाला के समर्थन की दाल नहीं गली | इस तरह आन्दोलनकारियों द्वारा लगाए गए "पालिटिशियन्स गो बैक" के नारा द्वारा जहां उमा उई माँ कहते हुए खिसक लीं वहीं चौटाला भी समर्थकों द्वारा चोटिया (भगा) दिए गए | यहाँ यह बताना जरूरी है कि इन्हीं उमा भारती के केंद्र में मंत्री रहते हुए दो बार लोकपाल बिल संसद में पारित होने के लिए आने के बावजूद पैदल हो गई | इस समय पूरा देश भयानक भ्रष्टाचार के चपेट में है | राजस्व, पुलिस, पीडब्ल्यूडी, आरटीओ, महानगरपालिका, जिलापरिषद से लेकर ग्राम पंचायत तक, दूर-संचार, रियल इस्टेट, मानव संसाधन, लाइसेंस और पीडीएस सहित लगभग हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार है | एक मैनेजमेंट गुरू के मुताबिक़ हर साल करीब ढाई लाख करोड़ रूपये का नुकसान भ्रष्टाचार के कारण होता है |
लोकसभा व विधान सभाओं के चुनावों में ही २५ हजार करोड़ से अधिक भ्रष्टाचार की मद में भेंट चढ़ते हैं | वर्ष २००९ के चुनाव में चुनाव आयोग व केंद्र-राज्य सरकारों ने लोक सभा चुनाव में दो हजार करोड़ रूपए ही खर्च किए, जबकि उम्मीदवारों ने लगभग १० हजार करोड़ रूपए ? इस हिसाब से हर एक सांसद की कीमत करीब दस करोड़ रूपए पडती है | विधायक भी तीन से पांच करोड़ रूपए में पड़ता है | जीत के बाद ये जन-प्रतिनिधि जनता से कई गुना पैसा वसूलते हैं | खाद्यान्न वितरण और केंद्र राज्य सरकारों के बजट का कम से कम ३५% हिस्सा भ्रष्टाचार का शिकार हो जाता है | करीब एक लाख ८८ हजार करोड़ रूपए तक की रिश्वत ली-दी जाती है ! ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ऐसी ही जंग की जरूरत देश को लम्बे अरसे से थी | इसके अभाव में सरकार या नेता और सिस्टम या ब्यूरोक्रेट्स व दलाल मिलकर देश को सरेआम डकार रहे थे | अण्णा ने इस जरूरत को समझा, इसीलिए उनके आन्दोलन को इतना जबरदस्त जन-समर्थन मिल रहा है | यह लड़ाई निर्णायक हो, ताकि सचमुच देश को भ्रष्टाचार से आज़ादी मिल सके |
मुनीर अहमद मोमिन
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