आखिर लोकपाल पर बवाल क्यों ?
महात्मा गांधी के विचारों के अनुयायी कहे जाने वाले गांधी टोपीधारी अण्णा हजारे द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर रोड पर किये जा रहे अनशन ने केन्द्रीय सरकार के सुख-चैन को छू-मंतर कर दिया है | इस तरह पहले से ही नाना प्रकार के भ्रष्टाचारों के आरोपों से दबे-घिरे मनमोहनी मुस्कान वाले नीली पगड़ी धारी प्रधानमंत्री खासे परेशान नजर आ रहे हैं | अभी जुमा-जुमा आठ दिन पहले ही विकिलीक्स द्वारा एक ओर खोदे गये कुंए को पाटने की जुगत में लगी केन्द्रीय संप्रग सरकार के लिए अण्णा हजारे के आंदोलन ने दूसरे तरफ खाई खोद दी है |
सबसे संतोषजनक बात तो यह है कि अण्णा द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान को देश के कोने-कोने से मिल रहा जन-समर्थन इस बात का सबूत है कि देशवासी भ्रष्टाचार से अब उबरना चाहते हैं | और तो और इस बार मीडिया ने भी इस अभियान की धार को पैनी बनाने के लिए अभी तक तो ठीक-ठाक ही रवैया अपनाया है | हालांकि अण्णा द्वारा खड़े किये गये इस आंदोलन पर भी संदेह की उंगली उठाने वालों की भी कमी नही है | ऐसे लोगों का माना है कि यह आंदोलन कांग्रेस के अंदर से ही डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से हटाने या उनका कद बौना करने की चाल है ? या इसके पीछे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (RSS) का हाथ है, जो समझौता बम कांड से देश का ध्यान हटाना चाहता है | दरअसल यह संदेह वे लोग खड़ा करने या करवाने की साजिश कर रहे हैं | जो भ्रष्टाचार के खिलाफ देश व्यापी जन-जागृत से भयभीत हो रहे हैं |
दिल्ली क्यों अपने गृह प्रदेश महाराष्ट्र में ही अण्णा हजारे के निंदकों की कोई कमी नहीं है | जो उनके समर्पित जीवन को लेकर तरह-तरह की उंगलियाँ उठाते रहे हैं | वैसे महाराष्ट्र में पिछले लगभग एक दशक से अण्णा ने भ्रष्टाचार के ढोल की पोल खोलते हुए कई मंत्रियों की बलि ली है | जिसमें सुरेश दादा जैन, नवाब मलिक आदि का नाम प्रमुख है | हाँ, यह बात जरुर है कि महाराष्ट्र में ज्यादातर शरद पवार के राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के लोग ही अण्णा हजारे के निशाने पर रहे हैं | दिल्ली में भी अण्णा के इस ताजे अभियान से शरद पवार का 'गेम' हो गया और वे क्लीन बोल्ड होकर मंत्री समूह समिति की पिच से पैवेलियन लौट चुके हैं |
यहाँ इस बात का उल्लेख अति आवश्यक है कि देश में लोकपाल की स्थापना संबंधी बिल की अवधारणा सबसे पहले १९६६ में सामने आयी | इसके बाद यह बिल अब तक लोकसभा में आठ बार पेश किया जा चुका है | लेकिन आज तक यह पारित नहीं हो पाया | पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के कार्यकाल में एक बार १९९६ में और अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी दो बार १९९८ और २००१ में इसे लोकसभा में लाया गया | वर्ष २००४ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वादा किया था कि जल्द ही लोकपाल बिल संसद में पेश किया जाएगा | लेकिन अब तक सरकार ने इसकी कोई सुध नहीं ली | इस बिल के तहत प्रधानमंत्री को लाया जाय या नहीं इस पर लम्बे समय से मशक्कत चल रही है | फिर भी अब तक कोई नतीजा हासिल नहीं हुआ |
मुनीर अहमद मोमिन
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