देश की सभी योजनाएं सफेद हाथी !
इस आपा-धापी के दौर में हम इतने व्यस्त व लस्त-पस्त हो गये या करा दिए गए हैं कि हमें यह पता नही चल पा रहा है कि कैसे-कैसे 'अजगर' हमारी योजनाओं और अर्थ व्यवस्था को निगलते जा रहे हैं | देश के करोड़ों निवेशकों की कमाई अमीरों और वेदेशी निवेशकों के हाथों में जाने के कारण हमारी राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो गयी है | इसे केवल और केवल भारतीय किसानों ने संभाला है | हालात यह है कि यदि देश में २२-२३ करोड़ टन अनाज पैदा नहीं हुआ होता तो आज भारत दूसरा 'सोमालिया' बन जाता | फिर भी हमारी असफल सरकार देश पर दिनों-दिन मंहगाई और गरीबी लादती ही चली जा रही है | जबकि दूसरी ओर हर साल उद्योगपतियों और अमीरों को लगभग डेढ़ लाख करोड़ रूपये की टैक्स में छूट या राहत मिलती रही है | वह भी इन परिस्थितियों में कि वे ५० हजार करोड़ रूपये से अधिक का बैंक लोन भी डूबो चुके हैं | इतना ही नहीं घोटालों या हवाला कारोबार से भी भारतीय अर्थ व्यवस्था की भारी क्षति हुई है | जरूरत है आज भ्रष्टाचार, आंदोलन और सरकारी अहंकार में फंसे विकास को बाहर निकालकर दिशा व गति देने की | यह सदबुद्धि हमारे देश के राजनेताओं, मंत्रियों, सरकार अथवा सरकारों को कब आयेगी ?
एक ओर देश भ्रष्टाचार से लड़ रहा है, तो दूसरी ओर सरकार के मंत्री और उसका तंत्र भ्रष्टाचार में पूरी तरह लिप्त नजर आ रहे हैं | इन दो पाटों के बीच में हमारा राष्ट्रीय विकास फंसकर छट-पटा रहा है | चालू वित्त वर्ष में केंद्र सरकार ने नौ लाख करोड़ रूपये का राजस्व हासिल करने का इरादा जताया है | यह रकम पिछले साल से एक लाख आठ हजार करोड़ रूपये अधिक है | जारी वित्तीय वर्ष का बजट पेश करते समय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने यह दावा किया था कि तीन वर्षों में १५ लाख करोड़ रूपये की राशि योजना बजट में रखी या खर्च की गयी है | लेकिन "चतुर सुजान 'दादा" यह बात साफ़ तौर पर छिपा गए कि इतनी भारी रकम खर्चने के बावजूद जो विकास होना चाहिए वह तो देश में गधे के सींग की तरह कहीं दिखाई नहीं दे रहा है | गरीबों का जीवन स्तर उठना तो दूर इन्फ्रास्ट्रक्चर को लेकर वही भिखमंगाई चहुँ ओर दिखाई दे रही है | 'दादा' यह बात भी सिरे से गोल कर गए कि योजना बजटों की राशि से तिगुनी रकम गैर योजना बजट यानी प्रशासन के मद में खर्च हुई | ये खर्च क्या इस बात को साबित नहीं करते कि हम सफेद हाथी पाल रहे हैं | राजनेता, मंत्री भ्रष्ट हैं और उनके साए में पल रहा प्रशासन नामक 'सफेद हाथी' के कब्जें में ही देश का खजाना हैं |
यही कारण है कि देश का विकास भी हाथी चाल यानी मन्दगति से ही हो रहा है | प्रणव दा के मुताबिक़ यदि नौ लाख करोड़ रूपये या इससे ज्यादा का राजस्व हासिल भी होता है तो विकास कार्यों में कितनी रकम खर्च होगी | जो जारी वर्ष में ३५ से ४० फीसदी के बीच ही है | इससे साबित होता है कि हमारे समक्ष पैसे के कमी की समस्या बिलकुल ही नहीं है | इस सन्दर्भ में हम अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा का उदाहरण ले सकते हैं | क्योंकि पिछले १२ वर्षों में अमेरिका को करीब १९ लाख करोड़ रूपये का बजटीय घाटा हुआ है | जिसके मद्देनजर वे घाटे को घटाने के लिए अमीरों को दी जा रही टैक्स कटौती वापस लेना चाहते हैं | लेकिन भारत में लोकतंत्र के नाम पर एक ऐसी पूंजीवादी सरकार है जो अमीरों, कालाबाजारियों और जमाखोर-दलालों की है | प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी अमीरों के घोर पैरोकार तो हैं ही, कृषि मंत्री शरद पवार भी खेती-किसानों को वायदा बाज़ार के हवाले करते रहें हैं | वित्त मंत्री रहते हुए पी. चिदम्बरम ने खुलकर शेयर बाज़ार की तेजी का पक्ष लिया | परिणाम यह हुआ कि निम्न मध्यम वर्ग व मध्यम वर्ग ने जमकर निवेश किया . फिर उसके बाद बाज़ार ढहता चला गया | नतीजतन आज यह वर्ग खुद औंधे मुंह पड़ा है |
मुनीर अहमद मोमिन
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