Tuesday, April 5, 2011

आखिर देशवासियों को कब मिलेगा भर पेट भोजन ?



सार्वजनिक वितरण प्रणाली का बंटाधार 

      
सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानि पीडीएस, आज पूरे देश में लागू है | लेकिन इसके कुशल संचालन को लेकर हमेशा सवाल खड़े होते रहे हैं | सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी जस्टिस बधवा कमेटी ने पीडीएस को बोगस और देश के कई राज्यों में एकदम फेल करार दिया है | उनके मुताबिक़ यह प्रणाली भ्रष्ट, दोष पूर्ण और अपर्याप्त है | पिछले छह दशकों में हुए पीडीएस घोटालों में पिछले साल उजागर हुआ अरूणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री गेगांक अपांग का एक हजार करोड़ का पीडीएस घोटाला भी जुड़ गया है | अतः सार्वजनिक वितरण प्रणाली केवल ठीक-ठाक करने से कारगर नहीं हो सकती, जरूरत है इसमें आमूल-चूल परिवर्तन की | महज़ अन्न की उपलब्धता से लोगों को संतुलित भोजन नहीं मिल पायेगा |
      असल समस्या यह है कि अनाज आम लोगों तक पहुंच नहीं रहा है | इसलिए हमें एक ऐसी व्यवस्था पर जोर देना होगा जो अन्न को जरूरतमंद लोगों तक समय रहते पहुंचा सके | इसके लिए जरूरी है कि सरकारी तंत्र अपनी व्यवस्था को तर्क संगत और प्रभावी बनाए | यह तभी हो पायेगा जब सरकार इसे अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में एक मानकर चले | यहाँ इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि गरीबों के नाम पर हमारे देश में ढेर सारी योजनाएं हैं, लेकिन वितरण व्यवस्था में गडबडियों और भ्रष्टाचार के कारण आर्थिक असमानता की खाई दिन-ब-दिन चौड़ी ही होती जा रही है | 
      भारत में हर साल लगभग 25 लाख शिशुओं की अकाल मृत्यु होती है और यहाँ के 42% बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं | गर्भवती महिलाओं को न्यूनतम भोजन देने की कोई  समन्वित योजना नहीं है | अनाज सड़ता रहता है लेकिन सरकार उसे भूखों को मुफ्त बांटने को तैयार नहीं है | इस तर्क के साथ कि मुफ्त या सस्ता अनाज उपलब्ध कराने से देश के किसान हतोत्साहित होंगे | सरकार किसानों को सीधे अधिक सब्सिडी देने की योजना क्यों नहीं क्रियान्वित करती ? अमेरिका और यूरोप में अनाज सस्ता होने के बावजूद वहां के किसानों को अपनी सरकार से कोई शिकायत क्यों नहीं है ?
      ऐसा नहीं है कि देश में मौजूदा गरीबों को पेट भर खाना देने के लिए हमारे पास खाद्यान्न की कोई कमी है | एक अनुमान के अनुसार हमारे यहाँ फसल की कटाई से लेकर उसको गोदाम में पहुँचाने तक जितने अनाज की बर्बादी होती है, उतनी आस्ट्रेलिया में फसल की उपज होती है | हालांकि सुप्रीम कोर्ट सरकार से बार-बार कह रहा है कि अनाज को खुले आसमान में सड़ने के लिए छोड़ने से बेहतर है कि गरीब का पेट भरा जाए | कोर्ट का यह भी कहना है कि सिर्फ नीति बनाने से काम नहीं चलेगा | उन्हें जमीनी स्तर पर लागू करना जरूरी है | किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए खाद्यान्न की खरीद सरकार करती है |
मुनीर अहमद मोमिन   

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