Wednesday, April 20, 2011

जन-लोकपाल भी महिला बिल की राह पर?

                 महिला विधेयक की राह का कौन है रोड़ा  
जन-लोकपाल विधेयक पर इस समय पूरे देश में कचाईन मची हुई है | देश में चर्चा के पर्यायवाची शब्द के रूप में अघोषित 'मान्यता' प्राप्त स्वंयभू महाविद्वान श्रीयुत सुब्रहमण्यम स्वामी जी ने अपना प्रवचन सुनाते हुए कहा है कि गांधीवादी नेता अण्णा हजारे के इर्द-गिर्द भ्रष्ट लोगों का जमावड़ा है | जबकि लालकृष्ण आडवानी के अण्णा के खिलाफ बयान के बावजूद बीजेपी ने कांग्रेस पर खुला आरोप लगाया है कि अण्णा हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को बदनाम करने के लिए केंद्र सरकार ने पेशेवर लोगों को सुपारी दे रखी है | बीजेपी के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने अपने बयान में कहा है कि कांग्रेस पर्दे के पीछे भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को बदनाम करने के लिए कई तरह के घटिया, शर्मनाक और अनैतिक हथकंडे प्रयोग कर रही है | पता नहीं नकवी ने अपने पार्टी के प्रधानमंत्री बनने की प्रबल लालायित आडवानी का चार दिन पहले का बयान याद है कि नहीं | जिसमें उन्होंने अण्णा को लोकतंत्र का "इज्जत उतारू" बताया था | अधिकाँश राजनैतिक दलों के दोगलापन के कारण अब आशंका पैदा होने लगा है कि जन-लोकपाल विधेयक का संसद में वही हश्र न हो जो महिला बिल का होता आया है |
          बता दें कि १३ साल की लम्बी लड़ाई के बाद पिछले दिनों लोकसभा के शीतकालीन सत्र में महिला उत्पीड़न रक्षा विधेयक २०१० में पेश हुआ | जो केन्द्रीय मन्त्रिमंडल की मंजूरी के बाद लोकसभा की स्थाई समिति के पास जा चुका है | लेकिन इस विधेयक में भी बहुत झोल-झाल बताया जा रहा है | इस नए विधेयक की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह क़ानून घरेलू महिला कामगारों पर लागू नहीं होगा | इस तरह जिन महिलाओं को इस नए क़ानून से सबसे ज्यादा सुरक्षा मिलनी चाहिए, उन तमाम घरेलू कामगार महिलाओं को इस नये क़ानून के दायरे से बाहर रखा गया है | जबकि हम सभी लोग यह बात जानते हैं कि हमारे देश में घरेलू कामगार महिलाओं का सबसे ज्यादा यौन शोषण होता है | हर रोज़ कहीं न तो कहीं से अपनी घरेलू नौकरानी के साथ मालिक या घर के बिगड़े शहजादों द्वारा दुराचार या बुरी नियत से पकड़ने की खबरें आती रहती हैं | पैसे के बल पर आज न जाने कितनी महिलाओं की आबरू से खेला जाता है | और फिर चाणक्य नीति साम, दाम, दंड, भेद अपनाते हुए ये अमीर लोग बेचारी इन गरीब महिलाओं का मुंह पैसे से बंद कर देते हैं  
          अगर आज इन्हें ही नये विधेयक से छोड़ दिया गया तो फिर इस विधेयक का उद्देश्य ही खत्म हो गया | इस बाबत जानकारों का कहना है कि दरअसल सरकार द्वारा घरेलू कामगार महिलाओं को इस विधेयक में न लेना और उन्हें इस विधेयक से दूर रखने के पीछे सरकार की शायद ये मंशा हो सकती है, कि इनके द्वारा इस विधेयक का दुरूपयोग हो सकता है | क्योंकि देश में लाखों-करोड़ों की तादाद में घरेलू कामगार महिलाएं हैं | इससे नौकर-मालिक की जरा सी खट-पट सरकार का सिरदर्द बढ़ा सकती है | वजह बिलकुल साफ़ है | आज देश की हर एक अदालत में मुकदमों का अम्बार लगा हुआ है | सरकारी आंकड़ों और विधि मंत्रालय के पास ताज़ा मौजूद आंकड़ों के मुताबिक़ देश भर के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग २६५ न्यायाधीशों की आज भी कमी है, और इस कमी के चलते लंबित मुकदमों की संख्या लगभग ३९ लाख हो गई है | वहीं देश की विभिन्न अदालतों में लगभग ३,१२८ करोड़ लंबित मामले चल रहे हैं | कई वर्ष पहले राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस विधेयक पर काम कर महिला संगठनों और वकीलों से व्यापक विचार-विमर्श कर इसके कई प्रारूप तैयार किए | पर उसी राष्ट्रीय महिला आयोग का कहना है कि इस प्रारूप की जरा सी झलक भी इस नए विधेयक में दूर-दूर तक भी नहीं दिखाई दे रही है |
          उल्लेखनीय बात यह है कि सबसे पहले हमारा यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न विधेयक में क्या-क्या रखा गया है | इस नए क़ानून में किसी भी पुरूष साथी द्वारा कार्य स्थल पर अपनी महिला साथी के साथ अप्रिय यौन आचरण, अश्लील मौखिक टिप्पणी, शारीरिक संपर्क, द्वीअर्थी बातें, छेड़-छाड़, सूक्ष्म यौन इशारे, अश्लील मजाक, चुटकुले, महिला को अश्लील साहित्य दिखाना (शाब्दिक, इलेक्ट्रानिक अथवा मुद्रित), यौन एहसान की मांग या अनुरोध, अन्य कोई अप्रिय शारीरिक, मौखिक या गैर मौखिक क्रिया | ये सब इस नए महिला यौन उत्पीड़न के तहत आते हैं |
                                                                                          मुनीर अहमद मोमिन            

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