घोटालों के सवालों पर चौतरफा हमला झेल रहे देश के नितांत शरीफ अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने पूर्ण रूपेण इस मुहावरे को आत्मसात कर लिया है, कि एक चुप हजार चुप या सौ वक्त एक चुप हरावे | प्रधानमंत्री की चीरचुप्पी या मौन धारण को देश की सर्वोच्च अदालत भी नही डिगा सकी | इससे पहले तो विपक्ष प्रधानमंत्री को घेरकर संसद में कबड्डी-कबड्डी खेलना चाहता था | लेकिन प्रधानमंत्री की ख़ामोशी को देखकर अब भाजपा ने भी राग भैरवी छेड़ दिया है कि कुछ तो बोलिए सिंह साहेब | लेकिन सिंह साहेब हैं कि प्रण कर बैठे हैं कि "मैंना बोलूँगा, कुछ ना बोलूँगा" जबकि सिंह नामक जीव दहाड़ने के लिए मशहूर है| लेकिन अपने सिंह चुप रहने के लिए प्रसिद्ध हैं| विनोदी और मनोवैज्ञानिक प्रवृत्त के लोग भाजपा को यह सलाह दे सकते हैं कि हल्के आसमानी पगडीवाले सिंह के बगल में अगर वह अपने नवजोत सिंह सिद्धू को लगा दे तो शायद खरबूजा को देखकर खरबूजा रंग बदल दे| या चल चित्र के माध्यम से भाजपा में चलती चलाने वाले शत्रुघ्न सिन्हा , हेमा मालिनी, विनोद खन्ना और स्मृति ईरानी आदि की टीम बनाकर मनमोहन सिंह को घेरवाकर ये सम्पादित पैरोडी गवाना शुरू कर दें कि "चुप -चुप पड़े हो , जरूर कोई घात है | ये घोटालों की बात है, ये घोटालों की बात है"| लेकिन मुझे नहीं लगता कि प्रधानमंत्री को घेरकर विपक्ष अपना उल्लू सीधा कर पायेगा | मनोवैज्ञानिक विश्लेषकों की राय है कि विपक्ष समझ रहा है कि उसने प्रधानमंत्री की बोलती बंद कर दिया है| जबकि प्रधानमंत्री मन ही मन कह रहें है कि -
विपक्ष कर रहा है, मेरी खामोशी का तवाफ़ |
और देश समझ रहा है, कि कश्ती भंवर में है ||
मुनीर अहमद मोमिन
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