प्रसंग वश अपनी बात इस लोकोक्ति के साथ शुरू करना पद रहा है कि " मार पड़ी जब शमसीरों की,महाराज मैं नाई हूँ "| यह शतप्रतिशत यहाँ के पावरलूम मालिकों पर लागू होती है | जब लूम ठीक-ठाक चलता है तब पावरलूम मालिक शेरो की तरह गर्जना करते फिरते हैं | लेकिन जरा सा टैक्स आदि, धागे का भाव और बिजली का बिल आदि दाएं-बाएं होने पर यह लोग सियार की तरह हुआं-हुआं करना शुरू कर देते हैं | हालांकि पावरलूम मालिकों के समक्ष उत्पन्न हुई इस दुखद घड़ी में मैं पूर्ण रूपेण इनके साथ हूँ | लेकिन मैं इनके तरह इनके उद्योग के वाहक पावरलूम मजदूरों के भी हितों को कत्तई नजर अंदाज नही कर सकता | यह सच है कि पावरलूम उद्योग पिछले पचास वर्षों से तरह-तरह की परेशानियों को झेलते हुए निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर है | और इसका प्रभाव पावरलूम मालिकों के उपर भी देखने को मिल रहा है | जिससे खोली में रहने वाला सेठ फ्लैटों और बगलों में रहने लगा | पैदलिया और सैकिलिया सेठ विभिन्न माडलों की चमचमाती कारो में चलने लगा | पांच,दस-बीस पावरलूम वाला सेठ कई पावरलूम शेडो का मालिक बन बैठा | लेकिन उसी समय का मजदूर आज भी मजदूर और पैदलिया ही है | हाँ,उसने इस अवधि में इतना तरक्की जरुर कर लिया कि जो पहले उसकी लकड़ी की फलटी की दीवार थी वह ईंट की और छत कबेलू के बजाय सीमेंट के पतरों की हो गयी है | मजदूरी आज भी वहीं की वहीं है | कोई भी कारोबार या उद्योग मालिक और मजदूर के समानुपातिक आर्थिक तालमेल की बुनियाद पर ही विकसित होता या जीवंत होता है | पावरलूम मालिको ने धांगों की कीमतों के बढ़ोत्तरी के विरोध में १६ नवंबर से २० नवंबर तक पांच दिवसीय हड़ताल का ऐलान कर दिया है | लेकिन इस अवधि में मजदूरों के होने वाले आर्थिक नुकसान का क्या ? क्योकि जब लूम चलता है तभी उनको मजदूरी मिलती है |
मुनीर अहमद मोमिन
sahi khaa aap ne ye bhiwandi ki sadiyo se chalne wali reet hai ab iss se hat kar kuch naya kerne ki zarurat hai .........
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