मौजूदा मीडिया की सोच : हम करें सो कायदा
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कल एक खबरिया चैनल पर भ्रष्ट मीडिया की पैरवी करते हुए अपने शब्द जाल/तर्क से मीडिया को रिन अथवा निरमा से धुला झक सफ़ेद बताया | इसमें कोई शक नहीं कि राजदीप सरदेसाई जी एक नामवर, संवेदनशील और पैनी नजर वाले सभ्य व होनहार पत्रकार हैं और मैं स्वंय उनके अनन्य प्रशंसकों में से एक हूँ | लेकिन खबरिया चैनल पर मीडिया के पक्ष में की गयी उनकी वकालत किसी भी तरह किसी भी होशमंद के गले उतरने को तैयार नहीं है | यह तो वही बात हुई कि - " मार पड़ी जब शमशीरों की , महाराज मै नाई हूँ " जब बात आई मीडिया के लोगों की दलाली करने की तो दलाल की जगह लाबिस्ट शब्द ढूढ़ निकाला है | तो भैया मीडिया के माई-बापों लाबिस्ट शब्द दूसरों के लिए क्यों नही ? दूसरे दलाल कहलायें ओर मीडिया वाले दलाली करें तो लाबिस्ट कहलायें | ऐसा शब्दों ओर सोच दोनों का दोगलापन क्यों ? अभी कुछ माह पहले ही "पेड न्यूज" के खिलाफ हिन्दी के मूर्धन्य पत्रकार स्व. प्रभाष जोशी जी के पहल पर चलाए जा रहे अभियान से देश के कितने अखबारों, अखबार समूहों ओर खबरिया चैनलों के मालिक ओर संपादक सहमत हुए थे ? लगभग ढाई सौ सदस्यों वाली एडीटर गिल्ड्स के अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि लगभग ढाई सौ मीडिया के धुरंधरों में से केवल पच्चीस-तीस ही ईमानदारी व दयानतदारी दिखाते हुए "पेड न्यूज" बंद करने के पक्ष में थे | बाकी लगभग सवा दो सौ मीडिया के आकाओं की इस पर बोलती बंद है | मीडिया ने कब दलाली और राजनेताओं सहित नौकरशाहों की पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता नही की ? पिछले दो दशकों से मीडिया के आका व ठेकेदार किसी न किसी राजनेता और किसी न किसी राजनैतिक पार्टी को प्रमोट करने अथवा लांछित करने की भी सुपारी लेते रहे हैं | और बदले में तमाम तरह से उपकृत होते रहे है | आज चिरकुट से चिरकुट मीडिया वाला भी साल में दो अंकों से लेकर तीन अंकों तक की हवाई यात्राओं का लाभ किसी न किसी के द्वारा कटाए टिकट पर लेते रहे हैं | इतना ही नही अपनी औकात से कई गुना तमाम तरह की भौतिक सुख-सुविधाओं सहित राज्यसभा से लेकर विधान परिषद तक में जाने के लिए अनेकों मीडियाकर्मी पत्रकार के बदले चाकरों की भूमिका निभाते आयें हैं | सच तो यह है कि आज देश में मीडिया का कारोबार सबसे ज्यादा लाभकारी साबित हो रहा है | विभिन्न प्रकार के लाइसेंसों सहित विभिन राजनैतिक दलों के चुनाव टिकटों के आवंटन तक मीडियाकर्मी कहाँ अपनी दलाली सारी ! लाबिंग करने से बाज आते हैं ? मेरी निजी राय है कि बरखा दत्त और वीर सिंघवी तो इस लिए कटघरे में खड़े हैं कि उनका राज खुल गया | नही तो मीडिया में ऐसे दत्त और सिंघवी तो एक ढूढों हजार मिलते हैं | जो पकड़ गया वह मुजरिम नहीं तो संत तो है ही | (जारी ...............)
मुनीर अहमद मोमिन
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