मीडिया का बाजारीकरण नहीं बाजारूपन
वह दिन लद गए जब पत्रकारिता पेशा न होकर मिशन हुआ करता था | आज सरस्वती के इस प्रतिष्ठान पर लक्ष्मी के वाहक उल्लूओं ने कब्ज़ा जमा लिया है | बड़े-बड़े धन्ना सेठों ने अपने उद्योग हित हेतु मीडिया की दुकान खोलकर सरकार अथवा सरकारों पर दबाव बनाकर या चाटुकारिता करके कोटा-परमिट का खेल खेल रहे हैं | इनके हित हेतु ज्यादातर खबरें प्रायोजित हुआ करती हैं | चूंकि मीडिया के ज्यादातर मालिकान धन्नासेठ होते हैं | इसलिए मीडिया पर बाज़ार का असर तो पड़ेगा ही | और जिस पर बाज़ार का असर पड़े उसे बाजारुपन होने से कौन रोक सकता है ? अब यह बात इतिहास की हो गयी है जब बाज़ार को मीडिया नियंत्रित करता था | लेकिन आज बाज़ार मीडिया को नियंत्रित करता है | बड़े- बड़े अखबार समूहों में अब मार्केटिंग एडीटर होने लगे हैं | अब एडीटर के साथ मार्केटिंग शब्द लगे इसका अर्थ क्या ? ये मार्केटिंग एडीटर अखबार के वास्तविक एडीटर पर बहुत भारी पड़ते हैं | क्योंकि इनका नाता ही ख़बरों के सरोकार से न होकर सीधे-सीधे बाजार से होता है | इनका एकमेव काम सरकार और कार्पोरेट सेक्टरों के बीच अपने मालिक के हित की लाबिंग करना होता है | अफ़सोस तो तब होता है जब चुनाव के दौरान एक हे पेज पर एक ही निर्वाचन क्षेत्र के चार-चार, पांच-पांच प्रत्याशी जीत रहे होते हैं | एक बाजारू औरत में भी इतनी नैतिकता होती है कि वह एक वक्त में एक की ही साथी होती है | लेकिन मीडिया का चरित्र उससे भी गया गुजरा होता है | ये एक ही वक्त में एक साथ चार-चार, पांच-पांच लोगों को निपटा देते हैं | क्या इसका कोई जबाब है
मीडिया के अलमबरदारों के पास ? खबरिया चैनलों में अक्सर पांच-दस लोगों को बुलाकर चर्चा कराने या "सीधी-बात" की नौटंकी होती है | लेकिन इसमें बुलाए मेहमानों से उनकी प्रतिक्रिया या राय जानने के बदले ऐसे कार्यक्रमों के होस्ट या एंकर केवल अपनी सोच, मुंहजोरी और ज्ञान ही बघारते हैं | मेहमानों की बिल्कुल सुनते ही नहीं, और न ही उन्हें अपनी बात ढंग से कहने का पूरा मौक़ा देते हैं | बस सवाल-दर-सवाल अपनी ही हांक कर ब्रेक लेते रहते हैं और एकांगी बहस करके केवल अपना नजरिया थोपते हुए सबका जबरन धन्यवाद अदा करके कार्यक्रम का क्रिया-क्रम कर देते हैं | ये पत्रकारिता का कौन सा रूप है? इसे खबरिया चैनलों की कथित महान विद्वत आत्माएं ही बता सकती हैं |
मुनीर अहमद मोमिन
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