भ्रष्टाचार शिरोमणि का ताज महाराष्ट्र के सर
भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सजग प्रहरी के रूप में जननायक बनकर उभरे गांधीवादी विचारधारा के पूर्वसैनिक किशन बाबूराव हजारे उर्फ़ अण्णा हजारे को स्वयं भ्रष्टाचार के मामले में २५ अप्रैल को पुणे की एक अदालत में पेश होना पड़ा | जज सुचित्रा एस.घोडके ने हजारे को उनके खिलाफ कथित भ्रष्टाचार के मामले की शिकायत पर अदालत में हाजिर होने के लिए नोटिस जारी किया था | हजारे के खिलाफ भ्रष्टाचार मामलें में वर्ष १९९८ में शिकायत की गई थी | शिकायत में बताया गया था कि अण्णा हजारे ने अपना ६१वां जन्म दिन मनाने के लिए अपने सार्वजनिक ट्रस्ट के दो लाख रूपये खर्च किये थे | उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा ४०६ और ४०९ के तहत मामला दर्ज किया गया था | इस बाबत अण्णा का कहना है कि यह मामला पिछले आठ वर्ष से चल रहा है और मुझे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है | मुझे अदालत में हाजिर होने के लिए कहा गया था | यह बताता चलूँ कि अण्णा के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक संगठन के अध्यक्ष हेमंत कोलेकर ने पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी, कि अण्णा ने १५ जून १९९८ को अपना जन्मदिन मनाने के लिए अपने 'हिंद स्वराज ट्रस्ट' में से दो लाख रूपये खर्च कर दिए |
इसी हफ्ते से उत्तर-प्रदेश से भ्रष्टाचार के विरोध में अभियान चलाने वाले अण्णा को वहाँ की मुख्यमंत्री बहन मायावती ने भी 'दलित नाद' करते हुए यह कह दिया है कि अण्णा पहले अपने गृह प्रदेश महाराष्ट्र का भ्रष्टाचार खत्म करें फिर उत्तरप्रदेश का रुख करें | इसी बीच राष्ट्रीय 'अपराध रिकार्ड ब्यूरो' के आंकड़ों ने भी महाराष्ट्र राज्य को भ्रष्टाचार शिरोमणि के रूप में दर्शा दिया है | भ्रष्टाचार पर देश भर में छिड़े बवाल की पृष्ठभूमि में यह बात जले पर नमक छिडकने जैसी हो सकती है | महाराष्ट्र राज्य जैसा अण्णा हजारे का गृह राज्य भ्रष्टाचार की सीढी के शीर्ष पायदान पर खड़ा है | लेकिन यहाँ दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों की संख्या के मुकाबले दोषियों को सजा दिए जाने का प्रतिशत बहुत ही कम है | राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े दर्शातें हैं कि वर्ष २००० से लेकर २००९ के बीच महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के कुल ४५६६ मामलें दर्ज किये गए, जिसमें केवल २७ फीसदी मामलों में ही आरोपियों पर दोष साबित हो पाए | इन मामलों में राज्य में नौ करोड़ रूपये की संपत्ति जब्त की गई | ब्यूरो के आंकड़ों पर नज़र डालें तो यह भी बात सामने आती है कि देश में वर्ष २००० से लेकर अब तक भ्रष्टाचार के मामलों में साल दर साल लगातार इजाफा ही होता जा रहा है | क्योकि वर्ष २००० में जहाँ देश में कुल २९४३ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किये गए | तो वहीं २००९ में ३६८३ मामले दर्ज किये गए | इन मामलों में ६० फीसदी दोष साबित हुआ और तकरीबन ६० करोड़ रूपये की संपत्ति जब्त की गई | वर्ष २००० से लेकर २००९ के दौरान महाराष्ट्र में ४५६६, राजस्थान में ३७७०, उड़ीसा में २९५७, पंजाब में २७१४ और आन्ध्र प्रदेश में २६८६ मामले दर्ज किये गए |
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जिन पांच राज्यों में भ्रष्टाचार के सर्वाधिक मामलें दर्ज किये गए उनमें से केवल आन्ध्र प्रदेश में अन्य राज्यों के मुकाबले दोषियों को सजा दिए जाने का प्रतिशत सर्वाधिक था | राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि झारखंड में भ्रष्टाचार के २२५ मामले दर्ज किये गए और भ्रष्टाचारियों को सींखचों के पीछे पहुंचाने का दर काफी शानदार है | आंकड़ों के मुताविक भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की दिशा में नागालैंड (दो मामले, दोष सिद्धि दर सौ फीसदी) लक्षदीप और बिहार में भी शानदार प्रदर्शन किया | लक्षदीप में जहाँ सौ फीसदी दोष सिद्धि दर रही तो वहीं बिहार में दोषियों को सजा देने का प्रतिशत ७८ फीसदी रहा | इसके अलावा त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, गोवा तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह जैसे कुछ ऐसे प्रदेश और केंद्र शासित प्रदेश रहे जहां भ्रष्टाचार संबंधी क्रमशः १५. २१ ,२५ , ३२ और २३ मामलें दर्ज किये गए | लेकिन इन सभी राज्यों में किसी भी मामलें में किसी भी आरोपी को दोषी साबित नहीं किया जा सका | इसी तरह वर्ष २००० में जहाँ भ्रष्टाचार के मामलों में दोषियों को सजा दिए जाने का प्रतिशत मात्र २० था , जो वर्ष २००९ में बढ़कर ६० फीसदी तक जा पहुंचा | इस दृष्टि से वर्ष २००१ सर्वाधिक निराशाजनक वर्ष रहा जब भ्रष्टाचार के देश में कुल २९९० मामले दर्ज किये गए | लेकिन केवल १७ फीसदी मामलों में ही आरोपियों को दोषी ठहराया जा सका |
मुनीर अहमद मोमिन
lagta he aapki koi dushmani he Anna se, ya aap congress ke agent hain!
ReplyDelete