भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद ने उडाई नींद !
पहले कपिल सिब्बल और सलमान खुर्शीद, फिर आडवानी उसके बाद 'दिग्गी राजा' के नाम से मशहूर कांग्रस के महासचिव दिग्विजय सिंह आदि नेताओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद से परेशान होकर धीरे-धीरे अपने खोल से बाहर आना शुरू कर दिया है | केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और सलमान खुर्शीद ने कहा कि लोकपाल विधेयक से कुछ नहीं बदलेगा | इस पर अण्णा ने कहा था कि यदि प्रस्तावित लोकपाल बिल सार्थक नहीं है तो कपिल सिब्बल कमेटी से इस्तीफा दे दें | फिर राकांपा के नेता तारिक अनवर ने भी अण्णा पर आँखें तरेरी | तदोपरांत लालकृष्ण आडवानी ने अण्णा की सोच को लोकतंत्र के खिलाफ बताते हुए कहा है कि जिस तरह नेताओं के खिलाफ मुहिम चलाई जा रही है | उससे संदेह का वातावरण निर्माण हो रहा है और लोकतंत्र अपमानित हो रहा है | सभी नेता भ्रष्ट नहीं हैं | यदि अण्णा ऐसा सोचते हैं तो उनकी सोच लोकतंत्र के विरूद्ध है | कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह का भी कुछ इसी तरह का कहना है | कि सभी नेता भ्रष्ट नहीं होते |
लेकिन भूतपूर्व सैनिक अण्णा हजारे ने भी आडवानी को आईना दिखाते हुए कह दिया है कि आडवानी का कहना गलत है | अगर आडवानी जैसे नेता सही रास्ते पर होते तो हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना बड़ा कदम उठाने की जरूरत नहीं पडती | दरअसल ये तमाम बातें पैदा ही नहीं होती, इसकी शुरूआत बाबा रामदेव और स्वामी अग्निवेश के चेला-चापड़ों से हुई | सर्व प्रथम रामकिसुन यादव उर्फ़ बाबा रामदेव ने किशन बाबूराव हजारे उर्फ़ अण्णा हजारे से ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल नामों पर परिवारवाद के नाम पर एतराज़ जताया | क्योंकि अण्णा की ओर से कमेटी में पूर्व क़ानून मंत्री शान्तिभूषण के सह-अध्यक्ष होने और उनके पुत्र प्रशांत भूषण को समिति का सदस्य बनाये जाने पर बाबा रामदेव को आपत्ति थी | जिस पर कटाक्ष करते हुए शांतिभूषण ने भी मीडिया में कहा कि वहां योग का नहीं कानूनी कसरत का काम है | फिर बाबा ने भी प्रत्युत्तर में उवाचा कि योग से ही दिमाग ठिकाने रहता है | इस तरह की बातें बंद कमरे या आमने-सामने भी हो सकती थीं | लेकिन ये सारे आरोप-प्रत्यारोप खबरिया चैनलों के जरिए हुई | इस दौरान अण्णा द्वारा नरेंद्र मोदी और नितीश कुमार की तारीफ़ भी लोगों को अनावश्यक महसूस कर गई |
फिर इसी दौरान दिल्ली के गलियारों में ये बात भी फैलने लगी कि कभी दिल्ली यातायात पुलिस में रहकर 'क्रेन बेदी' के नाम से मशहूर रह चुकीं भारतीय पुलिस सेवा की प्रथम महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी का आन्दोलन के समर्थन की एक अपनी राम कहानी है | किरण बेदी को वजाहत हबीबुल्लाह के इस्तीफे से खाली हुए मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर नियक्ति की माँग की गई थी | जिसको मानना तो दूर सरकार ने इसे ढंग से सुना भी नहीं | बुद्धिजीवी वर्ग का भी मानना है कि अण्णा के लोगों द्वारा जन लोकपाल विधेयक का जो प्रारूप पेश किया जा रहा है | वह न तो तर्क संगत है और न ही लोकतांत्रिक प्रणाली में उसकी स्वीकार्यता की कोई विशेष संभावना है | लेकिन यह तथ्य भी उतना ही पीडादायक है कि भारतीय संसद में लोकपाल विधेयक का 42 वर्षों तक लटके रहना | यह किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकता |
यहाँ यह बताना जरूरी है कि जिन देशों ने आधुनिक विकास का लक्ष्य हासिल किया है | वहां लोकपाल सदृश्य स्वतंत्र संस्थाओं के समयोचित गठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है | कहने का तात्पर्य यह है कि अण्णा के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को चारो तरफ से व्यूह रचना करके पलीता लगाने की कोशिश शुरू हो गई है | जिससे भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई का सारा दारोमदार अब आम जन के सूझ-बूझ और बुद्धि-विवेक पर निर्भर हो गया है | क्योंकि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सारे राजनेता मिलकर और मीडिया भी आज नहीं तो कल उनसे मिलने ही वाली है | इस मुहिम की हवा निकालने की जुगत नें लग गए हैं | इसलिए आज आम जन की यह जिम्मेदारी बनती है कि भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की धार कुंद न होने दें | और अपने समर्थन द्वारा दिन-रात इसके प्रज्ज्वलन शक्ति में इजाफा ही करते रहें |
मुनीर अहमद मोमिन
मुनीर जी आपका बिलॉग बहुत ही प्रेरणा दायक है! आप हमारे प्रेरणा स्रोत हैं! ऐसे ही निरंतर अपनी कलम की धार से जन कल्याणकारी लेख लिखते रहें! लगता है आपके हृदय की आवाज खुदा की आवाज है! अल्लाह आपको अपने नूर की रोशनी से सराबोर रखे! जय हिंद!
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