Tuesday, April 12, 2011

अण्णा के आंदोलन में युवाओं की निर्णायक भूमिका

           देश हित के लिए निहायत शुभ संकेत 
          जो कुछ भी हो भ्रष्टाचार के सन्दर्भ में जन लोकपाल बिल को लेकर किशन बाबूराव हजारे उर्फ़ अण्णा हजारे द्वारा किए गए जनांदोलन की सफलता ने दो बात तो उजागर कर ही दी है - एक नई उम्मीद और दूसरे नई जिम्मेदारी पैदा करने की | आज़ादी के बाद जो गलतियाँ हुईं, वह अब दोहराना नहीं चाहिए | क्योंकि आज़ादी के आन्दोलन के सफलता के बाद देशवासियों से दो बड़ी चूक हुई | पहला ये कि जो युवा शक्ति इस आन्दोलन को अपने कंधों पर उठाकर आज़ादी के मुंहाने तक लेकर आई, जो वास्तविक रूप से सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव और राजगुरू जैसे नौजवान शहीदों व क्रांतिकारियों की असली वारिस और महात्मा गांधी की ही शक्ति थी | लेकिन आज़ादी के बाद उसे वापस कालेज कैम्पस और घरों में घुसा दिया गया | उनसे कहा गया कि अब तम्हारा काम खत्म हो गया | अब तुम जाकर पढाई-लिखाई करो और अपने भविष्य के रोटी-रोजी के जुगाड़ में जुट जाओ |
         लेकिन जिन लोगों ने इस युवा-शक्ति को कालेज कैम्पस और घरों में घुसाया, उन्हीं लोगों ने इसका 'राजनैतिक इस्तेमाल' करते हुए इन युवाओं को अपना राजनैतिक अनुयायी बनाकर रख दिया | देश के हर राजनैतिक दल को युवा और छात्र संगठन नामक विस्फोटक हथियार चाहिए | युवा और छात्र संगठन के नाम पर इन युवाओं को गुंडों, दादाओं और छुटभैये नेताओं की जमात में तब्दील कर दिया गया | यह बहुत बड़ी गलती थी हमारे नेताओं और देश के कथित कर्णधारों की | जिन्होंने अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए युवाओं को बेरोजगारों की भीड़, हताश व निराश लोगों का जमावड़ा और गुंडों-अपराधियों की फौज में बदल दिया | जिससे हमारा राजनैतिक पतन तो हुआ ही, हमारा सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक चरित्र भी ढह गया | इस त्रासदी को आज़ादी के बाद की दो पीढियां भोग चुकीं हैं | अब तीसरी पीढी हमारे समक्ष तैयार बैठी है | देश के रीढ़ की हड्डी मानी जाने वाली युवा-शक्ति को सृजनात्मक दिशा नहीं दी गई |
         हालांकि यह बात बिलकुल सच है कि बच्चे और बूढ़े सृजन नहीं कर पाते, हमारे देश के बूढ़े नेताओं ने पूरे देश को केवल बच्चे पैदा करने और गरीब होने के लिए बाध्य कर दिया | ज्यादातर हमारे युवा व छात्र नाराज़ होने पर अपनी छोटी-मोटी मांगों के लिए लड़ते और संघर्ष करते रहे | लेकिन "राष्ट्र निर्माण या समाज निर्माण" के लिए वे 'परिवर्तनकारी शक्ति' नहीं बन सके | हमारे बूढ़े नेताओं के गलतियों के कारण ही हमारे युवा २५ साल की उम्र में ही बूढ़े से हो गए | यहाँ इस बात का ज़िक्र जरूरी है कि निहायत ईमानदार नेता की छवि वाले स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री ने ' इस बाबत सकारात्मक कदम उठाते हुए 'जय जवान-जय किसान' का नारा देकर इस देश की मुख्य शक्ति युवायों और किसानों को प्राथमिकता प्रदान करने की कोशिश जरूर की थी | लेकिन दुर्भाग्य वश न किसानों की जय हो पाई और न ही जवानों की | न तो स्व. शास्त्री जी के समकालीन नेताओं ने इस नारे को कोई ख़ास तवज्जो दी और न उन नेताओं के उत्तराधिकारियों ने | इस तरह यह नारा महज़ नारा और पाखंड तक ही सीमित हो गया |
         मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि अब देश की युवा शक्ति को न तो फिर से सीमाओं में बांधा जाए और न ही उन्हें असमय बूढा होने दिया जाए | बल्कि इस भ्रष्टाचार विरोधी और समाज विरोधी लड़ाई को एक जूझारू युवा और एक जां-बाज़ सिपाही की तरह लगातार लड़ने की प्रेरणा दी जाए | क्योंकि भ्रष्टाचार एक सतत प्रक्रिया है, और इस सतत प्रक्रिया को रोकने के लिए सतत संघर्ष की जरूरत होगी | हमें एक ऐसे सजग और जूझारू समाज का निर्माण करना है | जो भ्रष्टाचार पर कड़ी निगरानी रखे और जहां कहीं भी भ्रष्टाचार हो रहा हो, वहां उसके विनाश व विदाई हेतु तत्पर रहे |
                                                                                                  

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