Tuesday, April 5, 2011

अँखियाँ पूनम दर्शन को भूखीं !

     नंगी होने वाली एक नारी नहीं मानसिकता है 
         भारत के क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने पर अपने सारे कपड़े उतार देने वाली माडल पूनम पाण्डेय पर बलरामपुर पुलिस ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर केस दर्ज किया है | इस बयान के पीछे पूनम पाण्डेय का उद्देश्य किसी खुशी को व्यक्त करने का नहीं बल्कि वैसी ही सस्ती लोकप्रियता पाने का है | जैसी फिल्मों या अन्य माडलिंग के क्षेत्र में चर्चित होने के लिए अभिनेत्रियाँ और माडल्स टॉप लेस या बाटम लेस होने का घटिया तौर-तरीका अपनाती हैं | किसी महिला द्वारा खेल के खेल में नंगा होकर खेल करना यह विश्व के लिए कोई बड़ी घटना नहीं है | विदेश खासकर यूरोपीय देशों में नंगा होने का खेल या खेलने खाने वाली पराक्रमी महिलाओं का सार्वजनिक तौर पर नंगा होना कोई ख़ास मायने नहीं रखता | लेकिन हमारे देश में यह घटना अपचनीय है | 
         जहां एक ओर तमाम लोग इस घटना के लिए पूनम को कोस रहे हैं, कि उसे भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर चोट की है | वहीं उससे दुगुने तादाद में ऐसे भी लोग हैं, जो भीतर ही भीतर मन मसोसकर रह गये होंगे, कि वे पूनम के वस्त्रहीन काया के 'दर्शन लाभ' या 'नयन-सुख' से वंचित रह गये | मुंबई के समीप थाणे के लोकपुरम निवासी 'किंगफिशर कैलेण्डर-२०११' की माडल पूनम को जो करना था वो कर दिया या कह दिया और अज्ञातवास को चली गई | बहरकैफ मुद्दे की बात यह है कि बिकनी गर्ल या आयटम गर्ल के रूप में लोगों की विकृत सेक्स संतुष्टि हेतु अभिनेत्रियाँ शर्म नहीं करतीं | वैसे ही बाज़ार में अर्ध नग्न माडल के तस्वीरों के साथ उत्पाद बेंचे जाते हैं | पूनम पाण्डेय ने इसी विकृत को आगे बढाया है | लेकिन क्या यह भी विचार करने की बात नहीं है कि इस अपसंस्कृति को भारत में लाने कि जिम्मेदारी किसकी है ? क्या हमारे भ्रष्ट व दुष्ट बाजारवादी नई सोच की नहीं | जिसने भारत को इंडिया से भी आगे 'अर्ध यूरोपीय' बना दिया है | न तो यह 'नया इंडिया' भारत रहा है और न ही यूरोपीय - यह एक ऐसा मिक्चर हो गया है, जो हमारे सामने ही हमसे पूछ रहा है कि -'मैं कौन हूँ' ? और यह जो सवाल है, वह सिर्फ इसी एक अधकचरी संस्कृति से पैदा हुआ है | बल्कि इसमें हर क्षेत्र में व्याप्त हमारी वह सोच शामिल है, जो "आधा सीसी का सिरदर्द" बनकर देश को त्रस्त किए हुए है |
         अब बात ज़रा देश के विश्व कप जीतने की - टीम इंडिया ने एकजूट होकर वर्ल्ड कप जीता | आज ऐसी सामूहिक जिम्मेदारी का एहसास राजनीति में क्यों नहीं, जो देश का नेतृत्व करती हैं ? सरकारों में क्यों नहीं, जो दागी और घोटालेबाज मंत्रियों को संरक्षण देती हैं ? हम खेल में यदि अपने टीमों से 'सामूहिक जिम्मेदारी' की अपेक्षा रखते हैं, तो सरकार व राजनैतिक दलों द्वारा क्यों यह अपेक्षा भंग की जाती है ? क्या ये ज्वलंत सवाल देश के सामने नहीं है ? टीम इंडिया के हर क्रिकेटर पर 'करोड़ों' के ईनाम की वर्षा की गई | निश्चय ही हमारे क्रिकेटर्स ने हमें गौरव दिलाया है | लेकिन उन पर करोड़ों लुटाते समय या क्रिकेट को हज़ारों करोड़ रूपए के धंधे में बदलते हुए, करीब एक लाख करोड़ रूपये के सट्टेबाजी की अंधेरी खाई में धकेलते समय क्या हमें याद आता है कि, हमारे देश में २० करोड़ से अधिक लोग रोज़ रात को भूखे सोते हैं | ४४ करोड़ लोगों के पास साल में १०० दिन भी रोज़गार नहीं है | १५ करोड़ परिवारों के पास या तो रहने के लिए घर नहीं है, या फिर घर हैं, तो उन्हें घर कहने में भी शर्म आती है | हम सबने अपने ही देश व समाज को आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक वर्ग विभाजन कर इसे भ्रष्टाचार के दुश्चरित्र में उलझाकर आज इस रूप में ला दिया है, जहां इसकी पहचान तक में मुश्किल हो रही है | ऐसे में सारा देश विचार पूर्वक अपने रूप व अपनी आत्मा को खोजे, ताकि पता तो चले कि हम १२१ करोड़ लोग आज की तारीख में कौन व क्या हैं ?  
                                                                                         मुनीर अहमद मोमिन                 

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