Wednesday, April 6, 2011

चोर-चोर मौसेरे भाई, कोई किसी से कम नहीं

नेता और भ्रष्टाचार एक दूसरे के पर्याय से बन गये हैं  

         आजकल भारत में राजनैतिक पार्टियां और भ्रष्टाचार एक दूसरे के पर्याय होते जा रहे हैं,  बल्कि हो से गये  हैं | भ्रष्टाचार से लगभग सभी दलों का चोली दामन का साथ हो गया है | आज-कल ईमानदारी का ढिढोरा वही पीट रहा है, जिसे लूटने का मौक़ा न मिला हो या अपनी लूट छिपाना चाहता हो | यहाँ तक कि अब भ्रष्टाचार का मामला राजनीतिक इस उद्देश्य से एक दूसरे पर जोर-शोर से उठाने लगी हैं कि सामने वाली पार्टी पर उंगली उठाने से उनका अपना गिरेबान बचा रहेगा | कुछ इसी तरह का 'गेम प्लान' पिछले एक साल से कांग्रेस और बीजेपी के बीच भी चल रहा है | सोने पर सुहागा यह कि इसी दौरान विकिलीक्स नामक जिन्न भी भारत सहित विश्व भर के अलमबरदारों की खटिया खडी करने पर तुला हुआ है | 
         यह कहना गलत होगा कि विकिलीक्स के सभी खुलासे गलत हैं | लेकिन भारत के मामले में अब तक जो भी बातें सामने आयी हैं, वे सही होते हुए भी ज्यादा मायने नहीं रखती | पिछली लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर सांसदों की खरीद-फरोख्त को ही लें, तो इसमें कोई नई बात नहीं है | आरोप प्रमाणित नही हुआ था | और मान लीजिये कि आरोप प्रमाणित हो जाता तो क्या होता ? आज से छः साल पहले भी ऐसा ही एक मामला प्रमाणित हुआ था | संसद में सवाल पूछने के बदले धन लेने के आरोप में ११ सांसदों को संसद से निष्कासित कर दिया गया था | लेकिन तब इसी बीजेपी ने इस सजा को कुछ ज्यादा बताया था | क्योंकि रिश्वतखोर ११ सांसदों में से अकेले छः सांसद उसी के थे | अब सवाल यह पैदा होता है कि उन ११ सांसदों में से कितनों को हमने राजनीति से निष्कासित किया है | इतना ही नही पी.वी. नरसिंह राव के जमाने में भी शिबू सोरेन वाले  झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों भी वोट के बदले नोट लेते पकडाए गये थे | लेकिन तब सांसद ने उन्हें तकनीकी आधार पर माफ़ कर दिया था | काबिले गौर बात तो यह है कि तब मौक़ा मिलते ही बीजेपी ने झारखंड मुक्ति मोर्चा को अपना लिया था |
         आज भले ही विकिलीक्स के रूप में हमारे राजनीतिज्ञों को एक नया हथियार मिल गया हो | लेकिन अब भ्रष्टाचार राजनीति का एक परम आवश्यक दुर्गुण मान लिया गया है | अभी एक अखबार में वोट के बदले नोट दिए जाने की खबर छपी थी , कि तमिलनाड़ू के आगामी चुनावों के मद्देनजर राजनैतिक दलों के क्रिया-कलापों पर नज़र रखी जा रही है और ऐसी ही एक कार्रवाई के दौरान एक राजनैतिक दल से जुड़े जगह से हजारों धोतियाँ और लुंगियां बरामद भी की गई | जो मतदाताओं को बांटने के लिए रखी गईं थी | अब यह खबरें लगभग बेमानी सी हो गई हैं | क्योंकि हर चुनाव से पहले कहीं कपड़े, कहीं टीवी, कहीं नोट और मतदान से एक दिन पहले तो शराब की बोतलें बांटना आम सा हो गया है | भारतीय जनमानस बहुत ही  भुलक्कड स्वभाव का है | ऐसी खबरे हम पढ़ते हैं और भूल जाते हैं | लेकिन मनोविज्ञान के सूत्र के अनुसार इस भूल जाने का एक मतलब यह है, कि हमने इसे स्वाभाविक मान लिया है | लेकिन क्या यह गलत नही है ? क्या हमारी इस आदत से जनतंत्र भ्रष्ट नही होता ? अगर हाँ, तो धोतियों और लुंगियों की बंटने वाली खबर हमारी संसद में बहस का मुद्दा क्यों नही बन पायी | जबकि आम मतदाता से वोट खरीदने और सांसदों को पैसे देकर विशवास मत जीतने वाली बात एक जैसी ही है | हाँ, अंतर है तो बस केवल इतना कि आम मतदाता से ५० -१०० या हजार रूपये देकर वोट खरीदे जाते हैं | जबकि हमारा सांसद अपनी कीमत करोड़ों रूपये वसूलता है | 
         एक सवाल यह भी है कि क्या खरीददारी केवल नोटों से ही होती है ? मंत्रिमंडल में शामिल करने की शर्त पर समर्थन लेना क्या खरीद-फरोख्त की श्रेणी में नही आता ?  कार्पोरेशनों में लाभ के पद या व्यवसायिक ठेके देकर क्या समर्थन की कीमत नही चुकाई जाती ? इतना ही नही, क्या धर्म, जाति, वर्ग आदि के नाम पर वोट मांगना वोट खरीदने से अलग और उससे अच्छा है ? सच्चाई तो यह है कि हमने अघोषित रूप से भ्रष्टाचार को राजनीति का एक स्वीकार्य अंग मान लिया है | हमारे राजनेता अपनी सुविधा व स्वार्थों के अनुसार दूसरे की कमीज को ही मैली बताने की होड़ में जुटे रहते हैं | जबकि जरूरत है कि औरों से ज्यादा अपने दामन का दाग मिटाने की | यह बात हमारे राजनेताओं के समझ का हिस्सा कब बनेगी ?
                                                                         मुनीर अहमद मोमिन            

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