Thursday, May 26, 2011

देश का तकरीबन 73 लाख करोड़ कालाधन बाहर ?

         दो साल में 30 हज़ार करोड़ रूपए की वसूली !

         आयकर विभाग द्वारा पिछले दो सालों में की गई छापेमारी में ३० हजार करोड़ रूपए की की गई काले धन की वसूली निश्चय ही एक बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए | सेंट्रल बोर्ड आफ डाइरेक्टर टैक्सेस (CBDT) के अध्यक्ष सुधीर चन्द्रा का यह दावा सरकारी अंधेरगर्दी में कहीं तो यह एहसास दिलाता है कि कुछ काम भ़ी हो रहा है | चंद्रा के अनुसार हर छापेमारी में करीब सौ करोड़ रूपए का काला धन मिला | स्पष्ट है कि देश में इससे बहुत ज्यादा काला धन है | जैसे घोड़ा व्यवसायी व टैक्स चोर ब्लैक मनी मेकर हसन अली से वसूली आखिर कहीं न कहीं तो भारत में ही उसके सोर्सेज़ रहे होंगे | जिनसे समय पर उनके द्वारा एकत्र काली संपत्ति व काले धन की कुछ मात्रा में ही सही वसूली होती है | ऐसे सैकड़ों मामले हो सकते हैं | क्योंकि स्विस व विदेशी देशों में ७२ लाख ८० हजार करोड़ रूपए भारतीयों के जमा बताए गए हैं | हर साल जीडीपी या सकल घरेलू आय की ५% रकम हवाला या अन्य माध्यम से विदेशों में जाती है | जो फिर नहीं लौटती | यानि २० वर्षों में एक पूरे साल की जीडीपी विदेशों में चली जाती है | 
         वर्तमान जीडीपी के अनुसार यह लगभग ढ़ाई लाख करोड़ रूपयों से अधिक है | और यहाँ तक है कि जब पिछले तीन सालों में अमीर उद्योगपतियों को चार लाख करोड़ रूपए अधिक की टैक्स छूट दी गई | ऐसे अमीरों द्वारा बैंक के भ़ी ५० हज़ार करोड़ रूपए से अधिक डूबोए गए हैं | हर साल ५० हजार करोड़ रूपए से ८० हजार करोड़ रूपयों की ब्लैक मनी बनती है | यह एक पुराना अनुमान है | जो अब तक दुगुनी हो चुकी है | देशभर में कितनी ब्लैकमनी है यह बता पाना मुश्किल है | इसी अनुमान के आधार पर २० देशों में १० लाख करोड़ रूपए तक की न्यूनतम ब्लैक मनी पैदा हुई है | बताया गया है कि २१ लाख करोड़ रूपए जो विदेशी देशों में जमा हुए हैं | वे आर्थिक सुधारों के बाद के हैं | मनी बचाना न सिर्फ राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था से गद्दारी व क़ानून की नज़र में अपराध है, बल्कि यह मानवीय दृष्टी से भ़ी भयानक क्रूरता है | क्योंकि इससे करोड़ों लोग गरीब, बेकार, अशिक्षित व अकालग्रस्त होते हैं | सुविधाओं का अभाव होता है | विकास योजनाएं रूकती है और भ्रष्टाचार पनपता है | ब्लैक मनी एक न एक साथ कई तरह की भार करती है | जैसे बच्चों का दूध, शिक्षा व दवा का भ़ी हक़ छीन लेती है | हमारे देश में यह वर्ग विभाजन करती है | इसी के कारण राजनैतिक रूप से भारी भ्रष्टाचार पैदा होता है | 
         चुनाव में काले धन का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है | अतः चुनाव ही भ्रष्टाचार की गंगोत्री बन जाता है | चुनाव में हुआ खर्च उम्मीदवारों के लिए इन्वेस्टमेंट की तरह होता है | जिसे वे जीत के बाद कई गुनी रकम व सम्पत्ति के रूप में वसूलते हैं | राजनीति काली कमाई का शार्टकट है | यही कारण है कि राजनीति सेवा नहीं मेवा या बिना काम किए अमीरी का माध्यम बन गया है | अब राजनीति भ़ी कैरियर बनती जा रही है | आज़ादी के बाद के २५ वर्षों में वे लोग जो आज़ादी, देशभक्ति और देश सेवा से प्रेरित होते थे | वह पीढ़ी ही जैसे चली गई | त्याग व समर्पण का अभाव हो गया है | वर्ष १९९०-९१ में जब डा. मनमोहन सिंह वित्तमंत्री बने और ग्लोबलाईजेशन के लिए सरकार ने रेड कारपेट बिछाए तो फिर पैसा कैरियर और व्यक्तिगत महत्वकांक्षाएँ ही प्रमुख हो गईं और काले धन के निर्माण में तेज़ी आई | यह तथ्य है कि जारी वर्ष में देश में नौ लाख करोड़ रूपयों से भ़ी अधिक का राजस्व करों के रूप में वसूला जा चुका है | अगले दो सालों में हमारा वार्षिक केन्द्रीय बचत १५ लाख करोड़ रूपए हो सकता है | मगर ब्लैक मनी का मुद्दा संतोष जनक ढ़ंग से हल होता दिखाई नहीं देता | ब्लैक मनी की चुनौती से निपटे बिना हमारी आर्थिक व्यवस्था व हमारा विकास अपंग ही रहेगा |
                                                                मुनीर अहमद मोमिन       

Wednesday, May 25, 2011

भारत में भ़ी कौमार्य की खरीद-फरोख्त चालू

  यह संक्रामक रोग देश के लिए कत्तई शुभ संकेत नहीं

         अभी जुमा-जुमा आठ दिन पहले ही तमिलनाडू में जे. जयललिता औए पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के चुन के आने बाद मीडिया से लेकर देश का  तमाम कथित बुद्धिजीवी वर्ग खूब बम-बम था कि देश में पहली बार एक साथ चार-चार मुख्यमंत्री महिला हुई हैं | इसे नारी शक्ति, महिला क्रान्ति, नारी जागरण, उत्थान, चेतना और बदलाव आदि-इत्यादि बताकर इस विषय पर विश्लेष्ण/चर्चा यत्र-तत्र-सर्वत्र चालू था | यह सच है कि आज देश में चार-चार मुख्यमंत्री महिला हैं | इससे पूर्व भ़ी राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया और मध्य-प्रदेश में उमा भारती नामक महिला मुख्यमंत्री रह चुकीं है | पूर्व में तो लम्बे अरसे तक एक महिला ही देश की प्रधानमंत्री रहीं है | केंद्र में भ़ी किसी की भ़ी सरकार रही हो हमेशा दर्जन भर महिलाएं मंत्री रहीं हैं | मौजूदा समय में तो देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद राष्ट्रपति से लेकर लोकसभा अध्यक्ष तक महिला हैं | यूपीए की चेयर परसन से लेकर राष्ट्रीय स्तर की अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष से और पीडीएफ जैसी क्षेत्रीय पार्टी की प्रांताध्यक्ष तक महिला है | लेकिन उससे बड़ा सच यह है कि इस दौरान महिला उत्पीडन और अत्याचार, बलात्कार व व्यभिचार का ग्राफ भ़ी तेज़ी से बढ़ा है और दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है | इससे साबित होता है कि महिलाओं को राजनैतिक अथवा संवैधानिक पदों पर महज़ बैठने या बिठा देने भर से महिलाओं की स्थितियों में सुधारात्मक परिवर्तन मुमकिन नहीं है | कम से कम बेंगलूर से आ रही खबरों के मुताबिक़ तो देश में अब कौमार्य की खरीद-फरोख्त चालू हो गई हो और यह महामारी पूरे देश में तेज़ी से पाँव फैलाती जा रही है | हो सकता है कि इस तरह का कारोबार देश के अन्य हिस्सों में भ़ी धडल्ले से चल रहा हो जो अभी प्रकाश में आने से वंचित हो |          
         देश के आई टी हब के तौर पर मशहूर बेंगलूर का एक घिनौना चेहरा सामने आया है | यहाँ पैसे की कमी के चलते बेटियों की शादी कर पाने में मजबूर माँ-बाप कुंआरी लडकियों को महज़ लाख-डेढ़ लाख में बेच देते हैं | शहर में कुआंरी लडकियों की तलाश तेज़ हो गई है | लेकिन यह दुल्हन बनने के लिए नहीं बल्कि कुछ घंटों की मौज-मस्ती के लिए | इस मामले में अभी तक पुलिस में कोई केस तो दर्ज़ नहीं हुआ है, लेकिन सेक्स वर्करों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी  संगठनों ने शहर में तेज़ी से फ़ैल रही इस बीमारी की ओर आगाह किया है | कुंआरी लडकियों पर कुछ घंटों के लिए लाख-डेढ़ लाख रूपए खर्च करना यहाँ के रईस लोगों के लिए कोई मायने नहीं रखता | कौमार्य बेचने का चलन पश्चिमी देशों में एक तरह से आम है | लेकिन दलाल इसे बेंगलूर में भ़ी लोकप्रिय बनाने में जूटे हैं | इस धंधे में लगे दलालों की भ़ी कोई कमी नहीं है | यह ऐसे माँ-बाप की तलाश में रहते हैं | जिनकी बेटी शादी करने के लायक हुई है | और आर्थिक तंगी के चलते इसमें रूकावट आ रही है | ये दलाल ग्राहकों से इन माँ-बाप को मिलवाते हैं और सौदा तय हो जाता है | 
         मैजेस्टिक एरिया में काम करने वाले एक एनजीओ से जुड़े लोगों के मुताबिक़ शहर में कई ऐसी लडकियाँ हैं | जो अपनी माँ-बाप की परेशानी कम करने के लिए बिल्डरों, राजनेताओं या धन्ना सेठों के साथ चंद घंटों के लिए सोने को तैयार हैं | ऐसे में माँ-बाप जिनके पास दहेज़ देने या शादी के खर्च के लिए पैसे नहीं हैं | वे भ़ी अपनी कुआंरी लडकियों को रईसों के साथ सोने के लिए राजी करते हैं | ऐसा केवल बेंगलूर में ही नहीं बल्कि आस-पास के ग्रामीण इलाकों में भ़ी हो रहा है | शहर से सटे ग्रामीण इलाके में हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया था | यह माँ-बाप अपनी बेटी की शादी के लिए लाख सुपे जुटा नहीं पा रहे थे | ऐसे में एक दलाल ने लडकी की माँ से संपर्क किया और पैसे जुटाने का उपाय बताया | औरत ने डेढ़ लाख रूपए के लिए अपनी कुआंरी बेटी को हसन नाम के एक शख्स के साथ सोने की इजाजत दे दी | इस मामले में सबसे पहले लडकी का कौमार्य परीक्षण हुआ | फिर तय तारीख पर उस लडकी को उसकी माँ के साथ बेंगलूर से सटे एक रिसोर्ट में लाया गया | जब ग्राहक लडकी के साथ रिसोर्ट के कमरे में गया तो उसकी माँ बाहर बैठकर उसका इंतज़ार कर रही थी | घंटे भर बाद उस शख्स ने लडकी और उसकी माँ को घर भिजवाने का भ़ी प्रबंध किया | 'अस्तित्व'  नामक एनजीओ चलाने वाली एक महिला वकील का कहना है कि अधिकतर मामले में शादी का खर्च जुटाने के लिए माँ-बाप ही खासकर माताएं लडकियों को ऐसा करने के लिए बढ़ावा देती हैं | यह एक गंभीर संक्रामक रोग की तरह है, जो धीर-धीरे पूरे देश में अपना पाँव फैलाते जा रहा है |
                                                            मुनीर अहमद मोमिन
        

Tuesday, May 24, 2011

सड़कछाप मजनुओं के लिए सरकारी ससुराल का इंतजाम

      अब लड़कियों का पीछा करने वालों की खैर नहीं !

         लगता है अब देश के सडक छाप मजनूओं और इनके जुड़वे भाइयों रोड रोमियों मंडली के दिन लदने को आ रहे हैं | क्योंकि यदि राष्ट्रीय महिला आयोग की चली तो देश में लडकियों का पीछा करना अब पंजीकृत अपराध की श्रेणी में आ जाएगा | इसके लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) में पृथक धारा जोड़कर सात साल तक की सजा के प्रावधान की बात कही गई है | फिलहाल लडकियों का पीछा कर उन्हें परेशान करने वालों के खिलाफ स्पष्ट क़ानून के अभाव में अपराधी बच निकलते हैं | स्कूल, कालेजों व कार्यालयों में आने-जाने वाली लडकियों और महिलाओं की सुरक्षा की लिहाज से प्रस्ताव को एक कारगर रक्षात्मक कानूनी हथियार माना जा रहा है | महिला आयोग ने प्रस्तावित यौन-उत्पीडन विधेयक में संशोधन कर नया विधेयक हाल में सरकार के पास भेजा है | 
         आयोग ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए केंद्र के पास यौन-उत्पीडन विधेयक पहले ही भेज रखा है | विधेयक को धारदार बनाने के लिए इसमें संशोधन कर फिर नया विधेयक गृह मंत्रालय को भेजा है | इसमें आई. पी. सी. की धारा 509 (बी) के तहत महिलाओं पर हमला अथवा उन्हें शारीरिक या मानसिक क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से उनका पीछा करने वालों के लिए सात वर्ष तक का कारावास या जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान प्रस्तावित है | हाल ही में दिल्ली विश्व विद्यालय की एक छात्रा का पीछा कर एक युवक ने गोली मारकर उसकी हत्या कर दी थी | इसके बाद महिला आयोग ने दिल्ली के विभिन्न कालेजों में जन सुनवाई की थी | तब उसे लडकियों का पीछा कर उन्हें नुकसान पहुँचाने या ऐसी चेष्टा करने वालों के खिलाफ ठोस कानूनी कारवाई की जरूरत महसूस हुई | इसके मद्देनजर प्रस्तावित विधेयक में संशोधन कर गृह मंत्रालय भिजवाया गया | इस बात महिला आयोग का स्पष्ट कथन है कि हाँ, हम महिलाओं की सुरक्षा को आश्वत करना चाहते हैं | इके लिए वास्तविक यौन-उत्पीडन विधेयक में संशोधित विधेयक के आने से लडकियों और महिलाओं का पीछा करने वालों पर अंकुश लग सकेगा |     
         उल्लेखनीय बात यह है कि इसके पहले से ही प्रस्तावित महिला यौन-उत्पीडन बिल में काम-काजी महिलाओं के सन्दर्भ में प्रस्तावित इस नए क़ानून के तहत किसी भी पुरूष साथी द्वारा कार्य स्थल पर अपनी महिला साथी के साथ अप्रिय यौन आचरण, अश्लील मौखिक टिप्पणी, शारीरिक संपर्क, द्वीअर्थी बातें, छेड़-छाड़, सूक्ष्म यौन इशारे, अश्लील मजाक, चुटकुले, महिला को अश्लील साहित्य दिखाना (शाब्दिक, इलेक्ट्रानिक अथवा मुद्रित), यौन एहसान की मांग या अनुरोध, अन्य  कोई अप्रिय शारीरिक, मौखिक या गैर मौखिक क्रिया | ये सब इस नए महिला यौन उत्पीड़न के तहत आते हैं |
                                                           मुनीर अहमद मोमिन 

Monday, May 23, 2011

देखो दिल ना किसी का टूटे !

        दिल टूटने से असीमित पीड़ा : एक वैज्ञानिक शोध 
         
         प्यार वो खूबसूरत एहसास है जिसे इन्सान महसूस करना चाहे या न चाहे लेकिन हर किसी की जिन्दगी में एक दौर ऐसा आता है | जब उसे अजीब सी फिलिंग होने लगती है | लेकिन अक्सर वास्तविक जीवन में कई प्रेमी सिर्फ प्रेमी ही रह जाते हैं | वे अपने अहसास अथवा को रिश्ते में नहीं बदल पाते | मतलब शादी के बंधन में नहीं बांध पाते | कितने तो दिल टूटने के चलते बुरी तरह तबाह व बर्बाद हो जाते हैं | इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि अपने प्रेम को कांच की नाज़ुक चीज की तरह सहेज कर रखिये | क्योंकि अगर यह टूट गया तो बेहिसाब पीड़ा होती है | 
         अमेरिकी वैज्ञानिकों  का दावा है कि दिल टूटने पर चोट लगने के समान ही पीड़ा होती है | लास एंजिलिस स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, शारीरिक दर्द और सामाजिक वहिष्कार के बीच एक अनुवांशिक सम्बन्ध है | अपने अध्ययन में मानव शरीर में दर्द निवारकों को नियंत्रित करने वाले एक गुणसूत्र के स्तर को मापने वाले वैज्ञानिकों ने पाया कि मानव शरीर मानसिक तनाव के साथ ठीक उसी तरह निपटता है, जैसे वह शारीरिक दर्द के प्रति करता है | इसके लिए वह एक प्राकृतिक दर्द निवारक का स्राव करता है |
         वैज्ञानिकों का मानना है कि उनके नतीजों से ज़ाहिर होता है कि दोनों ही स्थितियों में लोगों के अनुभव एक समान होता है | अध्ययन के मुताबिक़ विकास के क्रम में सामाजिक जुड़ाव की व्यवस्था ने सामाजिक सम्बन्धों को बनाए रखने के लिए दर्द की व्यवस्था वास्तव में अपना ली होगी | प्रोफेसर नाओमी ईज़नबर्ज़र के मुताबिक़ शारीरिक दर्द के लिए प्रतिक्रिया करने के लिए ज़िम्मेदार मस्तिष्क का वही हिस्सा सक्रिय होता है जो सामाजिक वहिष्कार के समय सक्रिय होता है | इससे ज़ाहिर होता है कि हमारे मस्तिष्क को भावनाएं वास्तव में चोट पहुंचा सकती हैं |
         अध्ययन के तहत वैज्ञानिकों ने १२२ प्रतिभागियों के लार के नमूनों को एकत्र किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसमें ओपीआरएम नामक दर्द ज़ाहिर करने वाले गुणसूत्र की कौन सी किस्म मौजूद है | और वे विभिन्न परिस्थितियों में किस प्रकार की प्रतिक्रिया करते हैं | ऐसा पहली बार सम्भव हुआ है, जब यह साबित किया जा सका है कि शारीरिक दर्द में शामिल होने वाले गुणसूत्र सामाजिक वहिष्कार और प्रेम सम्बन्ध टूटने जैसी  मानसिक तौर पर दर्द देने वाली परिस्थितियों से जुड़े हैं | 
                                                                                                                मुनीर अहमद मोमिन                  

Saturday, May 21, 2011

........प्रलय न आनी थी और न आई !

       प्रलय बाबत धर्मग्रन्थों के नज़रिए पर एक नज़र
         आज के दिन दुनिया सलामत है | कैंपिंग की भविष्यवाणी गलत साबित हुई | सही साबित हुआ तो केवल आम लोगों का विश्वास और वैज्ञानिकों का तर्क | बता दें कि इसाई धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबिल के हवाले से दावा किया गया है कि २१ मई २०११ को दुनिया खत्म होने की शुरुआत हो जायेगी | यह घोषणा कैलीफोर्निया के धार्मिक प्रसारणकर्ता फैमिली रेडियो के अध्यक्ष हेरोल्ड कैंपिंग ने बाइबिल की तारीखों की गणना के बाद कहा था कि २१ मई २०११ को दुनिया के खत्म होने की शुरुआत हो जायेगी और २१ अक्टूबर २०११ तक दुनिया पूरी तरह से खत्म हो जायेगी | इस विनाश की शुरुआत न्यूजीलैंड से होनी थी | ८९ साल के कैंपिंग ने १९९४ में भी ऐसी भविष्यवाणी की थी | तब भी कुछ नहीं हुआ था और उन्होंने कहा था कि गणना में गडबडी हो गई | अमेरिका में ८६ साल पहले १९२५ में भी ऐसी ही भविष्यवाणी की गई थी | सेवंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च के अनुयायी राबर्ट रेट ने छह फरवरी १९२५ को दुनिया के खत्म होने की भविष्यवाणी की थी | टाइम मैगजीन ने उस तारीख के दो दिन पहले ही बताया था कि रेट ने अपनी संपत्ति बेच दी थी |. वह तारीख आई और चली गई | अलग-अलग समय पर ऐसी भविष्यवाणियां की गईं | वैसे सुनामी, भूकंप, बाढ़ जैसी त्रासदियाँ आती रहती हैं | लेकिन इनका ऐसी भविषवाणी से कोई मतलब नहीं है | हालांकि दुनिया के खत्म होने की भविष्यवाणी को लेकर लोगों के मन में काफी उत्सुकता रही |
         प्रलय शब्द का जिक्र लगभग हर धर्मग्रन्थों में मिलता है | इस्लाम धर्म में भी कयामत के दिन का जिक्र है | पवित्र कुरआन में लिखा है कि कयामत का दिन कौन सा होगा इसकी जानकारी सिर्फ अल्लाह को है | इसमें भी जलप्रलय का ही उल्लेख है | एक नबी नूह अलैहिस्सलाम को अल्लाह का आदेश मिलता है कि जलप्रलय होने वाला है | एक नौका तैयार करके सभी कौम  के दो-दो मर्द औरतों को लेकर उसमें बैठ जाओ | इसी तरह बाइबिल में भी प्रलय का उल्लेख है | जब ईश्वर नोहा से कहते हैं कि महाप्रलय आने वाला है तुम एक बड़ी नौका तैयार करो, जिसमें अपने परिवार और सभी जाति के दो-दो जीवों को लेकर बैठ जाओ | क्योंकि सारी धरती जलमग्न होने वाली है | इसी तरह चीन के धार्मिक ग्रन्थ आईचिंग व द नेशनल फिल्म ऑफ़ कनाडा ने भी प्रलय संबंधी मतों को बल दिया है | लेकिन विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता के प्रतीक ५१२३ वर्ष पुराने टांकरी कलेंडर ने इस बात को पूरी तरह से नकार दिया है | पुराणों के मुताबिक़ काल को चार युगों में बांटा गया है | हिन्दू मान्यताओं के अनुसार जब चार युग पूरे होते हैं तो प्रलय होती है | इस समय ब्रह्मा सो जाते हैं और जब जागते हैं तो संसार का पुनः निर्माण करते हैं और एक नये युग का आरंभ होता है | महाभारत में भी कलियुग के अंत में प्रलय होने का जिक्र है | लेकिन यह किसी जल प्रलय से नहीं बल्कि धरती पर लगातार बढ़ रही गर्मी से होगा | महाभारत के वनपर्व में उल्लेखित है कि सूर्य का तेज इतना बढ़ जाएगा कि सातों समुद्र और नदियाँ सूख जायेंगी | संवर्तक नाम की अग्नि धरती को पाताल तक भस्म कर देगी | वर्षा पूरी तरह से बंद हो जायेगी | सब कुछ जल जाएगा | इसके बाद फिर १२ वर्षों तक लगातार बारिश होगी जिससे सारी धरती जलमग्न हो जायेगी | 
         नास्त्रेदेमस ने प्रलय के बारे में बहुत स्पष्ट लिखा है कि मैं देख रहा हूँ कि एक आग का गोला पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है, जो धरती से मानव के काल का कारण बनेगा | एक अन्य जगह  नास्त्रेदेमस लिखतें हैं कि एक आग का गोला समुद्र में गिरेगा और पुरानी सभ्यता के समस्त देश तबाह हो जायेंगे | केवल धर्मग्रन्थों में ही नहीं बल्कि कई देशों में वैज्ञानिकों ने भी प्रलय की अवधारणा को सही माना है | कुछ महीनों पहले अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों  ने घोषणा की है कि १३ अप्रैल २०३६ को पृथ्वी पर प्रलय हो सकता है | खगोलविदों के अनुसार अन्तरिक्ष में घूमने वाला एक ग्रह एपोफिस ३७०१४.९१ किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से पृथ्वी से टकरा सकता है | इस प्रलयकारी भिडंत से हजारों लोगों की जान भी जा सकती है | हालांकि नासा के वैज्ञानिकों का कहना है कि इसे लेकर घबराने की जरूरत नहीं है | इसी तरह माया कैलेंडर  भी कुछ इसी तरह की भविष्यवाणी कर रहा है | साउथ ईस्ट मैक्सिको के माया कैलेंडर में २१ दिसंबर २०१२ के बाद की तिथि का वर्णन नहीं है | कैलेंडर उसके बाद पृथ्वी का अंत बता रहा है | माया कैलेंडर के मुताबिक़ २१ दिसंबर २०१२ में एक ग्रह पृथ्वी से टकराएगा, जिससे सारी धरती खत्म हो जायेगी | करीब २५० से ९०० इसा पूर्व माया नामक एक प्राचीन सभ्यता स्थापित थी | ग्वाटेमाला, मैक्सिको, होंडुरास तथा यूकाटन प्रायद्वीप  में इस सभ्यता के अवशेष भी खोजकर्ताओं को मिले हैं | 
                                                                                           मुनीर अहमद मोमिन         

Friday, May 20, 2011

जनसंख्या के अनुपात में क्यों नहीं बढ़ रही है साक्षरता ?

पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या में हो रही है कमी 
देश में हुए 2011 की जन गणना के मुताबिक़ भारत देश की जन संख्या अब एक अरब 21 करोंड हो गई है | लेकिन चिंता की बात यह है कि आबादी बढ़ने के साथ-साथ हमारे देश की साक्षरता का अनुपात उतना नहीं बढ़ा है | दरअसल शिक्षा और लोगों की साक्षरता ही देश का विकास तथा उसकी प्रगति का रास्ता खोलती है | जब हम भारत की बात करते हैं तो विश्व में जनसंख्या की दृष्टी से भारत दूसरे स्थान पर आता है | हमारे देश के कथित बुद्धिजीवियों व जानकारों का मत है कि हमारी बढ़ती जनसंख्या ही हमारे विकास के रास्ते में सबसे बड़ा पत्थर है | लेकिन इस अवधारणा को गलत साबित करते हुए विश्व में सबसे घनी आबादी वाला देश चीन आज पूरी दुनिया से अकेले लोहा लेने के लिए तैयार है | उसके सामने तो जनसंख्या कोई पत्थर नहीं बन पा रही है | इसका मतलब यह है कि चीन लगभग 100 फीसदी साक्षर हो चुका है | हमारा देश साक्षरता की दौड़ में अभी भी पिछड़ा हुआ है | 
         जनसंख्या के आंकड़ों पर ध्यान दें तो 2001 के जनगणना के अनुसार देश में साक्षरता का प्रतिशत 64.83 था | 2011 की जनगणना में यह बढ़कर 74.09 फीसदी हो गया है | यानि 10 वर्षों में कुल वृद्धि 9.2 फीसदी हुई | अर्थात एक वर्ष में साक्षरता एक फीसदी भी नहीं बढ़ रही है | यदि देश में पुरूषों एवं महिलाओं में साक्षरता के अलग-अलग आंकड़ों को देखें तो महिलाओं में साक्षरता बढ़ी है | पुरूष साक्षरता 75.26 फीसदी से बढ़कर 82.14 फीसदी हुई अर्थात 6.9 फीसदी बढ़ोत्तरी | जबकि महिलाओं का साक्षरता 53.67 के मुकाबले 65.46 फीसदी बढ़ी यानि 11.8 फीसदी की वृद्धी हुई | इस दृष्टी से देखा जाए तो देश में लडकों या यह कहें कि पुरूषों की साक्षरता में पिछले 10 वर्षों में बढ़ोत्तरी तो हुई पर महिलाओं से कम | जबकि इस जनगणना  में लिंगानुपात के चौंकाने वाले आंकड़े भी सामने आए हैं | जिनमें बहुत से राज्यों में लडकियों की संख्या लडकों के मुकाबले घटती जा रही है | लडकियाँ कम हो रही हैं पर फिर भी पढ़ रही हैं | लडके अधिक हैं फिर पढ़ क्यों नहीं रहे हैं | इसका उत्तर बाल मजदूरी के रूप में काम करते बच्चों से जरूर मिल जाएगा | कहने का तात्पर्य यह है कि लडके शिक्षा को छोड़कर ज्यादतर बाल मजदूरी, अपराध की दुनिया और छोटे-मोटे गलत कामों की ओर अग्रसर हो रहे हैं | इस प्रकार वर्ष 2011 में देश के अलग-अलग राज्यों के साक्षरता के आंकड़ों को जानने के बाद एक तस्वीर यह उभरकर सामने आती है कि देश में निरक्षरों की संख्या में 3.11 करोड़ की कमी आई है | पिछले 10 वर्षों में जहां 1.40 करोड़ परुष साक्षर हुए वहीं 1.71 करोंड महिलाएं साक्षर हुई हैं | इस तरह देखा जाए तो देश में महिलाओं की साक्षरता की दर में 11.8 फीसदी का इजाफा हुआ है |   
                                                                                           मुनीर अहमद मोमिन 

Thursday, May 19, 2011

'दीपिका' को लपेटने में लीन हो गया 'ली'

    हीरोइनों को मुफ्त की टाफी समझते हैं क्रिकेटर !
         प्राख्यात टेनिस स्टार प्रकाश पादुकोण की सुकन्या सिने स्टार दीपिका पादुकोण को अपने प्रेम जाल की पिच पर लपेटने के लिए आस्ट्रेलियाई तेज़ गेंदबाज़  ब्रेट ली ने इतने लटके-झटके दिखाए कि मुहब्बत के मैदान की मंझी खिलाड़ी और 'दिलफेंक हसीना' के नाम से चर्चित दीपिका की हलक सूख गई | खबर है कि फिल्म इंडस्ट्री में 'किंग खान' के नाम से मशहूर कोलकाता नाईट राइडर्स के मालिक फिल्म स्टार शाहरूख खान द्वारा एक दी गई पार्टी में ब्रेट ली दीपिका को देखकर इतना लट्टू हो गया कि दीपिका को एसी हाल में भी ठंडे पसीने आ गए | इस पार्टी में बालीवुड के बहुत सारे सितारे भी मौजूद थे | जहां ब्रेट ली ने तमाम रात गिटार बजाते हुए गाने गाकर दीपिका को अपने लफंगई रूपी शार्ट पिच गेंद के गंदे फंदे में फंसाने की जी-तोड़ कोशिश की | शुरू में तो दीपिका भी ली के इशारों पर मंद-मंद चवन्नी छाप मुस्कुराहट बिखेर रही थी | जिसे 'लाइन क्लियर' का सिग्नल समझकर जब ब्रेट ली ने अपना लाईन-लेंथ दुरूस्त करते हुए पूरा का पूरा फोकस केवल और केवल दीपिका की ओर झोंकना शुरू किया तो वह असहज हो उठी | भला हो शाहरूख खान का जिन्होंने ब्रेट ली की दीवानगी रूपी लंपटगिरी और दीपिका की असहजता को भांप लिया और वह ज्यादा समय उसके पास बैठकर उसे सहज करने का प्रयास करते रहे |  फिर भी दीपिका के बेचैनी का पारा एकदम नार्मल नहीं हो पाया |
         हमें तो इस दिलफेंक ब्रेट ली की टुच्चई भरी लंपटगिरी से कोई ज्यादा शिकायत नहीं है | क्योंकि इतने कम अरसे में ही दीपिका पादुकोण ने प्रेम की पिच पर बड़े-बड़े धुरंधरों के विकेट चटखाए हैं | पहले प्रेम मैच में उसने वर्तमान के साक्षी पति और भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी से इलू-इलू की ओपनिंग पारी खेलवाई | फिर बीच में उसने युवराज सिंह को भी दो-चार मुहब्बती ओवर खेलने का मौक़ा दिया | लेकिन इसके बाद प्रतिष्ठित खिलाड़ी बाप की महा खिलाड़ी बेटी कपूर खानदान के चश्मों-चिराग़ रणवीर कपूर के साथ झूमा-झटकी का खेल शुरू कर दिया | यहाँ भी दीपिका के कदम ज्यादा देर तक नहीं टिके | फिर वह शराब व्यवसायी और किंग फिशर हवाई जहाज के मालिक विजय माल्या के बेटे सिद्धार्थ माल्या के साथ जगह-जगह डूबते-उड़ते नज़र आने लगी | शायद हो सकता है कि ब्रेट ली को किसी ने दीपिका का यह 'फीड बैक' दे दिया हो | इसलिए उसने दीपिका पर अपना हाथ आजमाने में कोई हर्ज़ नहीं समझा | ब्रेट ली यह भी देख रहा होगा कि आईपीएल टीम की मालकिनें नाभिदर्शना शिल्पा शेट्टी से लेकर प्रिती जिंटा तक अपनी टीम की जीत पर अपने खिलाड़ियों के उत्साह वर्द्धन हेतु उनसे लिपटने-चिमटने और चूमा-चाटी से परहेज़ नहीं करती हैं | इसीलिए ब्रेट ली ने 'चांस' मारने में कोई कोताही नहीं बरती |
         यहाँ पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि इसी तरह पूर्व में भी फ़िल्मी दुनिया से ही जुडी नीना गुप्ता नामक एक परम ऐतिहासिक नारी का दिल वेस्टइंडीज़ के घोर श्यामवर्णीय क्रिकेट खिलाड़ी विवियन रिचर्ड पर ऐसी द्रुत गति से आया कि वह आनन-फानन में उसके बच्चे की कुंवारी माँ बन बैठी | इस प्रकरण को लेकर तब देश में सभ्यता और संस्कृति की दुहाई देते हुए काफी हो-हल्ला और थुक्का-फजीहत हुई थी | लेकिन नीना गुप्ता हिमालय की तरह सीना ताने अपने कुकर्म को जायज़ बताने के लिए अड़ी रहीं | हालांकि उस घटना पर कई लोगों का कमेन्ट है कि यदि नीना को काला कलर और बैट्स मैन ही पसंद था तो अपना विनोद काम्बली ही कौन सा बुरा था | क्योंकि नीना के पसंद की सारी खासियतें विनोद कांबली में मौजूद थीं और माल भी स्वदेशी था | बस जरूरत थी थोड़े से सब्र की |
                                                                                         मुनीर अहमद मोमिन             

Wednesday, May 18, 2011

सिर्फ IAS, IPS ही नहीं, देश की तस्वीर भी बदलें


  आज भी देश के 88% युवा उच्च शिक्षा से वंचित !
         केन्द्रीय लोकसेवा आयोग या UPSC की परीक्षा में देश भर में इस साल कुल 920 छात्र उत्तीर्ण हुए हैं | निश्चय ही ऐसी शिखर परीक्षाओं से IAS, IPS व IFS जैसे उच्च पदों पर कार्य करने के अवसर मिलते हैं | उनसे बड़ी जनसेवा भी हो सकती है | उत्तर-प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी कभी IAS बनने का सपना पाल रखी थीं | स्वर्गीय कांशीराम की प्रेरणा से वे राजनीति में आ गईं (जहां IAS उनकी जूतियाँ सीधी करते हैं) | नेता भले ही राजनैतिक नेतृत्व करे  मगर प्रशासन ही पूरे सिस्टम को चलाता है | इन अफसरों पर ही पूरा तन्त्र निर्भर करता है | इसलिए सेवाभावी युवाओं द्वारा ऐसी शिखर परीक्षाओं के द्वारा लोकसेवा में प्रवेश करना निश्चय ही देश व समाज के लिए अच्छा है |
          लेकिन वास्तविकता इतनी ही नहीं है | एक तो सिर्फ 12% छात्र ही उच्च शिक्षा यानि ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन तक पहुंचते हैं | यानि 88% ऐसे किशोर युवा जो IAS, IPS व IFS बनने की योग्यता रखते हैं, या जो देश सेवा, लोक सेवा प्रशासन के माध्यम से करना चाहते हैं | वे इनसे वंचित रह जाते हैं | यह भयानक व शर्मनाक अन्याय आज़ादी के 63 सालों के बाद भी जारी है | इसलिए जो छात्र या युवा प्रशासन के कुछ पदों पर पहुंचते हैं | उन्हें इस तस्वीर को बदलना चाहिए | यह उनका कर्तव्य भी है और इसके लिए उनके पास अवसर भी होता है | हमारे नेता, विधायक, सांसद व  मंत्री कितना जानते हैं | मंत्रियों को उनके विभागों की जानकारियाँ उनके विभागों के IAS अफसर ही देते हैं | इसके बाद भी मंत्रियों तक को अपने काम-काज की ठीक-ठीक मालूमात के लिए वर्षों लग जाते हैं |
         राजनेताओं को भी संवैधानिक पद देने से पहले प्रशिक्षण व परीक्षा से गुजरना चाहिए | हमारे देश में इसकी सबसे बड़ी कमी है | यही कारण है कि देश आज भी गरीबी, बेकारी की समस्याओं से जूझ रहा है | जिस देश के 20 करोड़ लोग एक वक्त भोजन करके ज़िन्दगी गुजारते हों और करीब 11 करोड़ युवा बेरोजगार हों वहां महज़ 920 युवाओं के IAS, IPS व IFS आदि सर्वोच्च प्रशासनिक पदों पर पहुंचना कोई गर्व की बात नहीं है | हाल ही में करीब पांच लाख करोड़ रूपए के घोटाले उजागर हुए हैं | कहीं न कहीं इन सब में प्रशासन इन्वाल्व रहता है | यदि ये अफसर या नौकरशाह चाहें तो ऐसे घोटालों को रोक सकते हैं | 
         हर साल करीब 45 हजार करोड़ रूपए विकास कार्यों में लेट-लतीफी से बर्बाद होते हैं | इन्हें बचाया जाए तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में करोड़ों छात्रों को सहायता दी जा सकती है | भारत में एज्युकेशन लोन अमेरिका से 32 गुना कम छात्र लेते हैं | क्योकि वे या तो इस बारे में जानते ही नहीं या उन्हें चुकाने की क्षमता नहीं रखते | बेहतर हो कि ये शिखर परीक्षाओं में उतीर्ण होकर प्रशासन को संभालने वाले छात्र यह स्थिति बदलें | अगर ये चाहें तो देश की तस्वीर बदल सकती है और हमारे करोड़ों युवाओं को जीने की सही राह भी मिल सकती है | 
                                                                               मुनीर अहमद मोमिन    

Tuesday, May 17, 2011

नई बोतल में पुरानी ही शराब है !

 राजा-रानी बदलें तो जनता क़ी तकदीर भी तो बदले !
         पांच राज्यों के जो चुनाव परिणाम आए हैं, उनमें जीत और हार किसी की भी हो, जनता या 'मतदाता राजा' का वोट बदलाव के लिए ही दिखाई देता है | जहां तक असम में कांग्रेस की जीत का सवाल है, वहां देश क़ी भौगोलिक स्थिति के मुताबिक़ कांग्रेस या किसी भी बड़ी पार्टी की ही सत्ता होनी चाहिए | ताकि पूर्वांचल की सीमा पर केंद्र का असर रहे, क्योंकि सीमा क्षेत्र पर लगातार विदेशी दबाव रहता है | पश्चिम बंगाल में बदलाव की आंधी बह ही रही थी | यह ३४ सालों बाद तृणमूल कांग्रेस या ममता बनर्जी की ऐतिहासिक जीत इस बात का प्रतीक नहीं कि सीपीएम या मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी अपने मोर्चे सहित हार गई | बल्कि यह नए नेतृत्व की जीत है | पश्चिम बंगाल में जनता को नया और आक्रामक नेतृत्व चाहिए था | ज्योति बसु के 'रिटायर' होने के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य उनके वारिस बने | वे जब शिक्षा मंत्री थे, तभी लोकप्रिय थे | लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद लगातार उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिरता गया | वामपंथी सरकार ने जिस तरह से सत्ता में आने के बाद भू-वितरण किया, उसे लेकर सारे देश में जागरण आना चाहिए था | 
         आज़ादी के बाद जमींदारी-तालुकेदारी प्रथा किसी न किसी रूप से जारी रही | उसका निर्मूलन जरूरी था | जो आज भी नहीं हो पाया | दरअसल पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की हार इसीलिए निश्चित थी कि उनकी विचारधारा पहले से ही हार चुकी थी | ममता बनर्जी की जीत के साथ भारत में मार्क्सवाद या कम्यूनिज्म की हार एक तरह से पूर्णता प्राप्त कर चुकी है | जो कुछ थोड़ी-बहुत सीटें विधानसभा व लोकसभा में हैं, वे बहुत दिनों तक कायम रहेंगी ऐसा नहीं लगता | दरअसल पश्चिम बंगाल में नैनो प्रोजेक्ट या उद्योगों को लेकर जो राजनैतिक हिंसा पैदा की गई | यह उसकी जीत है | ममता भले ही इसे 'मां-भारी-माणुस' की जीत बताएं व 'हिंसा की आज़ादी' कहें लेकिन इसकी बुनियाद तृणमूल कांग्रेस व वामपंथियों के बीच हिंसा पर ही पड़ी | पश्चिम बंगाल को आक्रामक नेतृत्व ही अच्छा लगता है | उन्होंने बंगाल की इस शेरनी को अपना ताज सौंप दिया |
         तमिलनाडु का राजनैतिक जीवन ही अलग है | यहाँ द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों में होड़ 'लालच की स्पर्धा' थी, कौन मतदाता को ज्यादा लालच दे सकता है ? कलर टी.वी., मंगल सूत्र व लैप-टाप जैसी मंहगी चीज़े देने का लालच दिया गया | आश्चर्य जनक बात तो यह है कि चुनाव आयोग ने इस पर आपत्ति नहीं उठाई | जहां तक चुनावी वायदे होते हैं- उनमें गरीबी हटाने, रोज़गार दिलाने, घर, ऋण माफी आदि का लालच दिया जाता है | लेकिन सीधे जब टी.वी., ली-टाप या मंगलसूत्र की बात करें तो यह तो चुनाव न होकर बाज़ार हो गया | वैसे भी हमारे देश में 'सौ रूपए या शराब की बोतल' में वोट खरीदे व बेचे जाते हैं | यह सच हाल ही में अण्णा हजारे ने भी कहा था | ग्राम पंचायत, मनपा, विधानसभा व लोकसभा चुनाव ही नहीं विधान परिषद व राज्य सभा के चुनाव भी धन-बल की भेंट चढ़ जाते हैं | एक नगरसेवक(पार्षद) १० लाख से २५ लाख रूपए, एक विधायक तीन करोड़ रूपए व सांसद १० करोड़ रूपए में देश को मिलता है | 
         अगले साल भी कई राज्यों के चुनाव होंगे | ये सब लोकसभा चुनाव के रिहर्सल क़ी तरह माने जाते हैं | पश्चिम बंगाल व असम में जीत से कांग्रेस बम-बम होकर अपनी पीठ ठोंक सकती है | एक आश्चर्य यह है कि महंगाई व भ्रष्टाचार चुनाव में असरदार मुद्दे नहीं रह पाते | भले ही पांच साल उन्हें लेकर हंगामा हो | स्थानीय मुद्दे ही सबसे बड़े फैक्टर होते हैं | नई दिल्ली में बदलाव के बारे में अभी से कुछ कहना ठीक नहीं होगा | लेकिन बदलाव क़ी इच्छा लोगों में जरूर है | नेतृत्व का अभाव इसमें सबसे बड़ी बाधा है | नेता, सरकार या राजा-रानी बदलें तो देश क़ी किस्मत भी बदलनी चाहिए | ऐसा नहीं हो कि बदलाव के लिए मतदाता का यह जनादेश बेकार चला जाए |
                                                                                              मुनीर अहमद मोमिन      

Tuesday, May 10, 2011

be lagam: 'माया राज' में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं !

be lagam: 'माया राज' में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं !: " उत्तर-प्रदेश सरकार के सारे दावे खोखले राष्ट्रीय महिला आयोग की बात को यदि सच माने तो महिला और दलित महिला उत्पीड़न क..."

Saturday, May 7, 2011

कब मरेगा मंहगाई रूपी लादेन ?

 सरकार और रिजर्व बैंक दोनों जनता को लूटने में जुटे
         आतंकवादी ओसामा बिन लादेन तो मर गया, लेकिन भारत में इन दिनों महंगाई रूपी लादेन का आतंक अपने चरम पर अभी भी बरकरार है | इस लादेनिया महंगाई ने आम जनों को इतना आतंकित कर दिया है कि यह गरीब लोगों को बिना किसी जैविक या प्राण घातक हथियार के ऐसे ही मार डालेगी | कारनामों से तो ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार व रिजर्व बैंक को जैसे जनता ने चुना व बनाया ही इसलिए हो कि वे जमकर बिना रोक-टोक महगांई बढाते रहें | अब तक का तो लोगों का यही अनुभव रहा है कि इन दोनों का महंगाई बढाना ही एक सूत्रीय कार्यक्रम रह गया है | चूंकि अभी ताज़ा-ताज़ा हुए पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों के मद्देनज़र जनता को लालीपाप देकर बेवकूफ बनाना था | इसलिए सोचे समझे प्लान के अनुसार महंगाई को रोकने का खूब ड्रामा किया गया | अब लगभग सारे राज्यों के चुनाव खत्म हो गये हैं और १३ मई को मतगणना भी हो जायेगी | इसलिए आर्थिक भस्मासुर रूपी रिजर्व बैंक ने रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट बढ़ा दिए  | उसके बाद भी आरबीआई के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने केवल भारतीय जनता को फरेब में डालने के लिए  दावा किया है कि रिजर्व बैंक महंगाई या मुद्रा स्फीति रोकने हेतु प्रयास कर रहा है | उसके अनुसार विकास दर भले ही नौ प्रतिशत की जगह आठ प्रतिशत हो, महंगाई नहीं बढनी चाहिए | अब  इस दर वृद्धि से गृह व वाहन लोन महंगे होंगे | आईडीबीआई ने तो तुरंत ही ब्याज दरें भी बढ़ा दी |
         इससे अपने घर का सपना और महंगा हो गया है | लगता है कि आरबीआई और केंद्र सरकार दूसरे शब्दों में वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंह अहलुवालिया, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार आदि की महंगाई बढाओ कार्यक्रम पर अम्ल करने के लिए अघोषित रूप से एक मंडली बन गयी है | जब लोकसभा चुनाव हुए तो महंगाई पर अस्थाई लगाम लगाने के लिए बड़े उपाय करने लगे | फिर चुनाव हो गये और जीत भी मिल गयी | लेकिन महंगाई कम करने का वादा सरकार सिरे से भूल गयी | रिजर्व बैंक ने क्रूड या कच्चे तेल का भाव ११० डालर प्रति बैरल पहुंचने के बहाने पेट्रोल-डीजल का तुरंत मूल्य वृद्धि करने का आदेश दिया है | इसके अनुसार तेल पूल में एक लाख ८० हजार करोड़ रूपये का घाटा होगा | इससे बचने के लिए डीजल में १८ रूपये प्रति लीटर और पेट्रोल में आठ रूपये प्रति लीटर की वृद्धि होगी |  अब यह बताने की बात नहीं है कि इससे ट्रांसपोर्ट चार्ज महंगे होंगे | जिससे सब्जी, फल, अनाज, पर्यटन आदि सब महंगा होगा | यानी जनता जो मंहगाई रूपी आतंकवाद का सामना कर ही रही थी, कि अब उसे मंहगाई के और भयानक हमलों का भी सामना करना होगा | जहां तक पेट्रोल-डीजल के मूल्यों का सवाल है, उस पर टैक्स ही ५०% से ६५% है | 
         यानि इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड आयल ११० डालर प्रति बैरल हो गया है | तो भी टैक्स में ५०% कमी करके जनता को दर वृद्धी से से मुक्ति आसानी से दी जा सकती है | लेकिन सरकार व आरबीआई को जनता नहीं तेल कम्पनियों की चिंता है | जो आश्चर्यजनक रूप से भयानक घाटे के बावजूद नफे में ही रहती हैं | इसका क्या राज़ है यह किसी के भी समझ से सर्वथा परे है | दरअसल सरकार को अपना खजाना भरने और तेल कम्पनियों को खुश रखने के सिवा कुछ नहीं आता | यह जनता की सरकार नहीं बल्कि तेल कम्पनियों और बाजारवादी ताकतों की सरकार है | अब वक्त आ गया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन की तरह मंहगाई के खिलाफ भी जनता को खुलकर एक निर्णायक लड़ाई लड़ना होगी | 
                                                                      मुनीर अहमद मोमिन                  

Wednesday, May 4, 2011

ओसामा मरा, लेकिन अमेरिका अभी ज़िंदा है !


आतंकी घटनाओं का असल जिम्मेदार कौन ?
         गाँव-देहात की एक कहावत है - चोर को नहीं उसकी माँ को मारो | क्योंकि बिना गर्भनाल को समूल नष्ट  किए बुराई का जड से खात्मा नहीं किया जा सकता | अमेरिका वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले को भूलने को तैयार नहीं है | और कमो-बेश उस जैसे भारत में हुई दर्जनों घटनाओं की ओर तवज्जो देना उसके दोगले खून में भी नहीं है | देश में घटी आतंकी घटनाओं को लेकर ज्यादा से ज्यादा संवेदना तो भारत के प्रति जता देता है | लेकिन इन घटनाओं के जिम्मेदार लोगों को वह अपनी सहायता देना भी बंद नहीं करता | सच तो ये है कि जब तक अमेरिका है तब तक आतंकवाद का खात्मा मुश्किल ही नही नामुमकिन भी है | आतंकवाद की खेती को पोषण आहार किसी न किसी रूप में यही देता है | कल 'फेस बुक' पर किसी ने ये शीर्षक लगाया था कि "एक छोटा आतंकवादी, एक बड़े आतंकवादी के हाथों मारा गया" यह शब्दशः  सत्य है | अकेले मेरे ही नहीं बल्कि मुझ जैसे ज्यादातर लोगों का मानना है कि आज हमारा पूरा देश जो आतंकवाद का दंश झेल रहा है उसमें परोक्ष रूप से ही सही अमेरिका भी कहीं न कहीं किसी न किसी रूप से अवश्य लिप्त है | हमारे दुश्मनों को दामाद की तरह खर्चा-पानी वही मुहैया करा रहा है | आज अमेरिका की दबंगई और गुंडागर्दी इतनी बढ़ गई है कि वह मनमाने ढंग से तय कर रहा है कि क्या सही है और क्या गलत | इजराइल के मामले में अमेरिका का दोगलापन जग ज़ाहिर है | इस तरह इसने इजराइल को वह अपनी नाजायज़ औलाद की तरह पाल-पोसकर बड़ा कर रहा है |
           जबकि इसके ठीक विपरीत अमेरिका ने सद्दाम हुसैन पर रासायनिक हथियार रखने का आरोप लगाया | बिना किसी सबूत के संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद को धत्ता बताकर इराक पर हमला किया | सद्दाम हुसैन को मार डाला | इराक को नेस्त-नाबूद कर दिया | इसी तरह लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी पर रूस, चीन और हिन्दुस्तान जैसे देशों के विरोध के बावजूद अमेरिका के नेतृत्व में नाटो की फौज रोज़ हमला करती है | अफगानिस्तान की अमेरिका ईंट से ईंट बजा चुका है | 'वर्ल्ड ट्रेड सेंटर' को उड़ाने में न तो अफगानिस्तान की कोई भूमिका थी, न इराक की और न ही लीबिया की | तत्कालीन तालिबान सरकार ने सिर्फ ओसामा बिन लादेन को संरक्षण देने का अपराध किया था | अमेरिका ने इस अपराध में तालिबान के प्रमुख मुल्ला उमर को इस कदर दौड़ाया कि उसका आज दिन तक कोई अत-पता नहीं चल पा रहा है | अमेरिकी एजेंसी सीआईए २००१ के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के हमलों के समय से ही दावा करती आई है कि अलकायदा के उस अभियान को भी आईएसआई का समर्थन था | अब लादेन की मौत ने अलकायदा और पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान का रिश्ता साफ़ कर दिया है | इस घटना के मद्देनजर भारत के रणनीतिकारों को भी अब नए सिरे से सोचना चाहिए कि जो पकिस्तान परम दोगला अमेरिका की दोगलई को भी मात देकर लादेन के नाम पर उसके साथ आँख मिचौली खेल सकता है | उस भारत को क्या गिनेगा, जो आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका के सामने याचक भाव से कटोरा लेकर खड़ा है |
               प्रसंगवश यहाँ इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि कुख्यात ओसामा बिन लादेन के अंत के बाद दुनिया के सामने आतंकवाद की चुनौती कम नहीं हुई है, सिर्फ ओसामा की मौत के लिए १० साल के एक लम्बी अवधि का इंतज़ार और करीब १० हजार करोड़ रूपए से अधिक के खर्च के साथ न जाने कितने सैनिकों एजेंटों की मौत की कीमत अमेरिका को चुकानी पड़ी है | यह समझ लेना कि ओसामा मर गया तो आतंकवाद की जड़ें उखड़ जाएँगी, यह बचपना होगा | क्योंकि अभी ओसामा जैसे मास्टर माइंड और खूंखार उसके साथी एमान-अल-जवाहिरी, अनवर-अल औलाकी और खालिद-अल-हबीब जैसे करीब आधे दर्जन आतंकी अल-कायदा के नए ओसामा बनने की कतार में हैं | अल-कायदा का नेटवर्क ४४ देशों में फैला बताया जाता है | उसका निकट का संबंध तहरीके-तालिबान से है | ओसामा की मौत को लेकर इन दोनों आतंकी संगठनों सहित सभी आतंकवादियों में नफरत और गुस्से की आग भडक चुकी होगी | तालिबान ने तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी व अमेरिका पर हमले की चेतावनी भी दे दी है | आतंकवादी कब, कहाँ और किसे निशाना बनाएंगे कहा नहीं जा सकता | सबसे बड़ा डर एटमी हमले का है | अमेरिका ने तो अपना बदला ले लिया | अब शेष दुनिया इसका क्या परिणाम भोगेगी यह देखना शेष है |
                                                           मुनीर अहमद मोमिन