दो साल में 30 हज़ार करोड़ रूपए की वसूली !
आयकर विभाग द्वारा पिछले दो सालों में की गई छापेमारी में ३० हजार करोड़ रूपए की की गई काले धन की वसूली निश्चय ही एक बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए | सेंट्रल बोर्ड आफ डाइरेक्टर टैक्सेस (CBDT) के अध्यक्ष सुधीर चन्द्रा का यह दावा सरकारी अंधेरगर्दी में कहीं तो यह एहसास दिलाता है कि कुछ काम भ़ी हो रहा है | चंद्रा के अनुसार हर छापेमारी में करीब सौ करोड़ रूपए का काला धन मिला | स्पष्ट है कि देश में इससे बहुत ज्यादा काला धन है | जैसे घोड़ा व्यवसायी व टैक्स चोर ब्लैक मनी मेकर हसन अली से वसूली आखिर कहीं न कहीं तो भारत में ही उसके सोर्सेज़ रहे होंगे | जिनसे समय पर उनके द्वारा एकत्र काली संपत्ति व काले धन की कुछ मात्रा में ही सही वसूली होती है | ऐसे सैकड़ों मामले हो सकते हैं | क्योंकि स्विस व विदेशी देशों में ७२ लाख ८० हजार करोड़ रूपए भारतीयों के जमा बताए गए हैं | हर साल जीडीपी या सकल घरेलू आय की ५% रकम हवाला या अन्य माध्यम से विदेशों में जाती है | जो फिर नहीं लौटती | यानि २० वर्षों में एक पूरे साल की जीडीपी विदेशों में चली जाती है |
वर्तमान जीडीपी के अनुसार यह लगभग ढ़ाई लाख करोड़ रूपयों से अधिक है | और यहाँ तक है कि जब पिछले तीन सालों में अमीर उद्योगपतियों को चार लाख करोड़ रूपए अधिक की टैक्स छूट दी गई | ऐसे अमीरों द्वारा बैंक के भ़ी ५० हज़ार करोड़ रूपए से अधिक डूबोए गए हैं | हर साल ५० हजार करोड़ रूपए से ८० हजार करोड़ रूपयों की ब्लैक मनी बनती है | यह एक पुराना अनुमान है | जो अब तक दुगुनी हो चुकी है | देशभर में कितनी ब्लैकमनी है यह बता पाना मुश्किल है | इसी अनुमान के आधार पर २० देशों में १० लाख करोड़ रूपए तक की न्यूनतम ब्लैक मनी पैदा हुई है | बताया गया है कि २१ लाख करोड़ रूपए जो विदेशी देशों में जमा हुए हैं | वे आर्थिक सुधारों के बाद के हैं | मनी बचाना न सिर्फ राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था से गद्दारी व क़ानून की नज़र में अपराध है, बल्कि यह मानवीय दृष्टी से भ़ी भयानक क्रूरता है | क्योंकि इससे करोड़ों लोग गरीब, बेकार, अशिक्षित व अकालग्रस्त होते हैं | सुविधाओं का अभाव होता है | विकास योजनाएं रूकती है और भ्रष्टाचार पनपता है | ब्लैक मनी एक न एक साथ कई तरह की भार करती है | जैसे बच्चों का दूध, शिक्षा व दवा का भ़ी हक़ छीन लेती है | हमारे देश में यह वर्ग विभाजन करती है | इसी के कारण राजनैतिक रूप से भारी भ्रष्टाचार पैदा होता है |
चुनाव में काले धन का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है | अतः चुनाव ही भ्रष्टाचार की गंगोत्री बन जाता है | चुनाव में हुआ खर्च उम्मीदवारों के लिए इन्वेस्टमेंट की तरह होता है | जिसे वे जीत के बाद कई गुनी रकम व सम्पत्ति के रूप में वसूलते हैं | राजनीति काली कमाई का शार्टकट है | यही कारण है कि राजनीति सेवा नहीं मेवा या बिना काम किए अमीरी का माध्यम बन गया है | अब राजनीति भ़ी कैरियर बनती जा रही है | आज़ादी के बाद के २५ वर्षों में वे लोग जो आज़ादी, देशभक्ति और देश सेवा से प्रेरित होते थे | वह पीढ़ी ही जैसे चली गई | त्याग व समर्पण का अभाव हो गया है | वर्ष १९९०-९१ में जब डा. मनमोहन सिंह वित्तमंत्री बने और ग्लोबलाईजेशन के लिए सरकार ने रेड कारपेट बिछाए तो फिर पैसा कैरियर और व्यक्तिगत महत्वकांक्षाएँ ही प्रमुख हो गईं और काले धन के निर्माण में तेज़ी आई | यह तथ्य है कि जारी वर्ष में देश में नौ लाख करोड़ रूपयों से भ़ी अधिक का राजस्व करों के रूप में वसूला जा चुका है | अगले दो सालों में हमारा वार्षिक केन्द्रीय बचत १५ लाख करोड़ रूपए हो सकता है | मगर ब्लैक मनी का मुद्दा संतोष जनक ढ़ंग से हल होता दिखाई नहीं देता | ब्लैक मनी की चुनौती से निपटे बिना हमारी आर्थिक व्यवस्था व हमारा विकास अपंग ही रहेगा |
मुनीर अहमद मोमिन