राजा-रानी बदलें तो जनता क़ी तकदीर भी तो बदले !
पांच राज्यों के जो चुनाव परिणाम आए हैं, उनमें जीत और हार किसी की भी हो, जनता या 'मतदाता राजा' का वोट बदलाव के लिए ही दिखाई देता है | जहां तक असम में कांग्रेस की जीत का सवाल है, वहां देश क़ी भौगोलिक स्थिति के मुताबिक़ कांग्रेस या किसी भी बड़ी पार्टी की ही सत्ता होनी चाहिए | ताकि पूर्वांचल की सीमा पर केंद्र का असर रहे, क्योंकि सीमा क्षेत्र पर लगातार विदेशी दबाव रहता है | पश्चिम बंगाल में बदलाव की आंधी बह ही रही थी | यह ३४ सालों बाद तृणमूल कांग्रेस या ममता बनर्जी की ऐतिहासिक जीत इस बात का प्रतीक नहीं कि सीपीएम या मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी अपने मोर्चे सहित हार गई | बल्कि यह नए नेतृत्व की जीत है | पश्चिम बंगाल में जनता को नया और आक्रामक नेतृत्व चाहिए था | ज्योति बसु के 'रिटायर' होने के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य उनके वारिस बने | वे जब शिक्षा मंत्री थे, तभी लोकप्रिय थे | लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद लगातार उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिरता गया | वामपंथी सरकार ने जिस तरह से सत्ता में आने के बाद भू-वितरण किया, उसे लेकर सारे देश में जागरण आना चाहिए था |
आज़ादी के बाद जमींदारी-तालुकेदारी प्रथा किसी न किसी रूप से जारी रही | उसका निर्मूलन जरूरी था | जो आज भी नहीं हो पाया | दरअसल पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की हार इसीलिए निश्चित थी कि उनकी विचारधारा पहले से ही हार चुकी थी | ममता बनर्जी की जीत के साथ भारत में मार्क्सवाद या कम्यूनिज्म की हार एक तरह से पूर्णता प्राप्त कर चुकी है | जो कुछ थोड़ी-बहुत सीटें विधानसभा व लोकसभा में हैं, वे बहुत दिनों तक कायम रहेंगी ऐसा नहीं लगता | दरअसल पश्चिम बंगाल में नैनो प्रोजेक्ट या उद्योगों को लेकर जो राजनैतिक हिंसा पैदा की गई | यह उसकी जीत है | ममता भले ही इसे 'मां-भारी-माणुस' की जीत बताएं व 'हिंसा की आज़ादी' कहें लेकिन इसकी बुनियाद तृणमूल कांग्रेस व वामपंथियों के बीच हिंसा पर ही पड़ी | पश्चिम बंगाल को आक्रामक नेतृत्व ही अच्छा लगता है | उन्होंने बंगाल की इस शेरनी को अपना ताज सौंप दिया |
तमिलनाडु का राजनैतिक जीवन ही अलग है | यहाँ द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों में होड़ 'लालच की स्पर्धा' थी, कौन मतदाता को ज्यादा लालच दे सकता है ? कलर टी.वी., मंगल सूत्र व लैप-टाप जैसी मंहगी चीज़े देने का लालच दिया गया | आश्चर्य जनक बात तो यह है कि चुनाव आयोग ने इस पर आपत्ति नहीं उठाई | जहां तक चुनावी वायदे होते हैं- उनमें गरीबी हटाने, रोज़गार दिलाने, घर, ऋण माफी आदि का लालच दिया जाता है | लेकिन सीधे जब टी.वी., ली-टाप या मंगलसूत्र की बात करें तो यह तो चुनाव न होकर बाज़ार हो गया | वैसे भी हमारे देश में 'सौ रूपए या शराब की बोतल' में वोट खरीदे व बेचे जाते हैं | यह सच हाल ही में अण्णा हजारे ने भी कहा था | ग्राम पंचायत, मनपा, विधानसभा व लोकसभा चुनाव ही नहीं विधान परिषद व राज्य सभा के चुनाव भी धन-बल की भेंट चढ़ जाते हैं | एक नगरसेवक(पार्षद) १० लाख से २५ लाख रूपए, एक विधायक तीन करोड़ रूपए व सांसद १० करोड़ रूपए में देश को मिलता है |
अगले साल भी कई राज्यों के चुनाव होंगे | ये सब लोकसभा चुनाव के रिहर्सल क़ी तरह माने जाते हैं | पश्चिम बंगाल व असम में जीत से कांग्रेस बम-बम होकर अपनी पीठ ठोंक सकती है | एक आश्चर्य यह है कि महंगाई व भ्रष्टाचार चुनाव में असरदार मुद्दे नहीं रह पाते | भले ही पांच साल उन्हें लेकर हंगामा हो | स्थानीय मुद्दे ही सबसे बड़े फैक्टर होते हैं | नई दिल्ली में बदलाव के बारे में अभी से कुछ कहना ठीक नहीं होगा | लेकिन बदलाव क़ी इच्छा लोगों में जरूर है | नेतृत्व का अभाव इसमें सबसे बड़ी बाधा है | नेता, सरकार या राजा-रानी बदलें तो देश क़ी किस्मत भी बदलनी चाहिए | ऐसा नहीं हो कि बदलाव के लिए मतदाता का यह जनादेश बेकार चला जाए |
मुनीर अहमद मोमिन
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