घोटालों के लिए समर्पित रहा वर्ष - २०१०
लगता है वर्ष २०१० जाते-जाते कई राजनेताओं, नौकरशाहों सहित मीडिया का भी बैंड बाजे के साथ बारात निकालकर ही जायेगा | केन्द्रीय पूर्व दूरसंचार मंत्री ए.राजा, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, भारतीय प्रशासनिक सेवा के रवि इन्दर सिंह और उत्तर-प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव तो पैदल हो ही गए | महाराष्ट्र में प्रशासनिक सेवा के रामानंद तिवारी,सुभाष लाला, एमएमआरडीए के आयुक्त रत्नाकर गायकवाड़, एनडीटीवी की बरखा दत्त, हिंदुस्तान के वीर संघवी सहित दर्जनों पत्रकारों आदि-इत्यादी की जमकर चंहुओर थुक्का-फजीहत हो रही है | इसी दौरान आजम खान की सपा में इंट्री के साथ ही मुलायम सिंह यादव का अनाज घोटाला भी फिर उत्तर-प्रदेश में कुलांचे मारने लगा है | जानकारों का मानना है कि किसान प्रदेश के किसान नेता मुलायम के राज का अनाज घोटाला टू -जी घोटाले का "बड़का अब्बा" साबित हो रहा है | खैर राजा अगर निकट भविष्य में जेल जाते हैं तो तमिलनाडू के लिए यह कोई नई बात नहीं होगी | क्योंकि शुरू-शुरू में ए. राजा के मामले में धृतराष्ट बने चश्माधारी एम. करूणानिधि और चिरकुवांरी अम्मा जे. जयललिता जेल लाभ अर्जित कर चुके हैं | यहाँ तक कि मुलायम के नवोदित बिहारी सखा लालू प्रसाद यादव भी जेल के लिट्टी-चोखा का स्वाद ले चुके हैं | अमर सिंह की यह धमकी कि, मैं मुंह खोल दूंगा तो मुलायम जेल चले जायेंगे ये गलत साबित हो सकता है ? क्योंकि उनके मुंह में अभी ढक्कन लगे रहने के बावजूद उत्तर-प्रदेश में अनाज की बोरी का मुंह खुल गया है | इसका श्री गणेश मुलायम के अथक प्रयास व पैंतरेबाजी से कभी उत्तर-प्रदेश की मुख्यसचिव बनी नीरा यादव की जेल यात्रा से हो चुका है | भूमि आवंटन घोटाले में जेल गईं नीरा यादव देश की एकमात्र ऐसी महिला मुख्यसचिव हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोप के चलते उच्चतम न्यायालय के आदेश पर मुख्यसचिव के पद से हटाया गया था | राजनीति में अव्वल रहने वाले उत्तर-प्रदेश का अनाज घोटाला भी देश के अन्य घोटालों का बाप साबित होगा | क्योंकि यह लगभग ३५ हजार करोड़ का अनाज घोटाला है | गरीबों के लिए मुफ्त अनाज योजना (बीपीएल), अन्त्योदय योजना, काम के बदले अनाज वाली जवाहर रोजगार योजना एवं मिड डे मिल योजना के तहत हुए अनाज के महाघोटाले के खिलाफ उत्तर-प्रदेश में लगभग ५००० एफ.आई.आर. भी दर्ज हुए हैं | जिसमें लगभग ३० हजार सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की भी गर्दन नपने की आशंका है | इस बाबत इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंड पीठ ने पिछले तीन दिसंबर को अनाज घोटाला मामले को सीबीआई के सुपुर्द करते हुए ६ माह के भीतर जाँच पूरा करने का आदेश दिया है | इस फैसले को लेकर बहन मायावती भले ही बम-बम हैं, लेकिन वह भी कुछ नहीं कम हैं |
मुनीर अहमद मोमिन
Wednesday, December 8, 2010
Tuesday, December 7, 2010
अशोक को शोकग्रस्त करने की सुपारी
लोगों का चीरहरण करके कचूमर निकालने वाली मीडिया पर भी अब पलट वार होने शुरू हो गए है | और मीडिया की स्वतन्त्रता के नाम पर की जा रही उदंडता पर खुद मीडिया के प्रबुद्ध जनों द्वारा इस तरह की नकेल की आवश्यकता कभी से महसूस की जाती रही है |
अपने गृहनगर नांदेड में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने मुख्यमंत्री से पैदल होने का नारियल मीडिया के सर पर फोड़ते हुए कहा है कि उन्हें पदच्यूत कराने के लिए महाराष्ट्र कांग्रेस के एक बड़े नेता ( केन्द्रीय मंत्री ) ने मीडिया को सुपारी दिया था, और इस तरह मीडिया ने उक्त नेता से सुपारी लेकर मेरा गेम बजा दिया | अशोक चव्हाण का खुला आरोप है कि -
मुझे तो लूट लिया , मिलके मीडिया वालों ने |
हाई कमान वालों ने , सत्ता के दलालों ने ||
इस ब्लॉग पर मै पहले भी लिख चुका हूँ कि दस जनपथ में गहरी पैठ रखने वाले एक नेता के मुंबई स्थित एक हमराज- हमकाज बिल्डर से और अशोक चव्हाण के नाक के बाल बने एक बिल्डर से एक प्रोजेक्ट को लेकर तनातनी हो गयी | इसकी भनक महाराष्ट्र के एक केन्द्रीय मंत्री को लगते ही उसने दस जनपथ के गुरु घंटाल से अशोक चव्हाण की पटेलगिरी करवा दी | दिल्ली के नेता के इशारे पर महाराष्ट्र वाले नेता ने मीडिया को सुपारी देकर 'आदर्श" गेम प्लांट करवा दिया | आदर्श के चक्कर में अशोक चव्हाण सामान्य हो गए | लकडाबाज की लकड़ीबाजी से चव्हाण की मुख्यमंत्री पद की वैशाखी खिसक गयी | अब लगता है कि अशोक चव्हाण दो-दो हाथ करने के मूड में उतर आयें हैं | इसलिए उन्होंने खुलकर एलान- ए-अशोक कर दिया है कि मुझे शोक में डालने की सुपारी मीडिया ने ली थी | पहले अन्डरवर्ल्ड में ही सुपारी लेने-देने का चलन था | लेकिन अब मीडिया के पहलवान भी सुपारी लेने लगे हैं | हत्याएं दोनों ही जगह होती है | अंडरवर्ल्ड वाले जान की हत्या करके सीधे 'खुदागंज ' का टिकट कटा देते हैं | और मीडिया वाले चारित्रिक हत्या करके पद-प्रतिष्ठा का स्वयं पोस्ट -मार्टम कर देते हैं |
मुनीर अहमद मोमिन
अपने गृहनगर नांदेड में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने मुख्यमंत्री से पैदल होने का नारियल मीडिया के सर पर फोड़ते हुए कहा है कि उन्हें पदच्यूत कराने के लिए महाराष्ट्र कांग्रेस के एक बड़े नेता ( केन्द्रीय मंत्री ) ने मीडिया को सुपारी दिया था, और इस तरह मीडिया ने उक्त नेता से सुपारी लेकर मेरा गेम बजा दिया | अशोक चव्हाण का खुला आरोप है कि -
मुझे तो लूट लिया , मिलके मीडिया वालों ने |
हाई कमान वालों ने , सत्ता के दलालों ने ||
इस ब्लॉग पर मै पहले भी लिख चुका हूँ कि दस जनपथ में गहरी पैठ रखने वाले एक नेता के मुंबई स्थित एक हमराज- हमकाज बिल्डर से और अशोक चव्हाण के नाक के बाल बने एक बिल्डर से एक प्रोजेक्ट को लेकर तनातनी हो गयी | इसकी भनक महाराष्ट्र के एक केन्द्रीय मंत्री को लगते ही उसने दस जनपथ के गुरु घंटाल से अशोक चव्हाण की पटेलगिरी करवा दी | दिल्ली के नेता के इशारे पर महाराष्ट्र वाले नेता ने मीडिया को सुपारी देकर 'आदर्श" गेम प्लांट करवा दिया | आदर्श के चक्कर में अशोक चव्हाण सामान्य हो गए | लकडाबाज की लकड़ीबाजी से चव्हाण की मुख्यमंत्री पद की वैशाखी खिसक गयी | अब लगता है कि अशोक चव्हाण दो-दो हाथ करने के मूड में उतर आयें हैं | इसलिए उन्होंने खुलकर एलान- ए-अशोक कर दिया है कि मुझे शोक में डालने की सुपारी मीडिया ने ली थी | पहले अन्डरवर्ल्ड में ही सुपारी लेने-देने का चलन था | लेकिन अब मीडिया के पहलवान भी सुपारी लेने लगे हैं | हत्याएं दोनों ही जगह होती है | अंडरवर्ल्ड वाले जान की हत्या करके सीधे 'खुदागंज ' का टिकट कटा देते हैं | और मीडिया वाले चारित्रिक हत्या करके पद-प्रतिष्ठा का स्वयं पोस्ट -मार्टम कर देते हैं |
मुनीर अहमद मोमिन
Monday, December 6, 2010
दो मुंह फटों के बीच फिर फटा-फट चालू
अथ अमर-आजम पुराण चालू .........
उत्तर-प्रदेश के पहलवान पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कभी दाएं-बाएं रहे स्वभाव से वाक्पटू लेकिन मुंहफट सपा के दो मुंहफटों अमर और आज़म के बीच फिर मुंहजोरई चालू हो गयी है | सपा में आज़म के दुबारा प्रवेश करने से तिलमिलाए अमर ने मुलायम पर धावा बोलते हुए कहा है कि, यदि वह मुंह खोल देंगे तो मुलायम सलाखों के पीछे होंगे | इससे पहले आज़म उन्हें "दलाल और सप्लायर" करार दे चुके हैं | अब अमर सिंह यह पूछना चाहते हैं कि, उन्होंने १४ सालों में मुलायम को क्या सप्लाई किया है | अमर-आज़म की 'डब्ल्यू-डब्ल्यू मुंहफटी कुश्ती' लोकसभा चुनाव के दौरान खूब चली | यहाँ तक कि आज़म ने अमर की महिला सखी जयाप्रदा को खूब निशाने पर रखा | जयाप्रदा, आज़म को अपनी सार्वजनिक सभाओं में भईया बताती रहीं | लेकिन उन्ही भईया पर अपनी अश्लील तस्वीरों/पोस्टरों के बंटवाने का आरोप भी लगाया | नतीजतन चुनाव के बाद अपनी चिर भौजाई जया बच्चन को मिलाकर अमर सिंह ने कसकर जोर लगाकर हईया.... कहा और उन आज़म की अज़मत को सपा से बे-आबरू कर डाला | जो सपा के गठन काल से ही मुलायम की पार्टी के फ्रेम में कथित तौर पर मुस्लिम चेहरा के नाम से विराजमान थे | इस प्रकरण/ फैसले से मुलायम एंड फेमिली खुश नहीं थी | लेकिन अमर, मुलायम पर इतना हावी थे कि, मुलायम परिवार को इसे खामोशी से पचाना ही पड़ा | लेकिन जब परिवार को लगा कि अमर, मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के पुत्र प्रतीक सिंह यादव को अंदरखाने प्रमोट करके अखिलेश यादव से आगे निकालने की गोट बिछा रहे हैं | फिर क्या था इस बार सारे परिवार ने मिलकर नेता जी को इतना चांपा कि उन्हें अमर सिंह को मनोज तिवारी की तरह बिग बॉस से बाहर निकालना ही पड़ा | तब से अमर गाहे -बगाहे अक्सर मुलायम के प्रति कठोर होते रहे हैं | अभी पिछले दिनों पूर्वांचल राज्य के गठन के लिए इलाहाबाद में हुई सभा में अमर ने अपने बड़के भईया अमिताभ , भौजाई जया , सहेली जयाप्रदा और छोटे भाई संजय दत्त को आमंत्रित किया था | जिसमें सहेली और छोटे भाई जयाप्रदा और संजय दत्त को छोड़कर उनके बड़के भाई -भौजाई दोनों मंच पर नही पहुंचे | अंत में मुद्दे की बात यह है कि अमर-आज़म दोनों होशियार, वाकपटु , हाजिर जवाब , मुंहफट और अपने विरोधियों का कपड़ा उतारने में माहिर माने जाते हैं | इसलिए आगे आने वाले एपीसोड में दोनों के कामेडी सर्कस से जनता को लुत्फ़ उठाने का अवसर अवश्य मिलेगा | ऐसा राजनैतिक मौसम विभाग के विशेषज्ञों की राय है |
मुनीर अहमद मोमिन
उत्तर-प्रदेश के पहलवान पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कभी दाएं-बाएं रहे स्वभाव से वाक्पटू लेकिन मुंहफट सपा के दो मुंहफटों अमर और आज़म के बीच फिर मुंहजोरई चालू हो गयी है | सपा में आज़म के दुबारा प्रवेश करने से तिलमिलाए अमर ने मुलायम पर धावा बोलते हुए कहा है कि, यदि वह मुंह खोल देंगे तो मुलायम सलाखों के पीछे होंगे | इससे पहले आज़म उन्हें "दलाल और सप्लायर" करार दे चुके हैं | अब अमर सिंह यह पूछना चाहते हैं कि, उन्होंने १४ सालों में मुलायम को क्या सप्लाई किया है | अमर-आज़म की 'डब्ल्यू-डब्ल्यू मुंहफटी कुश्ती' लोकसभा चुनाव के दौरान खूब चली | यहाँ तक कि आज़म ने अमर की महिला सखी जयाप्रदा को खूब निशाने पर रखा | जयाप्रदा, आज़म को अपनी सार्वजनिक सभाओं में भईया बताती रहीं | लेकिन उन्ही भईया पर अपनी अश्लील तस्वीरों/पोस्टरों के बंटवाने का आरोप भी लगाया | नतीजतन चुनाव के बाद अपनी चिर भौजाई जया बच्चन को मिलाकर अमर सिंह ने कसकर जोर लगाकर हईया.... कहा और उन आज़म की अज़मत को सपा से बे-आबरू कर डाला | जो सपा के गठन काल से ही मुलायम की पार्टी के फ्रेम में कथित तौर पर मुस्लिम चेहरा के नाम से विराजमान थे | इस प्रकरण/ फैसले से मुलायम एंड फेमिली खुश नहीं थी | लेकिन अमर, मुलायम पर इतना हावी थे कि, मुलायम परिवार को इसे खामोशी से पचाना ही पड़ा | लेकिन जब परिवार को लगा कि अमर, मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के पुत्र प्रतीक सिंह यादव को अंदरखाने प्रमोट करके अखिलेश यादव से आगे निकालने की गोट बिछा रहे हैं | फिर क्या था इस बार सारे परिवार ने मिलकर नेता जी को इतना चांपा कि उन्हें अमर सिंह को मनोज तिवारी की तरह बिग बॉस से बाहर निकालना ही पड़ा | तब से अमर गाहे -बगाहे अक्सर मुलायम के प्रति कठोर होते रहे हैं | अभी पिछले दिनों पूर्वांचल राज्य के गठन के लिए इलाहाबाद में हुई सभा में अमर ने अपने बड़के भईया अमिताभ , भौजाई जया , सहेली जयाप्रदा और छोटे भाई संजय दत्त को आमंत्रित किया था | जिसमें सहेली और छोटे भाई जयाप्रदा और संजय दत्त को छोड़कर उनके बड़के भाई -भौजाई दोनों मंच पर नही पहुंचे | अंत में मुद्दे की बात यह है कि अमर-आज़म दोनों होशियार, वाकपटु , हाजिर जवाब , मुंहफट और अपने विरोधियों का कपड़ा उतारने में माहिर माने जाते हैं | इसलिए आगे आने वाले एपीसोड में दोनों के कामेडी सर्कस से जनता को लुत्फ़ उठाने का अवसर अवश्य मिलेगा | ऐसा राजनैतिक मौसम विभाग के विशेषज्ञों की राय है |
मुनीर अहमद मोमिन
Saturday, December 4, 2010
मिशन के बदले कमीशनखोरी हो गई है पत्रकारिता
मीडिया का बाजारीकरण नहीं बाजारूपन
वह दिन लद गए जब पत्रकारिता पेशा न होकर मिशन हुआ करता था | आज सरस्वती के इस प्रतिष्ठान पर लक्ष्मी के वाहक उल्लूओं ने कब्ज़ा जमा लिया है | बड़े-बड़े धन्ना सेठों ने अपने उद्योग हित हेतु मीडिया की दुकान खोलकर सरकार अथवा सरकारों पर दबाव बनाकर या चाटुकारिता करके कोटा-परमिट का खेल खेल रहे हैं | इनके हित हेतु ज्यादातर खबरें प्रायोजित हुआ करती हैं | चूंकि मीडिया के ज्यादातर मालिकान धन्नासेठ होते हैं | इसलिए मीडिया पर बाज़ार का असर तो पड़ेगा ही | और जिस पर बाज़ार का असर पड़े उसे बाजारुपन होने से कौन रोक सकता है ? अब यह बात इतिहास की हो गयी है जब बाज़ार को मीडिया नियंत्रित करता था | लेकिन आज बाज़ार मीडिया को नियंत्रित करता है | बड़े- बड़े अखबार समूहों में अब मार्केटिंग एडीटर होने लगे हैं | अब एडीटर के साथ मार्केटिंग शब्द लगे इसका अर्थ क्या ? ये मार्केटिंग एडीटर अखबार के वास्तविक एडीटर पर बहुत भारी पड़ते हैं | क्योंकि इनका नाता ही ख़बरों के सरोकार से न होकर सीधे-सीधे बाजार से होता है | इनका एकमेव काम सरकार और कार्पोरेट सेक्टरों के बीच अपने मालिक के हित की लाबिंग करना होता है | अफ़सोस तो तब होता है जब चुनाव के दौरान एक हे पेज पर एक ही निर्वाचन क्षेत्र के चार-चार, पांच-पांच प्रत्याशी जीत रहे होते हैं | एक बाजारू औरत में भी इतनी नैतिकता होती है कि वह एक वक्त में एक की ही साथी होती है | लेकिन मीडिया का चरित्र उससे भी गया गुजरा होता है | ये एक ही वक्त में एक साथ चार-चार, पांच-पांच लोगों को निपटा देते हैं | क्या इसका कोई जबाब है
मीडिया के अलमबरदारों के पास ? खबरिया चैनलों में अक्सर पांच-दस लोगों को बुलाकर चर्चा कराने या "सीधी-बात" की नौटंकी होती है | लेकिन इसमें बुलाए मेहमानों से उनकी प्रतिक्रिया या राय जानने के बदले ऐसे कार्यक्रमों के होस्ट या एंकर केवल अपनी सोच, मुंहजोरी और ज्ञान ही बघारते हैं | मेहमानों की बिल्कुल सुनते ही नहीं, और न ही उन्हें अपनी बात ढंग से कहने का पूरा मौक़ा देते हैं | बस सवाल-दर-सवाल अपनी ही हांक कर ब्रेक लेते रहते हैं और एकांगी बहस करके केवल अपना नजरिया थोपते हुए सबका जबरन धन्यवाद अदा करके कार्यक्रम का क्रिया-क्रम कर देते हैं | ये पत्रकारिता का कौन सा रूप है? इसे खबरिया चैनलों की कथित महान विद्वत आत्माएं ही बता सकती हैं |
मुनीर अहमद मोमिन
वह दिन लद गए जब पत्रकारिता पेशा न होकर मिशन हुआ करता था | आज सरस्वती के इस प्रतिष्ठान पर लक्ष्मी के वाहक उल्लूओं ने कब्ज़ा जमा लिया है | बड़े-बड़े धन्ना सेठों ने अपने उद्योग हित हेतु मीडिया की दुकान खोलकर सरकार अथवा सरकारों पर दबाव बनाकर या चाटुकारिता करके कोटा-परमिट का खेल खेल रहे हैं | इनके हित हेतु ज्यादातर खबरें प्रायोजित हुआ करती हैं | चूंकि मीडिया के ज्यादातर मालिकान धन्नासेठ होते हैं | इसलिए मीडिया पर बाज़ार का असर तो पड़ेगा ही | और जिस पर बाज़ार का असर पड़े उसे बाजारुपन होने से कौन रोक सकता है ? अब यह बात इतिहास की हो गयी है जब बाज़ार को मीडिया नियंत्रित करता था | लेकिन आज बाज़ार मीडिया को नियंत्रित करता है | बड़े- बड़े अखबार समूहों में अब मार्केटिंग एडीटर होने लगे हैं | अब एडीटर के साथ मार्केटिंग शब्द लगे इसका अर्थ क्या ? ये मार्केटिंग एडीटर अखबार के वास्तविक एडीटर पर बहुत भारी पड़ते हैं | क्योंकि इनका नाता ही ख़बरों के सरोकार से न होकर सीधे-सीधे बाजार से होता है | इनका एकमेव काम सरकार और कार्पोरेट सेक्टरों के बीच अपने मालिक के हित की लाबिंग करना होता है | अफ़सोस तो तब होता है जब चुनाव के दौरान एक हे पेज पर एक ही निर्वाचन क्षेत्र के चार-चार, पांच-पांच प्रत्याशी जीत रहे होते हैं | एक बाजारू औरत में भी इतनी नैतिकता होती है कि वह एक वक्त में एक की ही साथी होती है | लेकिन मीडिया का चरित्र उससे भी गया गुजरा होता है | ये एक ही वक्त में एक साथ चार-चार, पांच-पांच लोगों को निपटा देते हैं | क्या इसका कोई जबाब है
मीडिया के अलमबरदारों के पास ? खबरिया चैनलों में अक्सर पांच-दस लोगों को बुलाकर चर्चा कराने या "सीधी-बात" की नौटंकी होती है | लेकिन इसमें बुलाए मेहमानों से उनकी प्रतिक्रिया या राय जानने के बदले ऐसे कार्यक्रमों के होस्ट या एंकर केवल अपनी सोच, मुंहजोरी और ज्ञान ही बघारते हैं | मेहमानों की बिल्कुल सुनते ही नहीं, और न ही उन्हें अपनी बात ढंग से कहने का पूरा मौक़ा देते हैं | बस सवाल-दर-सवाल अपनी ही हांक कर ब्रेक लेते रहते हैं और एकांगी बहस करके केवल अपना नजरिया थोपते हुए सबका जबरन धन्यवाद अदा करके कार्यक्रम का क्रिया-क्रम कर देते हैं | ये पत्रकारिता का कौन सा रूप है? इसे खबरिया चैनलों की कथित महान विद्वत आत्माएं ही बता सकती हैं |
मुनीर अहमद मोमिन
Friday, December 3, 2010
be lagam: राजदीप जी मीडिया तो कभी से भ्रष्ट है
be lagam: राजदीप जी मीडिया तो कभी से भ्रष्ट है: "मौजूदा मीडिया की सोच : हम करें सो कायदा वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कल एक खबरिया चैनल पर भ्रष्ट मीडिया की पैरवी करते हुए अप..."
राजदीप जी मीडिया तो कभी से भ्रष्ट है
मौजूदा मीडिया की सोच : हम करें सो कायदा
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कल एक खबरिया चैनल पर भ्रष्ट मीडिया की पैरवी करते हुए अपने शब्द जाल/तर्क से मीडिया को रिन अथवा निरमा से धुला झक सफ़ेद बताया | इसमें कोई शक नहीं कि राजदीप सरदेसाई जी एक नामवर, संवेदनशील और पैनी नजर वाले सभ्य व होनहार पत्रकार हैं और मैं स्वंय उनके अनन्य प्रशंसकों में से एक हूँ | लेकिन खबरिया चैनल पर मीडिया के पक्ष में की गयी उनकी वकालत किसी भी तरह किसी भी होशमंद के गले उतरने को तैयार नहीं है | यह तो वही बात हुई कि - " मार पड़ी जब शमशीरों की , महाराज मै नाई हूँ " जब बात आई मीडिया के लोगों की दलाली करने की तो दलाल की जगह लाबिस्ट शब्द ढूढ़ निकाला है | तो भैया मीडिया के माई-बापों लाबिस्ट शब्द दूसरों के लिए क्यों नही ? दूसरे दलाल कहलायें ओर मीडिया वाले दलाली करें तो लाबिस्ट कहलायें | ऐसा शब्दों ओर सोच दोनों का दोगलापन क्यों ? अभी कुछ माह पहले ही "पेड न्यूज" के खिलाफ हिन्दी के मूर्धन्य पत्रकार स्व. प्रभाष जोशी जी के पहल पर चलाए जा रहे अभियान से देश के कितने अखबारों, अखबार समूहों ओर खबरिया चैनलों के मालिक ओर संपादक सहमत हुए थे ? लगभग ढाई सौ सदस्यों वाली एडीटर गिल्ड्स के अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि लगभग ढाई सौ मीडिया के धुरंधरों में से केवल पच्चीस-तीस ही ईमानदारी व दयानतदारी दिखाते हुए "पेड न्यूज" बंद करने के पक्ष में थे | बाकी लगभग सवा दो सौ मीडिया के आकाओं की इस पर बोलती बंद है | मीडिया ने कब दलाली और राजनेताओं सहित नौकरशाहों की पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता नही की ? पिछले दो दशकों से मीडिया के आका व ठेकेदार किसी न किसी राजनेता और किसी न किसी राजनैतिक पार्टी को प्रमोट करने अथवा लांछित करने की भी सुपारी लेते रहे हैं | और बदले में तमाम तरह से उपकृत होते रहे है | आज चिरकुट से चिरकुट मीडिया वाला भी साल में दो अंकों से लेकर तीन अंकों तक की हवाई यात्राओं का लाभ किसी न किसी के द्वारा कटाए टिकट पर लेते रहे हैं | इतना ही नही अपनी औकात से कई गुना तमाम तरह की भौतिक सुख-सुविधाओं सहित राज्यसभा से लेकर विधान परिषद तक में जाने के लिए अनेकों मीडियाकर्मी पत्रकार के बदले चाकरों की भूमिका निभाते आयें हैं | सच तो यह है कि आज देश में मीडिया का कारोबार सबसे ज्यादा लाभकारी साबित हो रहा है | विभिन्न प्रकार के लाइसेंसों सहित विभिन राजनैतिक दलों के चुनाव टिकटों के आवंटन तक मीडियाकर्मी कहाँ अपनी दलाली सारी ! लाबिंग करने से बाज आते हैं ? मेरी निजी राय है कि बरखा दत्त और वीर सिंघवी तो इस लिए कटघरे में खड़े हैं कि उनका राज खुल गया | नही तो मीडिया में ऐसे दत्त और सिंघवी तो एक ढूढों हजार मिलते हैं | जो पकड़ गया वह मुजरिम नहीं तो संत तो है ही | (जारी ...............)
मुनीर अहमद मोमिन
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कल एक खबरिया चैनल पर भ्रष्ट मीडिया की पैरवी करते हुए अपने शब्द जाल/तर्क से मीडिया को रिन अथवा निरमा से धुला झक सफ़ेद बताया | इसमें कोई शक नहीं कि राजदीप सरदेसाई जी एक नामवर, संवेदनशील और पैनी नजर वाले सभ्य व होनहार पत्रकार हैं और मैं स्वंय उनके अनन्य प्रशंसकों में से एक हूँ | लेकिन खबरिया चैनल पर मीडिया के पक्ष में की गयी उनकी वकालत किसी भी तरह किसी भी होशमंद के गले उतरने को तैयार नहीं है | यह तो वही बात हुई कि - " मार पड़ी जब शमशीरों की , महाराज मै नाई हूँ " जब बात आई मीडिया के लोगों की दलाली करने की तो दलाल की जगह लाबिस्ट शब्द ढूढ़ निकाला है | तो भैया मीडिया के माई-बापों लाबिस्ट शब्द दूसरों के लिए क्यों नही ? दूसरे दलाल कहलायें ओर मीडिया वाले दलाली करें तो लाबिस्ट कहलायें | ऐसा शब्दों ओर सोच दोनों का दोगलापन क्यों ? अभी कुछ माह पहले ही "पेड न्यूज" के खिलाफ हिन्दी के मूर्धन्य पत्रकार स्व. प्रभाष जोशी जी के पहल पर चलाए जा रहे अभियान से देश के कितने अखबारों, अखबार समूहों ओर खबरिया चैनलों के मालिक ओर संपादक सहमत हुए थे ? लगभग ढाई सौ सदस्यों वाली एडीटर गिल्ड्स के अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि लगभग ढाई सौ मीडिया के धुरंधरों में से केवल पच्चीस-तीस ही ईमानदारी व दयानतदारी दिखाते हुए "पेड न्यूज" बंद करने के पक्ष में थे | बाकी लगभग सवा दो सौ मीडिया के आकाओं की इस पर बोलती बंद है | मीडिया ने कब दलाली और राजनेताओं सहित नौकरशाहों की पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता नही की ? पिछले दो दशकों से मीडिया के आका व ठेकेदार किसी न किसी राजनेता और किसी न किसी राजनैतिक पार्टी को प्रमोट करने अथवा लांछित करने की भी सुपारी लेते रहे हैं | और बदले में तमाम तरह से उपकृत होते रहे है | आज चिरकुट से चिरकुट मीडिया वाला भी साल में दो अंकों से लेकर तीन अंकों तक की हवाई यात्राओं का लाभ किसी न किसी के द्वारा कटाए टिकट पर लेते रहे हैं | इतना ही नही अपनी औकात से कई गुना तमाम तरह की भौतिक सुख-सुविधाओं सहित राज्यसभा से लेकर विधान परिषद तक में जाने के लिए अनेकों मीडियाकर्मी पत्रकार के बदले चाकरों की भूमिका निभाते आयें हैं | सच तो यह है कि आज देश में मीडिया का कारोबार सबसे ज्यादा लाभकारी साबित हो रहा है | विभिन्न प्रकार के लाइसेंसों सहित विभिन राजनैतिक दलों के चुनाव टिकटों के आवंटन तक मीडियाकर्मी कहाँ अपनी दलाली सारी ! लाबिंग करने से बाज आते हैं ? मेरी निजी राय है कि बरखा दत्त और वीर सिंघवी तो इस लिए कटघरे में खड़े हैं कि उनका राज खुल गया | नही तो मीडिया में ऐसे दत्त और सिंघवी तो एक ढूढों हजार मिलते हैं | जो पकड़ गया वह मुजरिम नहीं तो संत तो है ही | (जारी ...............)
मुनीर अहमद मोमिन
be lagam: मंत्री, मुख्यमंत्री तक खा गया है
be lagam: मंत्री, मुख्यमंत्री तक खा गया है: " करप्सन का बदबू सब में आ गया है ये कैसा दौर आज - कल आ गया है ..."
मंत्री, मुख्यमंत्री तक खा गया है
करप्सन का बदबू सब में आ गया है
मुनीर अहमद मोमिन
ये कैसा दौर आज - कल आ गया है |
भ्रष्टाचार चहुँ ओर छा गया है ||
कहीं टू जी, कहीं आदर्श बनकर |
मंत्री, मुख्यमंत्री तक खा गया है ||
कभी नैनो वाले टाटा की नैना बनकर |
सुप्रीमकोर्ट तक उन्हें दौड़ा गया है ||
क्या मीडिया और क्या सरकारी तंत्र |
करप्सन का बदबू सब में आ गया है ||
सेक्स स्कैंडल का कभी चोला बदलकर |
कितने आईएएस, आईपीएस तक पचा गया है ||
रिश्वत का असर सब पर है " मोमिन " |
जिसे देखो वही बौरा गया है ||
Wednesday, December 1, 2010
be lagam: टाटा की प्राइवेसी को पाइरेसी का चाटा
be lagam: टाटा की प्राइवेसी को पाइरेसी का चाटा: "संगीन साबित हो रहीं है फोन की रंगीन बातें आखिर प्राइवेसी के नाम पर रतन टाटा ने अपनी प्राइवेसी अथवा निजता को लेकर सुप्रीमकोर्ट ..."
टाटा की प्राइवेसी को पाइरेसी का चाटा
संगीन साबित हो रहीं है फोन की रंगीन बातें
आखिर प्राइवेसी के नाम पर रतन टाटा ने अपनी प्राइवेसी अथवा निजता को लेकर सुप्रीमकोर्ट में ठीक उसी तरह की याचिका दायर कर दी है | जैसी याचिका कुछ वर्ष पूर्व बड़े भैया अमिताभ बच्चन के छोटे भैया अमर सिंह और विपाशा वसु जैसी लज्जाशील अभिनेत्रियों के बीच इलू-इलू अथवा रंगीन अथवा संगीन टेलीफोन वार्ता के टेप को सार्वजनिक करने के खिलाफ स्थगन आदेश मांगने के लिए दायर की थी, और माननीय सुप्रीमकोर्ट ने राजेश खन्ना की पूर्व महिला सखा पहले की टीना मुनीम और अबकी टीना अंबानी के पति अनिल अंबानी के लंगोटिया यार परमादरणीय अमर सिंह जी की गुहार को उचित मानते हुए उक्त टेप वार्ता को सार्वजनिक करने या छपने-छपाने पर रोक लगा दी थी | जबकि उक्त टेप वार्ता के कुछ मजेदार अंश टाइम्स समूह सहित हिन्दी और अन्य भाषाई कई अखबारों में छप-छपा चुके थे | इन दिनों नीरा राडिया और रतन टाटा के "बीच" की फोन वार्ता देश में चटखारे बहस का विषय बना हुआ है | नैनो वाले टाटा के उद्योग समूह की नैना बनी राडिया से हुई बात- चीत को टाटा अपनी प्राइवेसी या निजता मानते हुए उसे लीक करने से काफी भन्नाए हुए हैं | और इस कृत्य को वे भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अपनी निजता के अधिकार का हनन मान रहे हैं | वैसे इस देश में निजता हमेशा बड़े लोगों की ही होती है, और यह निजता इतनी बड़ी होती है कि, इसे ढकने के लिए बड़े-बड़े कनात ( तंबू ) भी छोटे पड़ जाते हैं | जिससे इनकी निजता इधर-उधर, दाएं-बाएं या आगे-पीछे यानि कहीं न कहीं से दिखने ही लगती है | हालांकि गुलछर्रे उड़ाते हुए रंगीनी में सराबोर होकर फोन पर चल छैंयां-छैंया, छैंया-छैंया.........करते समय किसी को भी अपनी निजता का लेश मात्र भी ध्यान नही रहता | वह तो निजता की जवानी तब उफान पर आती है | जब निजता की बात सार्वजनिक होने लगती है | और उस कथित निजता वाले की छवि समाज में धूल- धुसरित होने का खतरा पैदा होने का अंदेशा हो जाता है |
इधर मीडिया ने भी नीरा राडिया से अपनी वफादारी साबित करते हुए कड़ी मेहनत के बाद उसके लिए "दलाल" के बदले "लाबीस्ट" नामक शब्द खोज निकला है | धन्य हो मीडिया माता की |
मुनीर अहमद मोमिन
आखिर प्राइवेसी के नाम पर रतन टाटा ने अपनी प्राइवेसी अथवा निजता को लेकर सुप्रीमकोर्ट में ठीक उसी तरह की याचिका दायर कर दी है | जैसी याचिका कुछ वर्ष पूर्व बड़े भैया अमिताभ बच्चन के छोटे भैया अमर सिंह और विपाशा वसु जैसी लज्जाशील अभिनेत्रियों के बीच इलू-इलू अथवा रंगीन अथवा संगीन टेलीफोन वार्ता के टेप को सार्वजनिक करने के खिलाफ स्थगन आदेश मांगने के लिए दायर की थी, और माननीय सुप्रीमकोर्ट ने राजेश खन्ना की पूर्व महिला सखा पहले की टीना मुनीम और अबकी टीना अंबानी के पति अनिल अंबानी के लंगोटिया यार परमादरणीय अमर सिंह जी की गुहार को उचित मानते हुए उक्त टेप वार्ता को सार्वजनिक करने या छपने-छपाने पर रोक लगा दी थी | जबकि उक्त टेप वार्ता के कुछ मजेदार अंश टाइम्स समूह सहित हिन्दी और अन्य भाषाई कई अखबारों में छप-छपा चुके थे | इन दिनों नीरा राडिया और रतन टाटा के "बीच" की फोन वार्ता देश में चटखारे बहस का विषय बना हुआ है | नैनो वाले टाटा के उद्योग समूह की नैना बनी राडिया से हुई बात- चीत को टाटा अपनी प्राइवेसी या निजता मानते हुए उसे लीक करने से काफी भन्नाए हुए हैं | और इस कृत्य को वे भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अपनी निजता के अधिकार का हनन मान रहे हैं | वैसे इस देश में निजता हमेशा बड़े लोगों की ही होती है, और यह निजता इतनी बड़ी होती है कि, इसे ढकने के लिए बड़े-बड़े कनात ( तंबू ) भी छोटे पड़ जाते हैं | जिससे इनकी निजता इधर-उधर, दाएं-बाएं या आगे-पीछे यानि कहीं न कहीं से दिखने ही लगती है | हालांकि गुलछर्रे उड़ाते हुए रंगीनी में सराबोर होकर फोन पर चल छैंयां-छैंया, छैंया-छैंया.........करते समय किसी को भी अपनी निजता का लेश मात्र भी ध्यान नही रहता | वह तो निजता की जवानी तब उफान पर आती है | जब निजता की बात सार्वजनिक होने लगती है | और उस कथित निजता वाले की छवि समाज में धूल- धुसरित होने का खतरा पैदा होने का अंदेशा हो जाता है |
इधर मीडिया ने भी नीरा राडिया से अपनी वफादारी साबित करते हुए कड़ी मेहनत के बाद उसके लिए "दलाल" के बदले "लाबीस्ट" नामक शब्द खोज निकला है | धन्य हो मीडिया माता की |
मुनीर अहमद मोमिन
Subscribe to:
Comments (Atom)