आज़ादी के बाद भी हिन्दी वालों के साथ सतत साजिश
यूपीएससी ने सिविल सर्विसेस, प्रीलिम्स २०११ के लिए जो नया पाठ्यक्रम घोषित किया है | उसमें अंग्रेजी विषय को अनिवार्य बना दिया गया है | अभी तक इसके दो प्रश्न पत्र होते थे | एक सामान्य ज्ञान का और दूसरा किसी ऐच्छिक विषय का जिसे विद्यार्थी अपनी रुचि के अनुसार चुनता था | नई परीक्षा योजना के तहत इस विषय वाले प्रश्न पत्र के स्थान पर दो सौ अंको का एक नया प्रश्न पत्र होगा | जिसमें से ३० अंक अंग्रेजी समझने की कुशलता के होंगे | हिन्दी व भारतीय भाषाओं को इसमें कोई स्थान नहीं होगा | यह प्रश्न पत्र "क्वालीफाइंग" नहीं होगा | बल्कि इसके अंक 'मेरिट' में जोड़े जायेंगे | जहां एक-एक अंक निर्णायक सिद्ध होता है | स्पष्ट है कि इस योजना द्वारा अंग्रेजी भाषा को अनिवार्य रूप से थोपा जा रहा है और हिन्दी तथा अन्य भाषाओं के लिए अनंत काल के लिए दरवाजे बंद किये जा रहे हैं |
संघ लोकसेवा आयोग के वार्षिक प्रतिवेदन बताते हैं कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं के माध्यम से बहुत बड़ी संखा में परीक्षार्थी उत्तीर्ण हो रहे हैं और यह संख्या दिनों-दिन निरंतर बढ़ रही है | इनकी संख्या अंग्रेजी माध्यम वालों के बराबर पहुँच रही है | एक जानकारी के मुताबिक़ २००६ के मुख्य परीक्षा में हिन्दी माध्यम से ३३०७, अन्य भारतीय भाषाओं से २५० तथा अंग्रेजी माध्यम से ३९३७ परीक्षार्थी बैठे थे | २००७ की मुख्य परीक्षा में हिन्दी माध्यम के ३७५१, अन्य भारतीय भाषाओं से ३१८ तथा अंग्रेजी माध्यम से ४८१५ परीक्षार्थी तथा इसी तरह २००८ की मुख्य परीक्षा में हिन्दी माध्यम से ५११७, अन्य भारतीय भाषाओं से ३८१ तथा अंग्रेजी माध्यम से ५८२२ परीक्षार्थी बैठे थे | यह आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षार्थियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है | ऐसे में षड्यंत्र पूर्वक किया जा रहा यह परिवर्तन वर्ग विशेष के लाभ के लिए है | और यह कोठारी समिति द्वारा प्रतिपादित वैज्ञानिक और सामाजिक सिद्धांतों के विपरीत है |
यहाँ पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि १८ जनवरी १९६८ को संसद के दोनों सदनों में सर्व सम्मत में एक संकल्प एफ.५/८/६५ राष्ट्र भाषा पारित किया था | जिसमें यह संकल्पित था कि उन विशेष सेवाओं अथवा पदों को छोड़कर जिनके लिए ऐसी किसी सेवा अथवा पद के लिए कर्तव्यों के संतोषजनक निष्पादन हेतु केवल अंग्रेजी अथवा केवल हिन्दी अथवा दोनों, जैसी कि स्थित हो, का उच्च स्तर का ज्ञान आवश्यक समझा जाय | संघ सेवाओं अथवा पदों के लिए भर्ती करने हेतु उम्मीदवारों के चयन के समय हिन्दी अथवा अंग्रेजी में से किसी एक का ज्ञान अनिवार्यतः अपेक्षित होगा |
१९७७ में डॉ. दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित हुआ | जिसने संघ लोक सेवा आयोग तथा कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग आदि के विचारों को ध्यान में रखते हुए सर्वसम्मत से यह सिफारिश की, कि परीक्षा का माध्यम भारत की प्रमुख भाषाओं में से कोई भी हो सकती है | १९७९ में संघ लोक सेवा आयोग ने इन सिफारिशों को क्रियान्वित किया और भारतीय प्रशासनिक आदि सेवाओं की परीक्षा के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में से किसी भी भारतीय भाषा को परीक्षा का माध्यम बनाने की छूट दी गयी | इस परिवर्तन का लाभ उन उम्मीदवारों को मिला जो महानगरों से बाहर रहते थे या अंग्रेजी के महंगे विद्यालयों में नही पढ़ सकते थे | उनके पास प्रतिभा, गुण, योग्यता थी किन्तु अंग्रेजी माध्यम ने उन्हें बाहर कर रखा था | इन सिफारिशों को लागू हुए ३० वर्ष हो चुके हैं | इस अवधि में यह कभी नही सुनायी पड़ा कि भारतीय भाषाओं के माध्यम से जो प्रशासक आ रहे हैं, वे किसी भी तरह अंग्रेजी माध्यम वालों से कमतर हैं | यह स्थित 'मैकाले' के "मानस पुत्रों" को सहन नहीं हो रही है | अब चुपके से एक दांव लगाकर कहा जा रहा है कि सेवा में सुधार किया जा रहा है |
यहाँ इस बात का उल्लेख अति आवश्यक है कि आज तक किसी भी अध्ययन या अनुसंधान से ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका है कि प्रवेश परीक्षा के स्तर पर अंग्रेजी का ज्ञान होना भावी प्रशासन के लिए परमावश्यक गुण है |
मुनीर अहमद मोमिन
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