Tuesday, March 22, 2011

पत्रकारिता का एक ध्रुव तारा : आलोक तोमर

 पत्रकारिता जगत से आलोक का लोप  नितांत दुखद !
                              हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी  पे रोती है |
                              बड़ी मुद्दत से होता  है चमन में दीदावर पैदा ||
आज ऐसा प्रतीत होता है कि किसी शायर ने उक्त पंक्तियाँ आलोक तोमर के लिए ही लिखा था | उस आलोक के लिए जिसने खासकर हिन्दी पत्रकारिता को एक नया आयाम व तेवर बख्शा | पत्रकारिता के क्षितिज का यही  चमकदार ध्रुव तारा अब अन्तरिक्ष में विलीन हो गया | 
      जिद्दी, अक्खड़, स्वाभिमानी और कुशाग्र बुद्धि-विवेक के स्वामी आलोक तोमर केवल एक पत्रकार ही नहीं  अपितु अपने आप में एक पूरा का पूरा संस्थान थे | मेरे जैसे न जाने कितने पत्रकारों के ' आदर्श ' आलोक ने न तो कभी कलम से समझौता किया और न ही गलतियाँ करने वालों को रगड़ने से कभी बाज आये | सामने चाहे जो भी हो उनके दुखद निधन पर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अपने शोक संदेश में कहा है कि आलोक तोमर के निधन से पत्रकारिता जगत का रिक्त हुआ स्थान जल्दी भरा नहीं जा सकेगा | इसे मैं  पूर्णतः सत्य नहीं मानता और न ही इससे सहमत हूँ |  क्योंकि मेरी व्यक्तिगत राय है कि यह एक अपूरणीय क्षति है , जिसे कभी भी भरा नहीं जा सकता | यह कहना तो अतिशयोक्ति जैसा भले लगता है  कि दूसरा आलोक पैदा नहीं हो सकता | लेकिन आज के पत्रकारिता के माहौल को देखते हुए यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि कदापि नहीं, हरगिज नहीं अब दूसरा आलोक पैदा नहीं हो सकता | जिसके लेखनी में ब्लेड जैसी चीरने वाली धार भी हो और वह मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों से भी लबरेज हो |
     'फेसबुक' पर किसी साथी ने लिखा है कि 'जनसता' को छोड़कर किसी ने आलोक के निधन की खबर नहीं  छापी अफ़सोस ! सद अफ़सोस ! यह उस पत्रकार के लिए जिसकी खबरें लोगों को खबरदार करते हुए खबरों तक पहुँचती थीं | 'जनसत्ता' का नारा था कि " सबकी खबर ले, सबको खबर दे " यह नारा आलोक तोमर में पूरी तरह अक्षरशः समाहित था | किसी अखबार में न छपने से आलोक तोमर की आत्मा या उनके चाहने वालों पर कुछ फर्क नहीं पड़ता | बल्कि इससे स्वयं मीडिया जगत की खुद की सड़ी और घृणित  नीयत और सोच ही उजागर हुयी है कि सामाजिक सरोकारों का दंभ भरकर खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताने वाली मीडिया कितनी बाजारू, संवेदनहीन और गई गुजरी हो गयी है |
         मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में १९६० में जन्में आलोक तोमर ने हिन्दी पत्रकारिता में अपनी रिपोर्टिंग के जरिये पत्रकारीय भाषा को एक नया तेवर दिया | १९८४ के सिख विरोधी दंगे की मानवीय संवेदनाओं से भरी रिपोर्टिंग द्वारा समूचे पत्रकारिता जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई और अपना एक अलग मुकाम पैदा किया | पत्रकारिता के लिए पूरी तरह समर्पित सरस्वती के ऐसे सच्चे सपूत को शत-शत नमन !!!
                                                       मुनीर अहमद मोमिन  

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