ध्वस्त होता यंग इंडिया का सपना
यूं तो सभी कहते हैं कि किसी भी देश के नौजवान उस देश के भविष्य होते हैं | अंग्रेज़ी साहित्य के प्रसिद्ध कवि
विलियम वर्डस्वर्थ ने भी कहा है कि "ए चाइल्ड इज फादर ऑफ़ द मैन" लेकिन यही कथित फादर ऑफ़ मैन या देश का भविष्य कही जाने वाली भारतीय किशोरों की पीढ़ी के शिक्षा और स्वास्थ्य का कितना बुरा हाल है यह कोई ढकी छुपी बात नहीं है | यहाँ यह बताना जरूरी है कि हमारे देश में युवाओं की संख्या पूरे विश्व में सबसे अधिक है | लेकिन आज के इस भौतिकवादी युग में जैसे-जैसे जीवन में सुख सुविधाओं की बढ़ोत्तरी हो रही है | वैसे-वैसे युवाओं की जटिलताएं भी बढती जा रही हैं |
संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्वयं सेवी संस्था 'यूनीसेफ' के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में किशोरों के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में बहुत खराब स्थिति है | भारत की यह स्थिति अफ्रीका के अनेक पिछड़े देशों से भी कई गुना अधिक गई गुजरी है | मालूम हो कि देश की कुल आबादी का २५ फीसदी यानि एक चौथाई हिस्सा ११ से १९ वर्ष के युवाओं का है | इस आयु वर्ग में ५६ फीसदी लडकियाँ और ३० फीसदी लडके अपोषण और कुपोषण का शिकार हैं | इनमें से ४० प्रतिशत शिक्षा से वंचित हैं | होश संभालते ही माँ-बाप द्वारा उन्हें काम पर लगा दिया जाता है | भारत में बाल मजदूरी कानूनन अपराध घोषित किये जाने के बावजूद भारी संख्या में बच्चे माँ-बाप की लाचारी के चलते एकदम बिपरीत परिस्थितियों में घरों, दुकानों और छोटे-मोटे कारखानों में काम करने को मजबूर होते हैं |
कई बार तो ऐसा भी होता है कि बच्चा पढ़ना चाहता है, पर माँ-बाप उन्हें काम करने के लिए मजबूर करते हैं | अक्सर इन बच्चों को ऐसी हालत में और ऐसे काम करने पड़ते हैं जो इस उम्र में उन्हें नही करना चाहिए | इनमें लडकियों की हालत तो और भी बदतर है | लगभग ४५ फीसदी लडकियों की शादी १८ वर्ष से कम आयु में ही कर दी जाती है | उनमें से ज्यादातर लडकियां कम उम्र में ही माँ बन जाती हैं | गरीबी और अज्ञानता के चलते उचित देखभाल के अभाव में उनमें से अधिकाँश की प्रसव के दौरान मौत भी हो जाती है | 'यूनीसेफ' की यह रिपोर्ट उन लोगों के मुंह पर ताला लगाने के लिए पर्याप्त है | जो युवा शक्ति का गुणगान करते नहीं थकते |
भारत की समस्या यह है कि जब देश के युवाओं की बात आती है तो स्वस्थ और सजे-धजे शहरी मध्यम वर्ग के युवक-युवतियों का चित्र पेश किया जाता है और इस चित्र को देखकर ही सारे निष्कर्ष निकाले जाते हैं | कोई यह समझने के लिए तैयार नही है कि सम्पन्न वर्ग के मुट्ठी भर युवाओं-किसानों के बल पर देश का भविष्य नही संवारा जा सकता है | युवाओं का सबसे बड़ा वर्ग गाँवों में रहता है | जिसके लिए जिन्दगी के छोटे- मोटे सुख भी मिलने कठिन होते हैं | उनके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा की मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नही है | ऐसे नौजवान देश के निर्माण में भला क्या योगदान दे सकते हैं ? इन युवाओं की सारी ताकत तो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में ही खप जाती है | उससे बाहर निकलकर देश के विकास और प्रगति के बारे में सोचने का अवकाश ही उन्हें नही मिलता | आज हालत यह है कि ११ वर्ष से १३ वर्ष के किशोरों की स्कूलों में उपस्थिति ८० प्रतिशत ही होती है | जो १७ वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते ६४ प्रतिशत ही रह जाती है | हमारी शिक्षा व्यवस्था में इतनी बड़ी खामी है कि वंचित वर्ग आधुनिक और रोजगार केन्द्रित शिक्षा तक पहुँच पाता है |
पहले उन्हें स्पर्धा में उतरने लायक तो बनाओ | तब न उस समान अवसर का लाभ वे ले सकेंगे | क्योंकि इस वर्ग को जैसे-तैसे जो शिक्षा प्राप्त होती है उससे उनके जीवन-निर्वाह की कोई गारंटी नहीं मिलती | यदि युवा वर्ग को आरंभ से ही हर स्तर पर समान अवसर मिले तो वे विकास की प्रक्रिया में पूरी क्षमता के साथ जुड़ सकते हैं | इसके लिए जरूरी है कि विकास की प्रक्रिया विकेन्द्रित हो और उसके अंतर्गत ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों को समेट लिया जाय | तमाम सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों को कागज से उतार कर अमल में लाया जाय | ताकि सामान्य लोगों को उनका लाभ मिल सके | इन सभी कदमों के बिना "यंग इंडिया" यानि कि युवा भारत की बातें व्यर्थ ही रहेंगी |
मुनीर अहमद मोमिन
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