Tuesday, March 29, 2011

be lagam: भावी पीढ़ी के बर्वादी का जिम्मेदार कौन ?

be lagam: भावी पीढ़ी के बर्वादी का जिम्मेदार कौन ?: " ध्वस्त होता यंग इंडिया का सपना यूं तो सभी कहते हैं कि किसी भी देश ..."

भावी पीढ़ी के बर्वादी का जिम्मेदार कौन ?

          ध्वस्त होता यंग इंडिया का सपना 
     
    यूं तो सभी कहते हैं कि किसी भी देश के नौजवान उस देश के भविष्य होते हैं | अंग्रेज़ी साहित्य के प्रसिद्ध कवि
 विलियम वर्डस्वर्थ ने भी कहा है कि "ए चाइल्ड इज फादर ऑफ़ द मैन" लेकिन यही कथित फादर ऑफ़ मैन या देश का भविष्य कही जाने वाली भारतीय किशोरों की पीढ़ी के शिक्षा और स्वास्थ्य का कितना बुरा हाल है यह कोई ढकी छुपी  बात नहीं है | यहाँ यह बताना जरूरी है कि हमारे देश में युवाओं की संख्या पूरे विश्व में सबसे अधिक है | लेकिन आज के इस भौतिकवादी युग में जैसे-जैसे जीवन में सुख सुविधाओं की बढ़ोत्तरी हो रही है | वैसे-वैसे युवाओं की जटिलताएं भी बढती जा रही हैं | 
     संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्वयं सेवी संस्था 'यूनीसेफ' के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में किशोरों के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में बहुत खराब स्थिति है | भारत की यह स्थिति अफ्रीका के अनेक पिछड़े देशों से भी कई गुना अधिक गई गुजरी है | मालूम हो कि देश की कुल आबादी का २५ फीसदी यानि एक चौथाई हिस्सा ११ से १९ वर्ष के युवाओं का है | इस आयु वर्ग में ५६ फीसदी लडकियाँ और ३० फीसदी लडके अपोषण और कुपोषण का शिकार हैं | इनमें से ४० प्रतिशत शिक्षा से वंचित हैं | होश संभालते ही माँ-बाप द्वारा उन्हें काम पर लगा दिया जाता है | भारत में बाल मजदूरी कानूनन अपराध घोषित किये जाने के बावजूद भारी संख्या में बच्चे माँ-बाप की लाचारी के चलते एकदम बिपरीत परिस्थितियों में घरों, दुकानों और छोटे-मोटे कारखानों में काम करने को मजबूर होते हैं |
     कई बार तो ऐसा भी होता है कि बच्चा पढ़ना चाहता है, पर माँ-बाप उन्हें काम करने के लिए मजबूर करते हैं | अक्सर इन बच्चों को ऐसी हालत में और ऐसे काम करने पड़ते हैं जो इस उम्र में उन्हें नही करना चाहिए | इनमें लडकियों की हालत तो और भी बदतर है | लगभग ४५ फीसदी लडकियों की शादी १८ वर्ष से कम आयु में ही कर दी जाती है | उनमें से ज्यादातर लडकियां कम उम्र में ही माँ बन जाती हैं | गरीबी और अज्ञानता के चलते उचित देखभाल के अभाव में उनमें से अधिकाँश की प्रसव के दौरान मौत भी हो जाती है | 'यूनीसेफ' की यह रिपोर्ट उन लोगों के मुंह पर ताला लगाने के लिए पर्याप्त है | जो युवा शक्ति का गुणगान करते नहीं थकते | 
        भारत की समस्या यह है कि जब देश के युवाओं की बात आती है तो स्वस्थ और सजे-धजे शहरी मध्यम वर्ग के युवक-युवतियों का चित्र पेश किया जाता है और इस चित्र को देखकर ही सारे निष्कर्ष निकाले जाते हैं | कोई यह समझने के लिए तैयार नही है कि सम्पन्न वर्ग के मुट्ठी भर युवाओं-किसानों के बल पर देश का भविष्य नही संवारा जा सकता है | युवाओं का सबसे बड़ा वर्ग गाँवों में रहता है | जिसके लिए जिन्दगी के छोटे- मोटे सुख भी मिलने कठिन होते हैं | उनके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा की मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नही है | ऐसे नौजवान देश के निर्माण में भला क्या योगदान दे सकते हैं ?  इन युवाओं की सारी ताकत तो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में ही खप जाती है | उससे बाहर निकलकर देश के विकास और प्रगति के बारे में सोचने का अवकाश  ही उन्हें नही मिलता | आज हालत यह है कि ११ वर्ष से १३ वर्ष के किशोरों की स्कूलों में उपस्थिति ८० प्रतिशत ही  होती है | जो १७ वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते ६४ प्रतिशत ही रह जाती है | हमारी शिक्षा व्यवस्था में इतनी बड़ी खामी है कि वंचित वर्ग आधुनिक और रोजगार केन्द्रित शिक्षा तक पहुँच पाता है | 
    पहले उन्हें स्पर्धा में उतरने लायक तो बनाओ | तब न उस समान अवसर का लाभ वे ले सकेंगे | क्योंकि इस वर्ग को जैसे-तैसे जो शिक्षा प्राप्त होती है उससे उनके जीवन-निर्वाह की कोई गारंटी नहीं मिलती | यदि युवा वर्ग को आरंभ से ही हर स्तर पर समान अवसर मिले तो वे विकास की प्रक्रिया में पूरी क्षमता के साथ जुड़ सकते हैं | इसके लिए जरूरी है कि विकास की प्रक्रिया विकेन्द्रित हो और उसके अंतर्गत ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों को समेट लिया जाय | तमाम सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों को कागज से उतार कर अमल में लाया जाय | ताकि सामान्य लोगों को उनका लाभ मिल सके | इन सभी कदमों के बिना "यंग इंडिया" यानि कि युवा भारत की बातें व्यर्थ ही रहेंगी |
                                                   मुनीर अहमद मोमिन       

Sunday, March 27, 2011

be lagam: आखिर हिंदी देश के माथे की बिंदी कब बनेगी ?

be lagam: आखिर हिंदी देश के माथे की बिंदी कब बनेगी ?: " आज़ादी के बाद भी हिन्दी वालों के साथ सतत साजिश यूपीएससी ने सिविल सर्विसेस, प्रीलिम्स २०११ के लिए..."

आखिर हिंदी देश के माथे की बिंदी कब बनेगी ?

      आज़ादी के बाद भी हिन्दी वालों के साथ सतत साजिश
    यूपीएससी ने सिविल सर्विसेस, प्रीलिम्स २०११ के लिए जो नया पाठ्यक्रम घोषित किया है | उसमें अंग्रेजी विषय को अनिवार्य बना दिया गया है | अभी तक इसके दो प्रश्न पत्र होते थे | एक सामान्य ज्ञान का और दूसरा किसी ऐच्छिक विषय का जिसे विद्यार्थी  अपनी रुचि के अनुसार चुनता था | नई परीक्षा योजना के तहत इस विषय वाले प्रश्न पत्र के स्थान पर दो सौ अंको का एक नया प्रश्न पत्र होगा | जिसमें से ३० अंक अंग्रेजी समझने की कुशलता के होंगे | हिन्दी व भारतीय भाषाओं को इसमें कोई स्थान नहीं होगा | यह प्रश्न पत्र "क्वालीफाइंग" नहीं होगा | बल्कि इसके अंक 'मेरिट' में जोड़े जायेंगे | जहां एक-एक अंक निर्णायक सिद्ध होता है | स्पष्ट है कि इस योजना द्वारा अंग्रेजी भाषा को अनिवार्य रूप से थोपा जा रहा है और हिन्दी तथा अन्य भाषाओं के लिए अनंत काल के लिए दरवाजे बंद किये जा रहे हैं | 
      संघ लोकसेवा आयोग के वार्षिक प्रतिवेदन बताते हैं कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं के माध्यम से बहुत बड़ी संखा में परीक्षार्थी उत्तीर्ण हो रहे हैं और यह संख्या दिनों-दिन निरंतर बढ़ रही है | इनकी संख्या अंग्रेजी माध्यम वालों के बराबर पहुँच रही है | एक जानकारी के मुताबिक़ २००६ के मुख्य परीक्षा में हिन्दी माध्यम से ३३०७, अन्य भारतीय भाषाओं से २५० तथा अंग्रेजी माध्यम से ३९३७  परीक्षार्थी बैठे थे | २००७ की मुख्य परीक्षा में हिन्दी माध्यम के ३७५१, अन्य भारतीय भाषाओं से ३१८ तथा अंग्रेजी माध्यम से ४८१५ परीक्षार्थी तथा इसी तरह २००८ की मुख्य परीक्षा में हिन्दी माध्यम से ५११७, अन्य भारतीय भाषाओं से ३८१ तथा अंग्रेजी माध्यम से ५८२२ परीक्षार्थी बैठे थे | यह आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षार्थियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है | ऐसे में षड्यंत्र पूर्वक किया जा रहा यह परिवर्तन वर्ग विशेष के लाभ के लिए है | और यह कोठारी समिति द्वारा प्रतिपादित वैज्ञानिक और सामाजिक सिद्धांतों के विपरीत है | 
       यहाँ पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि १८ जनवरी १९६८ को संसद के दोनों सदनों में सर्व सम्मत में एक संकल्प एफ.५/८/६५ राष्ट्र भाषा पारित किया था | जिसमें यह संकल्पित था कि उन विशेष सेवाओं अथवा पदों को छोड़कर जिनके  लिए ऐसी किसी सेवा अथवा पद के लिए कर्तव्यों के संतोषजनक निष्पादन हेतु केवल अंग्रेजी अथवा केवल हिन्दी अथवा दोनों, जैसी कि स्थित हो, का उच्च स्तर का ज्ञान आवश्यक समझा जाय | संघ सेवाओं अथवा पदों के लिए भर्ती करने हेतु उम्मीदवारों के चयन के समय हिन्दी अथवा अंग्रेजी में से किसी एक का ज्ञान अनिवार्यतः अपेक्षित होगा |
   १९७७ में डॉ. दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित हुआ | जिसने संघ लोक सेवा आयोग तथा कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग आदि के विचारों को ध्यान में रखते हुए सर्वसम्मत से यह सिफारिश की, कि परीक्षा का माध्यम भारत की प्रमुख भाषाओं में से कोई भी हो सकती है | १९७९ में संघ लोक सेवा आयोग ने इन सिफारिशों को क्रियान्वित किया और भारतीय प्रशासनिक आदि सेवाओं की परीक्षा के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में से किसी भी भारतीय भाषा को परीक्षा का माध्यम बनाने की छूट दी गयी | इस परिवर्तन का लाभ उन उम्मीदवारों को मिला जो महानगरों से बाहर रहते थे या अंग्रेजी के महंगे विद्यालयों में नही पढ़ सकते थे | उनके पास प्रतिभा, गुण, योग्यता थी किन्तु अंग्रेजी माध्यम ने उन्हें बाहर कर रखा था | इन सिफारिशों को लागू हुए ३० वर्ष हो चुके हैं | इस अवधि में यह कभी नही सुनायी पड़ा कि भारतीय भाषाओं के माध्यम से जो  प्रशासक आ रहे हैं, वे किसी भी तरह अंग्रेजी माध्यम वालों से कमतर हैं | यह स्थित 'मैकाले' के "मानस पुत्रों" को सहन नहीं हो रही है | अब चुपके से एक दांव लगाकर कहा जा रहा है कि सेवा में सुधार किया जा रहा है | 
      यहाँ  इस बात का उल्लेख अति आवश्यक है कि आज तक किसी भी अध्ययन या अनुसंधान से ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका है कि प्रवेश परीक्षा के स्तर पर अंग्रेजी का ज्ञान होना भावी प्रशासन के लिए परमावश्यक गुण है |  
                                                                       मुनीर अहमद मोमिन  

be lagam: ढीला होता जा रहा है शादी नामक गाँठ का बंधन

be lagam: ढीला होता जा रहा है शादी नामक गाँठ का बंधन: "चट-मंगनी, पट-विवाह, झट-तलाक आज के आधुनिक और भौतिकवादी दौर में प्रेम विवाह के चलन का ग्राफ लगातार आसमान छूता जा रहा है | हमा..."

ढीला होता जा रहा है शादी नामक गाँठ का बंधन

चट-मंगनी, पट-विवाह, झट-तलाक  
 आज के आधुनिक और भौतिकवादी दौर में प्रेम विवाह के चलन का ग्राफ लगातार आसमान छूता जा रहा है | हमारा समाज आगे बढ़ रहा है, यह एक अच्छी पहल है |  लेकिन इसके साथ ही साथ समाज में अनेकानेक बुराइयां भी पनप रही हैं | जिससे  हमारे देश की सभ्यता व संस्कृति दिनों-दिन रसातल की ओर भी जा रही है | लोगों का अब विवाह जैसे पवित्र रिश्ते से विश्वास उठता जा रहा है | शादी या प्यार जो कभी दो दिलों का अटूट बंधन कहलाता था | इसका स्थान महज मौज-मस्ती लेता जा रहा है | कुल मिलाकर समाज में परंपरा व पारिवारिक संस्था के टूटने का असर शादी नाम संस्था को तेजी से कमजोर कर रहा है | ग्लोबल स्तर पर अब लोग ऐसे बंधन व दबावों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं | जिन्हें समाज ने उन पर मढ़ दिया हो | व्यवसायिक, जीवन मूल्य, शिक्षा, जॉब के अवसर और महिलाओं की बदलती प्राथमिकताएं धीरे-धीरे सात फेरों के सनातन "कंसेप्ट" को धुंधला कर रहीं है | 
     नेशनल स्टेटिक्स के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका व इंग्लैंड में बच्चे पैदा करने के लिए शादी गैर जरूरी है | इस तरह अमेरिका में बिना शादी के पैदा होने वाले बच्चों की संख्या ४२ प्रतिशत है | जबकि यूके में बिना विवाह के पैदा होने वाले बच्चों की संख्या तकरीबन आधा है | इस तरह पारंपरिक परिवार व्यवस्था के टूटने से शादी के बिना बच्चे पैदा होने का चलन बढ़ा है | जिसके फलस्वरूप ऐसे बच्चे तरह-तरह के कष्ट झेलने को मजबूर हो रहे हैं, जिनके माता-पिता उन्हें शादी से पहले दुनिया में लाये | आंकड़े के मुताबिक़ यूके में १९७६ के दौरान अवैध बच्चे समाज में 'टैबू' माने जाते थे | उस समय नौ प्रतिशत बच्चे शादी के बिना पैदा होते थे | अब उनकी संखा बढ़कर ४६ प्रतिशत हो गयी है |
     इसी तरह अमेरिका में जब लिंडन जानसन ने "वार ऑफ़ पावर्टी" को लांच किया था | तब वहां ९३ प्रतिशत बच्चे शादी-शुदा माँ-बाप से पैदा हुए थे | वहीं २००९ तक यह आंकडा गिरकर ५८ प्रतिशत हो गया है | हालांकि यह पाया गया है कि शादी रूपी "फैमिली सेट-अप" के बिना जिन बच्चों की परवरिश हो रही है, वे ज्यादा कष्ट झेल रहे हैं | लेकिन शादी के बिना माँ बनना कई महिलाओं की जिन्दगी में मील का पत्थर साबित हुआ है | यूके में जहाँ शादी की औसत उम्र ३३.८ हो गयी है | वहीं बच्चा पैदा करने की औसत उम्र २९.४ है | 
    'लिव इन रिलेशन' में ही बच्चे पैदा करने का 'ट्रेंड' अब भारत में भी दिखाई देने लगा है | यहाँ के मनोचिकित्सकों व समाजशास्त्रियों का मानना है कि अब भारत में भी ४०वां व ५०वां वसंत देख चुकी महिलाएं भी अपनी भावनात्मक, शारीरिक और सामाजिक जरूरतों को पूरा करने के लिए शादी के फैंसले ले रही हैं | अगर इन्हें इनकी पसंद का साथी मिलता है, तो वे न तो उम्र की परवाह कर रही हैं और न ही समाज का कोई डर उन्हें सता रहा है | इसके अलावा भी कुछ लोग जीवन में व्याप्त बोरियत को मिटाने के लिए या कुछ नया व 'एक्साइटिंग' करने के लिए भी 'इलू-इलू' का 'गेम प्लान' कर रहे हैं  |
                                                                                                       मुनीर अहमद मोमिन 
                                                                                                                                                                                                                          

Tuesday, March 22, 2011

पत्रकारिता का एक ध्रुव तारा : आलोक तोमर

 पत्रकारिता जगत से आलोक का लोप  नितांत दुखद !
                              हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी  पे रोती है |
                              बड़ी मुद्दत से होता  है चमन में दीदावर पैदा ||
आज ऐसा प्रतीत होता है कि किसी शायर ने उक्त पंक्तियाँ आलोक तोमर के लिए ही लिखा था | उस आलोक के लिए जिसने खासकर हिन्दी पत्रकारिता को एक नया आयाम व तेवर बख्शा | पत्रकारिता के क्षितिज का यही  चमकदार ध्रुव तारा अब अन्तरिक्ष में विलीन हो गया | 
      जिद्दी, अक्खड़, स्वाभिमानी और कुशाग्र बुद्धि-विवेक के स्वामी आलोक तोमर केवल एक पत्रकार ही नहीं  अपितु अपने आप में एक पूरा का पूरा संस्थान थे | मेरे जैसे न जाने कितने पत्रकारों के ' आदर्श ' आलोक ने न तो कभी कलम से समझौता किया और न ही गलतियाँ करने वालों को रगड़ने से कभी बाज आये | सामने चाहे जो भी हो उनके दुखद निधन पर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अपने शोक संदेश में कहा है कि आलोक तोमर के निधन से पत्रकारिता जगत का रिक्त हुआ स्थान जल्दी भरा नहीं जा सकेगा | इसे मैं  पूर्णतः सत्य नहीं मानता और न ही इससे सहमत हूँ |  क्योंकि मेरी व्यक्तिगत राय है कि यह एक अपूरणीय क्षति है , जिसे कभी भी भरा नहीं जा सकता | यह कहना तो अतिशयोक्ति जैसा भले लगता है  कि दूसरा आलोक पैदा नहीं हो सकता | लेकिन आज के पत्रकारिता के माहौल को देखते हुए यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि कदापि नहीं, हरगिज नहीं अब दूसरा आलोक पैदा नहीं हो सकता | जिसके लेखनी में ब्लेड जैसी चीरने वाली धार भी हो और वह मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों से भी लबरेज हो |
     'फेसबुक' पर किसी साथी ने लिखा है कि 'जनसता' को छोड़कर किसी ने आलोक के निधन की खबर नहीं  छापी अफ़सोस ! सद अफ़सोस ! यह उस पत्रकार के लिए जिसकी खबरें लोगों को खबरदार करते हुए खबरों तक पहुँचती थीं | 'जनसत्ता' का नारा था कि " सबकी खबर ले, सबको खबर दे " यह नारा आलोक तोमर में पूरी तरह अक्षरशः समाहित था | किसी अखबार में न छपने से आलोक तोमर की आत्मा या उनके चाहने वालों पर कुछ फर्क नहीं पड़ता | बल्कि इससे स्वयं मीडिया जगत की खुद की सड़ी और घृणित  नीयत और सोच ही उजागर हुयी है कि सामाजिक सरोकारों का दंभ भरकर खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताने वाली मीडिया कितनी बाजारू, संवेदनहीन और गई गुजरी हो गयी है |
         मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में १९६० में जन्में आलोक तोमर ने हिन्दी पत्रकारिता में अपनी रिपोर्टिंग के जरिये पत्रकारीय भाषा को एक नया तेवर दिया | १९८४ के सिख विरोधी दंगे की मानवीय संवेदनाओं से भरी रिपोर्टिंग द्वारा समूचे पत्रकारिता जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई और अपना एक अलग मुकाम पैदा किया | पत्रकारिता के लिए पूरी तरह समर्पित सरस्वती के ऐसे सच्चे सपूत को शत-शत नमन !!!
                                                       मुनीर अहमद मोमिन