Wednesday, May 4, 2011

ओसामा मरा, लेकिन अमेरिका अभी ज़िंदा है !


आतंकी घटनाओं का असल जिम्मेदार कौन ?
         गाँव-देहात की एक कहावत है - चोर को नहीं उसकी माँ को मारो | क्योंकि बिना गर्भनाल को समूल नष्ट  किए बुराई का जड से खात्मा नहीं किया जा सकता | अमेरिका वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले को भूलने को तैयार नहीं है | और कमो-बेश उस जैसे भारत में हुई दर्जनों घटनाओं की ओर तवज्जो देना उसके दोगले खून में भी नहीं है | देश में घटी आतंकी घटनाओं को लेकर ज्यादा से ज्यादा संवेदना तो भारत के प्रति जता देता है | लेकिन इन घटनाओं के जिम्मेदार लोगों को वह अपनी सहायता देना भी बंद नहीं करता | सच तो ये है कि जब तक अमेरिका है तब तक आतंकवाद का खात्मा मुश्किल ही नही नामुमकिन भी है | आतंकवाद की खेती को पोषण आहार किसी न किसी रूप में यही देता है | कल 'फेस बुक' पर किसी ने ये शीर्षक लगाया था कि "एक छोटा आतंकवादी, एक बड़े आतंकवादी के हाथों मारा गया" यह शब्दशः  सत्य है | अकेले मेरे ही नहीं बल्कि मुझ जैसे ज्यादातर लोगों का मानना है कि आज हमारा पूरा देश जो आतंकवाद का दंश झेल रहा है उसमें परोक्ष रूप से ही सही अमेरिका भी कहीं न कहीं किसी न किसी रूप से अवश्य लिप्त है | हमारे दुश्मनों को दामाद की तरह खर्चा-पानी वही मुहैया करा रहा है | आज अमेरिका की दबंगई और गुंडागर्दी इतनी बढ़ गई है कि वह मनमाने ढंग से तय कर रहा है कि क्या सही है और क्या गलत | इजराइल के मामले में अमेरिका का दोगलापन जग ज़ाहिर है | इस तरह इसने इजराइल को वह अपनी नाजायज़ औलाद की तरह पाल-पोसकर बड़ा कर रहा है |
           जबकि इसके ठीक विपरीत अमेरिका ने सद्दाम हुसैन पर रासायनिक हथियार रखने का आरोप लगाया | बिना किसी सबूत के संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद को धत्ता बताकर इराक पर हमला किया | सद्दाम हुसैन को मार डाला | इराक को नेस्त-नाबूद कर दिया | इसी तरह लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी पर रूस, चीन और हिन्दुस्तान जैसे देशों के विरोध के बावजूद अमेरिका के नेतृत्व में नाटो की फौज रोज़ हमला करती है | अफगानिस्तान की अमेरिका ईंट से ईंट बजा चुका है | 'वर्ल्ड ट्रेड सेंटर' को उड़ाने में न तो अफगानिस्तान की कोई भूमिका थी, न इराक की और न ही लीबिया की | तत्कालीन तालिबान सरकार ने सिर्फ ओसामा बिन लादेन को संरक्षण देने का अपराध किया था | अमेरिका ने इस अपराध में तालिबान के प्रमुख मुल्ला उमर को इस कदर दौड़ाया कि उसका आज दिन तक कोई अत-पता नहीं चल पा रहा है | अमेरिकी एजेंसी सीआईए २००१ के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के हमलों के समय से ही दावा करती आई है कि अलकायदा के उस अभियान को भी आईएसआई का समर्थन था | अब लादेन की मौत ने अलकायदा और पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान का रिश्ता साफ़ कर दिया है | इस घटना के मद्देनजर भारत के रणनीतिकारों को भी अब नए सिरे से सोचना चाहिए कि जो पकिस्तान परम दोगला अमेरिका की दोगलई को भी मात देकर लादेन के नाम पर उसके साथ आँख मिचौली खेल सकता है | उस भारत को क्या गिनेगा, जो आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका के सामने याचक भाव से कटोरा लेकर खड़ा है |
               प्रसंगवश यहाँ इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि कुख्यात ओसामा बिन लादेन के अंत के बाद दुनिया के सामने आतंकवाद की चुनौती कम नहीं हुई है, सिर्फ ओसामा की मौत के लिए १० साल के एक लम्बी अवधि का इंतज़ार और करीब १० हजार करोड़ रूपए से अधिक के खर्च के साथ न जाने कितने सैनिकों एजेंटों की मौत की कीमत अमेरिका को चुकानी पड़ी है | यह समझ लेना कि ओसामा मर गया तो आतंकवाद की जड़ें उखड़ जाएँगी, यह बचपना होगा | क्योंकि अभी ओसामा जैसे मास्टर माइंड और खूंखार उसके साथी एमान-अल-जवाहिरी, अनवर-अल औलाकी और खालिद-अल-हबीब जैसे करीब आधे दर्जन आतंकी अल-कायदा के नए ओसामा बनने की कतार में हैं | अल-कायदा का नेटवर्क ४४ देशों में फैला बताया जाता है | उसका निकट का संबंध तहरीके-तालिबान से है | ओसामा की मौत को लेकर इन दोनों आतंकी संगठनों सहित सभी आतंकवादियों में नफरत और गुस्से की आग भडक चुकी होगी | तालिबान ने तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी व अमेरिका पर हमले की चेतावनी भी दे दी है | आतंकवादी कब, कहाँ और किसे निशाना बनाएंगे कहा नहीं जा सकता | सबसे बड़ा डर एटमी हमले का है | अमेरिका ने तो अपना बदला ले लिया | अब शेष दुनिया इसका क्या परिणाम भोगेगी यह देखना शेष है |
                                                           मुनीर अहमद मोमिन 
                 

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