Tuesday, April 19, 2011

तिहाड़ जेल से भी निकल सकते हैं आईएएस !

शिक्षा निधि  का दान, मेरा भारत महान 
         शिक्षा जगत से संबंधित दो ख़बरें हैं और दोनों की दोनों ही आश्चर्य जनक हैं | एक सुखद तो एक दुखद | एक से जहां बाक़ी लोगों को शिक्षा मिलेगी, वहीं दूसरी से निश्चित तौर पर मन में क्षोभ पैदा होगा | सुखद ये कि तिहाड़ जेल के छह कैदी आईएएस बनने के लिए सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं | वहीं देश के कई राज्य सरकारों द्वारा शिक्षा बजट को क्रिकेटरों पर लुटाने की खबर है | क्योंकि विश्व विजेता बनी भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों को मिलने वाली नकद रकमें शिक्षा के बजट से दी गई हैं | हम क्रिकेटरों के इनाम देने के कत्तई विरोधी नहीं हैं | लेकिन शिक्षा जैसे महत्व पूर्ण बजट से बटमारी करके इनाम की रकम के घाल-मेल पर आपत्ति तो है ही | क्योंकि आज़ादी के अर्द्ध शताब्दी से अधिक की अवधि गुजारने के बावजूद हम पूरे देश को अभी तक साक्षर तक नहीं कर पाए हैं और न ही अभी तक सभी विद्यालयों में शिक्षा संबंधी मूल-भूत बुनियादी सुविधाएं मुहैया करा पाने में कामयाब हो पाए हैं | ऐसे में ऐसे महत्वपूर्ण विभाग के मद से इनाम राशि का बन्दर-बाँट करना देश के मौजूदा शैक्षणिक परिस्थितियों के मद्देनजर मुनासिब तो कत्तई नहीं कहा जा सकता |
         बता दें कि २८ साल के बाद विश्व कप जीतने का रिकार्ड बनाने वाली टीम इंडिया के धुरंधरों पर पैसों की जो बरसात हुई, वह पैसा कहीं और से नहीं बल्कि शिक्षा बजट से निकाला गया था | कई राज्यों ने अपने शिक्षा बजट से पैसा निकालकर क्रिकेटरों को इनाम दिए | दिल्ली, पंजाब और महाराष्ट्र ने शिक्षा बजट से इनाम की धनराशि निकाली | जबकि तमिलनाडू, कर्नाटक और उत्तराखंड ने खिलाड़ियों को जमीन आवंटित की और साथ में नकद इनाम भी दिया | हालांकि इसके स्रोत का पता नहीं है | अब मुम्बई  के एक एनजीओ ने बाम्बे हाईकोर्ट को खत लिखकर इस बारे में शिकायत की है और कोर्ट से " सू मोटो " यानी अपने विवेक से निर्णय करने का आग्रह किया है |
         दूसरी ओरबड़े अपराधियों के लिए बनी तिहाड़ जेल में छह कैदी ऐसे हैं जो मौजूदा परिस्थितियों से शिक्षा लेते हुए जीवन में कुछ बनने के लिए जी-जान से प्रयासरत हैं | अमूमन तिहाड़ जेल देश में बड़े आपराधिक वारदातों को अंजाम देने वालों के बन्दीगृह के रूप में जाना जाता है | लेकिन इसी बदनाम जेल के छह कैदी भारत की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के सिलसिले में रात-दिन एक करके जुटे हुए हैं | तिहाड़ में जेल संख्या तीन में हत्या, अपहरण और धोखा-धड़ी जैसे अपराधों के मामले में बंद छह कैदी आईएएस की तैयारी में जी-जान से जुटे हुए हैं | हालांकि ये कैदी अपनी रिहाई के बारे में निश्चित नहीं हैं | इन कैदियों को कोई कोचिंग की सुविधा आदि भी नहीं है | बल्कि कलेक्टर बनने का सपना संजोने वाले ये कैदी स्वाध्ययन के साथ अपनी परीक्षा की तैयारी के सिलसिले में एक अन्य कैदी से सहायता व मार्गदर्शन प्राप्त कर रहे हैं | जिसने पूर्व में आईएएस की तैयारी में छात्रों को कोचिंग दी थी |
                                                                                         मुनीर अहमद मोमिन   
          

Monday, April 18, 2011

be lagam: सीडी के पीछे क्या है ?

be lagam: सीडी के पीछे क्या है ?: " देश में खूब हो रही है भ्रष्टाचारी चकल्लस लगता है वकील बाप-बेटे शांतिभूषण..."

सीडी के पीछे क्या है ?

          देश में खूब हो रही है भ्रष्टाचारी चकल्लस
         लगता है वकील बाप-बेटे शांतिभूषण और प्रशांत भूषण आज-कल शनि की साढ़े साती की चपेट में चल रहे हैं | लोक-जनपाल विधेयक के लिए ड्राफ्टिंग के मद्देनजर बनी सिविल सोसायटी कमेटी के गठन  के समय ही पेट 'फुलाने-पचकाने' के योग वाले बाबा रामदेव द्वारा इनके विरोध में चलाए गए  'रामबाण' का प्रभाव दिनों-दिन गहराता ही जा रहा है | बाबा के बाद इन दोनों बाप-बेटों पर इलाहाबाद में एक मकान की खरीददारी पर स्टैम्प ड्यूटी बचाने या चुराने का आरोप लगा | फिर कल-परसों एक सीडी हवा में तैरती हुई भूचाल लेकर आई | जिसमें पूर्व क़ानून मंत्री और कानूनी पहलवान शान्ति भूषण को मुलायम सिंह यादव का एक मामला निपटाने के लिए किसी जज को पटाने के एवज में चार करोड़ रूपयों के लेन-देन की बात कही गई है | इसकी 'सेटिंग' कराने में बड़े कद के बड़े भैया अमिताभ के छोटे कद के छोटे भैया अमरसिंह का नाम है | फिर क्या था खबरिया चैनलों द्वारा इस सीडी प्रकरण की खूब खबर ली गई | जिसके कारण सिविल सोसायटी के सदस्य और शान्ति भूषण के चिरंजीव व नूरे नजर प्रशांत भूषण को अपने बाप के बचाव में आना पड़ा | 
         प्रशांत का कहना था कि उनके पिता ने २००६ में जो सीडी सुप्रीम कोर्ट में जमा की थी | उसी सीडी से मुलायम की आवाज़ उठाकर इस सीडी में डाली गई है | इस सीडी में अमर सिंह यह कह रहे हैं कि मेरे एक जज से अच्छे संबंध हैं | जिनसे मैं कुछ भी काम करवा सकता हूँ | ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रशांत ने कहा कि इसके पीछे अमर सिंह का हाथ हो सकता है | और चार करोड़ की बात किसी दूसरे सन्दर्भ में कही गई होगी | जिसे इस सीडी से जोड़ा गया है | लेकिन वे यह बताने में नाकाम रहे कि यह चार करोड़ की बात किस प्रसंग में कही गई है | जिसे इस सीडी से जोड़ा गया है | रहा सवाल अमर सिंह का तो इस बात से किसी को इन्कार नहीं होना चाहिए कि अमरसिंह के जज से अच्छे संबंध हैं | लोगों को याद होगा कि इसी तरह का एक सीडी प्रकरण अमर सिंह का भी हुआ था | जिसमें जिगर से बीडी जलाकर कलेजे से धुंआ निकालने वाली बंगाली बाला विपाशा बसु सहित अनेक अभिनेत्रियों की बहुत ही रंगीन-संगीन बातें थीं | जिसका कुछ अंश उस समय देश के एक बड़े अखबार समूह में एक दिन छपा भी था | लेकिन सुप्रीप कोर्ट ने अमर सिंह की याचिका पर उस सीडी के प्रसारण और उसका अंश अखबारों में छपने पर रोक लगा दी थी | 
         जबकि इसी तरह के कुछ मिलते-जुलते मामले को लेकर अभी तक कथित कुवांरे देश के सबसे प्रतिष्ठित उद्योग पति रतन टाटा भी लगभग छः माह पहले नीरा राडिया से अपनी बात-चीत के टेप के प्रसारण व उसके अंशों के प्रकाशन पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था | लेकिन एक जैसे ही मामले में अमर सिंह  को राहत देने वाली सर्वोच्च अदालत ने रतन टाटा को किसी प्रकार का कोई राहत देने से साफ इन्कार कर दिया | हालांकि दोनों ही मामलों में ' इलू-इलू ' कामन यानी उभय पक्ष था | न्यायदेवी के गलियारों से भी अक्सर ऐसी बातें बाहर आती रहीं हैं | जो बाहरी दुनिया में चर्चा का विषय रही  हैं | भले ही दबी जबान से ही हों | देश के पहले दलित मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन बसपाइयों की बहन और दौलत की बेटी सारी दलित की चिरकुवांरी बेटी मायावती को अपनी मुंह बोली बेटी का दर्जा दे रखे थे | उसी दौरान ताज कारीडोर सहित कई एक मामलों में बहन जी को बेटी होने का 'राहत-लाभ ' नसीब हुआ था | 
                                                                                   मुनीर अहमद मोमिन        
     

Sunday, April 17, 2011

इधर लोकपाल में बवाल,उधर सुप्रीम कोर्ट का धमाल !

            यानि बहुत कठिन है डगर पनघट की
       कल शनिवार को एक साथ दो महत्वपूर्ण बातें हुईं | एक तरफ जहां लोकपाल विधेयक की ड्राफ्टिंग कमेटी की पहली ही बैठक में वाद-विवाद व बवाल हो गया | वहीं दूसरी और उच्चतम न्यायालय के मुख्यन्यायाधीश एस. एच. कपाडिया ने काले कोट वालों की भी खबर लेते हुए कहा कि काली कोट पहनने वालों की उजली छवि आवश्यक है | इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए उन्होंने राजनेताओं से भी मुखातिब होकर भ्रष्ट जजों को संरक्षण न देने तक की बात कह डाला | 
         अब बात पहले लोकपाल पर, लोकपाल विधेयक लाने हेतु बनाई गई ड्राफ्टिंग कमेटी की पहली ही बैठक विवादों के हवाले हो गई | इस विधेयक से भ्रष्ट मंत्रियों और जजों के निलंबन का प्रस्ताव वापस लिया गया है | जबकि सिविल सोसायटी का प्रतिनिधित्व कर रहे अरविंद केजरीवाल ने सरकार के इस बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि सरकार देश के लोगों को गुमराह कर रही है | क्योंकि सिविल सोसायटी ने भ्रष्ट मंत्रियों और जजों के निलम्बन का प्रस्ताव वापस नहीं लिया है | लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करने के लिए गठित संयुक्त समिति की पहली बैठक में मसौदों का आदान-प्रदान किया गया | जिसमें अगली बैठक में चर्चा होने की खबर है | समिति के बैठकों की वीडियोग्राफी पर भी सहमति नहीं बन सकी | मगर चर्चाओं की आडिओ रिकार्डिंग करने का फैंसला कर लिया गया | दोनों ही पक्ष चाहते हैं कि एक ठोस लोकपाल विधेयक संसद के मानसून सत्र में पेश किया जाय | इसके लिए समिति की दो मई  की होने वाली बैठक में विधेयक का प्रारूप बनाने के तौर- तरीकों पर विचार- विमर्श किया जाएगा | इसके लिए वेब साईट और सीधे सम्पर्क के जरिये विधेयक पर सीधे जनता के सुझाव लेने का फैंसला भी लिया गया | इसके साथ ही नागरिक समाज के विधेयक के मसौदे में तब्दीली करते हुए लोकपाल की नियुक्ति करने वाली समिति में राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के अध्यक्ष के बजाए प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता को शामिल किया गया है | सबसे आश्चर्य जनक बात तो यह है कि सरकार का मानना है कि शान्ति भूषण की अध्यक्षता में सिविल सोसायटी के सदस्यों ने जो मसौदा पेश किया वह पहले से तैयार किए गए जन लोकपाल बिल के मुकाबले कमजोर है |       
            दूसरी और उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस.एच. कपाडिया ने कहा कि भ्रष्ट न्यायाधीशों को राजनैतिक संरक्षण कत्तई नहीं दिया जाना चाहिए | देश में फैले चहुँ और भ्रष्टाचार  के माहौल में अपने घर यानि न्यायपालिका की छवि से चिंतित प्रधान न्यायाधीश श्री कपाडिया ने "काले परिधान में साफ़ लोंगो" की जरूरत पर बल देते हुए राजनीतिक वर्ग से भ्रष्ट जजों को संरक्षण नहीं देने को भी कहा | श्री कपाडिया का यह कहना दिल छू लेने वाला है कि -' हमें उदाहरण पेश करना होगा ताकि न्यायपालिका की स्वतन्त्रता और सत्यनिष्ठा बनी रहे | न्यायधीशों को आत्म-संयम बनाए रखना चाहिए और वकीलों, राजनैतिक दलों, उनके नेताओं या मंत्रियों से तब तक संपर्क नहीं रखना चाहिए, जब तक विशुद्ध रूप से कोई सामाजिक मौक़ा न हो' | श्री कापडिया का कथन निःसंदेह स्वागत योग्य और एक शुभ संकेत है, क्योंकि विगत दिनों से न्यायपालिका का भी नाम गाहे-बगाहे किसी-किसी मामले में संदेह के घेरे में रहा है |
                                                                                          मुनीर अहमद मोमिन      



Friday, April 15, 2011

किसानों ने देश को 'सोमालिया' होने से बचाया

              देश की सभी योजनाएं सफेद हाथी !
         इस आपा-धापी के दौर में हम इतने व्यस्त व लस्त-पस्त हो गये या करा दिए गए हैं कि हमें यह पता नही चल पा रहा है कि कैसे-कैसे 'अजगर' हमारी योजनाओं और अर्थ व्यवस्था को निगलते जा रहे हैं | देश के करोड़ों निवेशकों की कमाई अमीरों और वेदेशी निवेशकों के हाथों में जाने के कारण हमारी राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो गयी है | इसे केवल और केवल भारतीय किसानों ने संभाला है | हालात यह है कि यदि देश में २२-२३ करोड़ टन अनाज पैदा नहीं हुआ होता तो आज भारत दूसरा 'सोमालिया' बन जाता | फिर भी हमारी असफल सरकार देश पर दिनों-दिन मंहगाई और गरीबी लादती ही चली जा रही है | जबकि दूसरी ओर हर साल उद्योगपतियों और अमीरों को लगभग डेढ़ लाख करोड़ रूपये की टैक्स में छूट या राहत मिलती रही है | वह भी इन परिस्थितियों में कि वे ५० हजार करोड़ रूपये से अधिक का बैंक लोन भी डूबो चुके हैं | इतना ही नहीं घोटालों या हवाला कारोबार से भी भारतीय अर्थ व्यवस्था की भारी क्षति हुई है | जरूरत है आज भ्रष्टाचार, आंदोलन और सरकारी अहंकार में फंसे विकास को बाहर निकालकर दिशा व गति देने की | यह सदबुद्धि हमारे देश के राजनेताओं, मंत्रियों, सरकार अथवा सरकारों को कब आयेगी ?
        एक ओर देश भ्रष्टाचार से लड़ रहा है, तो दूसरी ओर सरकार के मंत्री और उसका तंत्र भ्रष्टाचार में पूरी तरह लिप्त नजर आ रहे हैं | इन दो पाटों के बीच में हमारा राष्ट्रीय विकास फंसकर छट-पटा रहा है | चालू वित्त वर्ष में केंद्र सरकार ने नौ लाख करोड़ रूपये का राजस्व हासिल करने का इरादा जताया है | यह रकम पिछले साल से एक लाख आठ हजार करोड़ रूपये अधिक है | जारी वित्तीय वर्ष का बजट पेश करते समय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने यह दावा किया था कि तीन वर्षों में १५ लाख करोड़ रूपये की राशि योजना बजट में रखी या खर्च की गयी है | लेकिन "चतुर सुजान 'दादा" यह बात साफ़ तौर पर छिपा गए कि इतनी भारी रकम खर्चने के बावजूद जो विकास होना चाहिए वह तो देश में गधे के सींग की तरह कहीं दिखाई नहीं दे रहा है | गरीबों का जीवन स्तर उठना तो दूर इन्फ्रास्ट्रक्चर को लेकर वही भिखमंगाई चहुँ ओर दिखाई दे रही है | 'दादा' यह बात भी सिरे से गोल कर गए कि योजना बजटों की राशि से तिगुनी रकम गैर योजना बजट यानी प्रशासन के मद में खर्च हुई | ये खर्च क्या इस बात को साबित नहीं करते कि हम सफेद हाथी पाल रहे हैं | राजनेता, मंत्री भ्रष्ट हैं और उनके साए में पल रहा प्रशासन नामक 'सफेद हाथी' के कब्जें में ही देश का खजाना हैं | 
         यही कारण है कि देश का विकास भी हाथी चाल यानी मन्दगति से ही हो रहा है | प्रणव दा के मुताबिक़ यदि नौ लाख करोड़ रूपये या इससे ज्यादा का राजस्व हासिल भी होता है तो विकास कार्यों में कितनी रकम खर्च होगी | जो जारी वर्ष में ३५ से ४० फीसदी के बीच ही है | इससे साबित होता है कि हमारे समक्ष पैसे के कमी की समस्या बिलकुल ही नहीं है | इस सन्दर्भ में हम अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा का उदाहरण ले सकते हैं | क्योंकि पिछले १२ वर्षों में अमेरिका को करीब १९ लाख करोड़ रूपये का बजटीय घाटा हुआ है | जिसके मद्देनजर वे घाटे को घटाने के लिए अमीरों को दी जा रही टैक्स कटौती वापस लेना चाहते हैं | लेकिन भारत में लोकतंत्र के नाम पर एक ऐसी पूंजीवादी सरकार है जो अमीरों, कालाबाजारियों और जमाखोर-दलालों की है | प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी अमीरों के घोर पैरोकार तो हैं ही, कृषि मंत्री शरद पवार भी खेती-किसानों को वायदा बाज़ार के हवाले करते रहें हैं | वित्त मंत्री रहते हुए पी. चिदम्बरम ने खुलकर शेयर बाज़ार की तेजी का पक्ष लिया | परिणाम यह हुआ कि निम्न मध्यम वर्ग व मध्यम वर्ग ने जमकर निवेश किया . फिर उसके बाद बाज़ार ढहता चला गया | नतीजतन आज यह वर्ग खुद औंधे मुंह पड़ा है |
                                                                                       मुनीर अहमद मोमिन    

be lagam: घोटाले के नये शिकार शरद पवार

be lagam: घोटाले के नये शिकार शरद पवार: "MONDAY, NOVEMBER 29, 2010 राडिया, मीडिया और मंडिया ..."

घोटाले के नये शिकार शरद पवार

MONDAY, NOVEMBER 29, 2010

          राडिया, मीडिया  और  मंडिया  
         ("नीरा राडिया ने देश के सबसे बड़े पावरफुल राजनेता शरद पवार का नाम लेकर भारतीय राजनीति में फिर गरमाहट पैदा कर दी है, अभी जुमा-जुमा आठ दिन पहले ही अण्णा हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी 'गुगली' से उबरे पवार के लिए यह बड़ा झटका माना जा रहा है | लेकिन पवार को नजदीक से जानने वाले लोगों का कहना है कि जोड़-तोड़ की राजनीति के "सिद्ध पुरूष" पवार का ऐसे मामलों से निपटना उनके दाएं-बाएँ हाथ का खेल है |मैंने 29 नवम्बर 2010 को राडिया बाबत यह ब्लॉग लिखा था |जिसे प्रसंग वश आज भी बिना किसी फेर-बदल के हू-ब-हू  दोबारा पेश कर रहा हूँ ") 
         सत्ता के गलियारों  से लेकर कार्पोरेट सेक्टर के अलंबरदारों और  मीडिया के पहरेदारों को अपनी सुरतालों पर ताता-थैया कराने वाली नीरा राडिया नामक दुर्लभ प्रजाति की महिला ने अपने नाम और काम  की व्यापकता साबित करते हुए जागरूक मीडिया सहित सरकार, नौकरशाह और औद्योगिक  घरानों के कथित प्रतिष्ठित और नामधारी लोगों को भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डूबाने का पुख्ता इंतजाम  करवा लिया है |राडिया का काम था औद्योगिक घरानों/कम्पनियों का काम सरकार अथवा  नौकरशाहों से करवाना और लगे हाथ वक्त जरूरत अपनी मनवाने के लिए मीडिया के द्वारा भी उन पर  दबाव बनवाना | इस तरह एक महिला दलाल ने मंत्री से लेकर नौकरशाह और मीडिया से लेकर कार्पोरेट सेक्टर तक को भी दलाली के दलदल में फांस दिया है | सीबीआई के पास इस तरह के वार्ताओं के लगभग ५८५१ रिकार्ड हैं | जिसमें से एक समाचार पत्रिका ने केवल सौ वार्ता टेप रिकार्डिंग की बात ही सार्वजनिक की है | 
         इस बीच टाटा उद्योग समूह के सर्वेसर्वा रतन टाटा ने अपनी निजता की गुहार लगाते हुए सुप्रीमकोर्ट तक जाने का मन बना लिया है | क्योंकि उनका मानना है कि टेपिंग गैरकानूनी ढंग से लीक हुयी है | जिससे उनके अपनी जिन्दगी जीने के अधिकारों का हनन हुआ है | खैर कार्पोरेट सेक्टरों, सरकारों व नौकरशाहों में तो इस तरह की लुका-छिपी और चोर-सिपाही का खेल वर्षों से खेला जा रहा है | लेकिन इस हमाम में नंगी मीडिया का नंगापन सही ढंग से पहली बार हमाम के बाहर तमाम हुआ है | 'पेड न्यूज' के सहारे पेट भरने वाले अधिकतर मीडिया के चर्बीदार , हाईफाई लोग "बेस्ट क्वालिटी " की दलाली तो दशकों से गाहे-बगाहे  करते रहे हैं | लेकिन इन दिनों इनकी संख्या में कुछ ज्यादा ही इजाफा हो गया है | जनता को नैतिकता और आदर्शों का पोलियो ड्राप पिलाने वाले मीडिया के लोगों की मानसिक विकलांगता अक्सर 'प्रेस क्लब' में 'लेट नाईट' देखी जा सकती है | जब बोतल अन्दर जाती है तब इन कथित नामधारी और सुसंस्कृत महाविद्वानों का आदर्श और नैतिक आवरण 'तार-तार' होकर बाहर आने लगता है | हो सकता है कि अपने बचाव की दलील  में मीडिया वाले उस पर अपनी निजता का लेबल चस्पा कर दें | तो निजता क्या केवल मीडिया वालों की ही होती है ? फिर दूसरे लोगों की निजता को उधेड़ने का मीडिया को क्या हक़ है ? मुझे इस बाबत  एक  पुलिस वाले का एक मौलाना के लिए कहा गया वो  शेर याद आ रहा है |
                                         
                                         ये कैसा इन्साफ है , ऐ हजरते मौलाना |
                                         हम लें तो घूस और आप ले तो नजराना ||
अंत में यहाँ साफ़ तौर पर यह कहा जा सकता है कि अपने संवाद व संप्रेषण हेतु 5 डब्ल्यू ह्वाट, ह्वेन,व्हेयर, हू और ह्वाई से शुरू होने वाली मीडिया अब 3 डब्ल्यू  यानि वूमेन, वाइन और वेल्थ में अटक कर रह गयी है | 
                                                                                         मुनीर अहमद मोमिन